एक ‘मां’  और उसके मातृत्व की कीमत आप कितनी लगायेंगे, ये सवाल सुनने में अटपटा लगेगा लेकिन पिछले लगभग बीस दिनों से ये सवाल मेरे जेहन  मंे कौंध रहा है। इसका जवाब बताने के पहले मैं इस सवाल की कोख के बारे में आपको बताती हूँ  दरअसल पिछले दिनों हील फाउण्डेशन के द्वितीय राष्ट्रीय हेल्थ राइटर एण्ड कम्युनिकेटर कनवेंशन के दौरान मैं गोधरा के समीप स्थित दाहोद (गुजरात) की सांसद और स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा0 प्रभा ताबियाड से मिली। उनसे मिलकर और बात कर लग ही नही रहा था कि एक आदिवासी महिला के खाते  में इतनी सफलताएं दर्ज हैं और उन्हें गुमान तक नहीं। बात चली तो हम महिला होने के अनुभव बांटने लगे लेकिन उनके अनुभवों की पोटली जैसे-जैसे खुलती गयी मेरे शरीर के रोएं खड़े होते गये। अब तक मुझें यह भ्रम था कि हिन्दी पट्टी (उत्तर प्रदेश बिहार आदि) में ही स्त्री होने की सजा मिलती है लेकिन विकास की दौड़ में काफी आगे चल रहे गुजरात में भी स्त्री होने की सजा कम नहीं है। गोधरा से चालीस किलोमीटर दूर की एक घटना सुनकर मुझे कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों  ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी……….’ में घुला दर्द बहुत कम लगा। डा0 प्रभा बता रही थी और मेरी आंखों के सामने पूरी तस्वीर गड्डमड्ड हो रही थी। मात्र सत्रह बसंत देखने वाली एक आदिवासी बाला दर्द से तड़प रही थी और उसके नीचे बिछी चादर गंदगी से मैली है या खून से भीगी, यह पता लगाना मुश्किल था। उस गर्भवती महिला को तुरन्त खून चढ़ाने की जरूरत थी। जब उसके पति से खून देने को कहा गया तो उसने इनकार कर दिया। उसे डर था कि खून देने से उसे कमजोरी आ जायेगी। उसने पूछा कि क्या खून चढ़ाने से उसके बच जाने की गारन्टी है, उसे चालीस किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल तो नहीं ले जाना पड़ेगा। डा0 प्रभा ने कहा कि मैं पूरी कोशिश करूॅगी कि तुम्हारी पत्नी की जान बच जाये। फिर वह कुछ जोड़ने घटाने लगा और झटके से उठकर यह कहता हुआ जाने लगा कि अस्पताल ले जाने में पन्द्रह सौ रूपये खर्च हो जायेंगे इतने में तो दूसरी शादी कर लूंगा। ये मरती है तो मरने दो। डाक्टर ने जब उसे रोका कि इसके पेट में तुम्हारा बच्चा पल रहा है क्या तुम्हें उसकी जरा भी फिक्र नही है। मर्द ने बड़े गुरूर से कहा मैने अपना काम कर दिया बाकी इसकी किस्मत। डा0 प्रभा ने कहीं से खून की व्यवस्था कर उस महिला की जान बचाई। उनके पास ऐसी घटनाओं के इतने पन्ने हैं कि उन्हें इस ब्लाॅग में समेट पाना मुश्किल हैं लेकिन इन अनुभवों में जो दर्द और  बेबसी है उसे केवल इस पंक्ति से समझा जा सकता है कि यहाॅ के अधिकतर मर्दो के लिए उनकी बीवी एक यूज एण्ड थ्रो पेन की तरह है, उसकी तब तक उपयोगिता है जब तक उसमें स्याही है। बीवी की पूछ तब तक ही होती है जब तक वह हंसते-मुस्कराते सबकी सेवा टहल करती रहती है ओर उसके बीमार होते या बच्चा जनते समय जान जोखिम में पड़ते ही उसका मर्द पति उसे ‘थ्रो’ करने से गुरेज नहीं करता है। फिर नयी ‘पेन’ के साथ नयी जिन्दगी की शुरूआत, जिसमें थ्रिल है और मर्द होने का गर्व भी ।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ