‘दो मिनट रुक सकते हैं, सिर के बल रह सकते हैं क्योंकि….’

ऐसा शायद ही हो कि आपको इसके आगे की लाइनें न याद हों. चलिए नहीं याद तो हम आपको याद दिला देते हैं, ‘दो मिनट रुक सकते हैं, सिर के बल रह सकते हैं क्योंकि.. बड़ी गजब की भूख लगी, मैगी चाहिए मुझे अभी.’

जी हां, बचपन में तो खाना खाने के बाद भी भूख लग जाती थी और वह भूख मैगी के लिए होती थी. हॉस्टल के कितने ही दिन मैगी के भरोसे गुजरे.

मुझे लगता है आज बहुत कम लोग होंगे जिन्हें मैगी पसंद न हो. शायद ही कोई घर हो जहां मैगी ने अपना जगह न बनाई हो और आज से नहीं सालों साल से लोग मैगी के लोग दीवाने रहे हैं.

कहीं न कहीं लोग बड़े ब्रांड पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि खुला सामान लेने से अच्छा है अच्छे ब्रांड का पैक्ड सामान लेने में भलाई है. हम अच्छी गुणवत्ता के लिए अच्छे पैसे भी देने को तैयार रहते हैं. यही कारण है कि ब्रांड पर आंखमूंद कर भरोसा कर लेते हैं. लेकिन मैगी की गुणवत्ता पर सवाल उठे तो खाने की और चीजें भी शक के घेरे में आ गईं.

ऐसी कितनी ही चीजें हैं जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में खुद भी खाते हैं और अपने बच्चे और परिवार को भी खिलाते हैं. हम सेहत से समझौता न करने के बदले ज्यादा पैसे देते हैं लेकिन बदले में हमें क्या मिल रहा है?

मैगी की गुणवत्ता पर यूपी में सवालिया निशान लगा. फिर तो ये सिलसिला पूरे देश में चल पड़ा. मैगी को बाय-बाय कहने का वक्त भी आ गया. लेकिन सिर्फ मैगी ही क्यों? क्या बाजार में मिल रही खाने-पीने की बाकी चीजें सुरक्षित हैं? कहीं हम ज्यादा पैसे देकर भी सेहत से समझौता तो नहीं कर रहे? ये नामी कम्पनियां हमारे साथ धोखा कर रही हैं? ऐसे ही जाने कितने सवाल हैं जो हर किसी के मन में उठ रहे हैं.

लेकिन एक सवाल यह भी है कि आज हमारी जिंदगी इन्हीं बाजार की चीजों पर निर्भर है. हम तो आंख बंद करके इन चीजों को इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं. क्योंकि हमारे पास इसके अलावा विकल्प ही क्या बचता है?

मैगी पहला मामला नहीं है. पहले भी खाने-पीने की दूसरी चीजों में हानिकारक तत्व मिलना, कभी खाने की चीजों में मिलावट, कभी कीड़े मिलना जैसी बातें सामने आती रही हैं.

मुझे समझ नहीं आता कि ये कंपनियां जब भारत में पांव पसार रही होती हैं. लोगों की जुबान पर चढ़ रही होती हैं तब इन चीजों की जांच क्यों नहीं की जाती. उस वक्त ये खाद्य सुरक्षा विभाग कहां सोया रहता है. जाने कितने वक्त से हमारे साथ ये धोखा हो रहा था? लेकिन हमारी जान इतनी सस्ती है कि कंपनियां अपना खेल, खेल रही थीं और सरकार सो रही थी.

अब मैगी का एड करने वाले सितारों पर भी केस दर्ज हो गया है उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही जा रही है. फिर तो ये कार्रवाई उन विभागों पर भी होनी चाहिए जिन्होंने अपना काम सही तरीके से नहीं किया. असली सजा के हकदार तो वही हैं.

मैगी का मामला सामने आने के बाद अब मै जब भी खाने का कोई सामान खरीद रही होती हूं तो दो मिनट रुकती हूं, सोचती हूं… फिर सामान खरीदना ही पड़ता है क्योंकि… हमारे पास विकल्प ही क्या है?

गर्मी का मौसम है तो ज़ाहिर सी बात है गर्मी होगी ही और होनी भी चाहिए क्योंकि कहा भी जाता है कि मौसम को मोटे तौर पर जाड़ा गर्मी बरसात के खानों में बांटा गया है और हर मौसम का अपना मज़ा और नुक्सान दोनों ही हैं.

गर्मी के मौसम में गर्मी की मार से यूं तो सभी बेहाल हैं क्या आम और क्या खास सभी पर गर्मी की तपिश भारी पड़ रही है.

ये दीगर बात है कि उच्च तबके को इसकी तपिश का एहसास कम होता है या यूं कहे कि कम वास्ता पड़ता है तो ग़लत ना होगा, उच्च तबके के पास एसी घर हैं एसी ऑफिस हैं और एसी कारें हैं और तमाम साधन हैं तो वो तो गर्मी से मात खाने से रहे.

अब बात करते हैं इससे नीचे के तबके के लिए जिनके लिए मौसम शायद ही कभी रूमानी होता है और कभी वो भी मौसम के मिज़ाज से कदमताल करते चहकते हों.

भीषण गर्मी हो या जाड़ा तेज़ बारिश हो या आंधी तमाम ऐसे लोग हैं जिनको काम के लिए अपनी रोजी रोटी की तलाश में घर से बाहर निकलना ज़रुरी ही नहीं बल्कि मज़बूरी भी है आखिर अपना और अपने परिवार का पेट जो पालना है.

ऐसे तमाम लोगों के लिए भीषण गर्मी और लू का प्रकोप इस साल बेहद जानलेवा साबित हो रहा है.

मेरे कहने का तात्पर्य ये नहीं है कि इस साल गर्मी और लू कोई अनूठे अंदाज़ में आई है बल्कि ये है कि इस साल मई का महीना जाते जाते ही पूरे देश से गर्मी और लू के चलते जो मौत के आंकड़े सामने आ रहे हैं वो खासे डराने वाले हैं.

सूत्रों के मुताबिक इस साल अबतक ये आंकड़ा करीब 2000 को पार कर चुका है.गर्मी का सबसे ज्यादा असर दक्षिणी राज्यों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में है.

सबसे ज्यादा मौतें भी यहीं हुईं हैं, मरने वालों में ज्यादातर मजदूर शामिल हैं. गर्मी और लू से मौत के मामले उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम पंगाल में भी सामने आए हैं.

कहीं पारा 44 तो कहीं 46 और 47 तो कहीं 48 को भी छू रहा है.डाक्टरों के मुताबिक हीटस्ट्रोक या लू लगने का अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो पीड़ित व्यक्ति की मौत हो सकती है और गर्मी और लू से मरने वाले ज्यादातर लोगों की मौत का यही कारण बताया जा रहा है.

मरने वालों में अधिकतर ग़रीब और दिहाड़ी मज़दूर हैं, जिन्हें काम की तलाश में अक्सर खुले में खडा रहना पड़ता है.

पारे का तीखापन बढ़ता ही जा रहा है और गर्मी से जूझने के तमाम उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं और मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है.

गर्मी और लू पहले भी पड़ती थी लेकिन तब मौतों की संख्या इतनी ज़्यादा नहीं होती थी तब शायद प्रकृति के साथ इतना खिलवाड़ करने की लोगों की प्रवृति नहीं थी और प्रकृति भी हमें कई आपदाओं से महफूज़ रखती थी.

लेकिन ज्यों ज्यों हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होते गए और वनों को साफ करने की मुहिम में अंधाधुंध जुटे हुए हैं.

नए पेड़ तो बहुत थोड़ी तादात में लग रहे हैं और शहरों से पेड़ साफ होते जा रहें हैं.

थोड़ा फ्लैशबैक में जाते हैं हम सभी ने अपने बचपन में पेड़ों के नीचे कितने खेल खेले और गर्मियों के मौसम में भी पेड़ों की छांवों में गर्मी की छुट्टियां मजे से बिताईं हैं.

तब लोगों के पेड़ों की घनी छांव से लोगों को बड़ा आसरा होता था और उसकी छांव में वो गर्मी को मात देते रहते थे.

लेकिन समय बदला और हम आधुनिक होते गए और छांव देने वाले पेड़ हमें चुभने लगे तो क्यों ना उन्हें साफ कर दिया जाए इसी सबमें लोग जुटे हैं.

अब प्रकृति के साथ खिलवाड़ करेंगे तो प्रकृति तो अपनी रौद्र रुप दिखाएगी ही, इसी का परिणाम है कि भीषण गर्मी और लू से इस साल मौतों की तादात खासी बढ़ी है.

प्रकृति मूक रहकर भी हमें कई संकेत देती है और इसको अभी भी ना समझे तो आने वाले समय में और भी बढ़ी तबाही के लिए तैयार रहना होगा.

मोदी सरकार ने तमाम वादों की फेहरिस्त में 25 मई को एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया.

अपनी सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने के मौके पर मथुरा में आयोजित ’जनकल्याण सभा’ में पीएम मोदी ने अपनी उपलब्धियों को गिनाने के साथ ही कांग्रेस पर जमकर हमला बोला. इसके बाद कांग्रेस का तिलमिलाना स्वाभाविक था.

हालांकि कांग्रेस ने भी मोदी सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है. दोनों सरकारों की लडाई का विषय है देश की बहुसंख्यक गरीब जनता.हालांकि यह बात अलग है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के घोटालों से ऊबकर ही जनता ने सत्ता परिवर्तन किया था.

लेकिन अब यहां देखना यह है कि जिन वादों के साथ मौजूदा सरकार सत्ता में आयी थी उस पर उसने कितना काम किया. वह भी ऐसे मौके पर जब वह अपना एक वर्ष पूरा कर चुकी है.

मोदी ने एक वर्ष पूरा होने के पश्चात जनता के नाम एक पत्र लिखा. उन्होंने लिखा कि प्रमुख फैसले लेने के समय हमेशा वंचित, गरीब, मजदूर और किसान उनकी आंखों के सामने रहते हैं.

जनधन योजना में हर परिवार का बैंक खाता और प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना एवं अटल पेंषन योजना इत्यादि. लेकिन इन साभी योजनाओं का क्या मतलब है जब देश की आधी आबादी से ज्यादा भूखे पेट ही सोते हों.

देश में कितने गरीब हैं यह विषय हमेशा से विवादों भरा रहा है. लेकिन फिर भी पिछली यूपीए सरकार ने गरीबी का जो मानक तय किया था उसके मुताबिक सामाजिक, आर्थिक व जातिगत जनगणना का काम 2011 में शुरू किया था क्योंकि इसके पूरा नहीं होने से सबसे महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा कानून में अडचनें आ रही थी.

देश के साढे छह सौ जिलों में से बमुश्किल अभी तक सवा सौ जिलों में ही जनगणना का काम पूरा हो पाया है. इसमें से भी गरीबी से बुरी तरह से प्रभावित यूपी और बिहार में यह काम ना के बराबर ही हरे पाया है. जिछली सरकार के कामकाज की रफ्तार का खामियाजा तो उसने पिछले लोकसभा चुनाव में ही चख लिया था.

वहीं अब अगर मौजूदा सरकार की बात करें तो हर बात पर गरीबों के नाम का दम भरने वाले मोदी ने इस कार्य को तेजी से क्यों नहीं बढाया हालांकि इसके लिए सिर्फ केंद्र सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कयोंकि जनगणना का काम सबसे पहले राज्यों का है, केंद्र तो बाद में योजना क्रियान्वित करेगा.

दोषी इसलिए भी ठहराया जा सकता है क्योंकि मेक इन इंडिया कार्यक्रम शुरू करने के बाद मोदी ने टीम इंडिया का एलान किया था.मतलब किसी भी योजना का कार्यान्वयन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सलाह और सहयोग के साथ हो. इस सबके बावजूद भी टीम इंडिया अभी तक यह तय नहीं कर पायी है कि देश में गरीब कितने हैं.

मौजूदा समय में तो केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-2 ढपली पीटकर स्वयं का गुणगान कर रही हैं. और इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं कि मोदी की टीम इंडिया मस्त और जनता पस्त.

किसी परिवार में कितने लोग भूखे सो रहे हैं जाने बगैर मुखिया परिवार कैसे चलाएगा. मौजूदा सरकार की उपरोक्त सभी योजनाएं तभी कारगर साबित होंगी जब देश के हर गरीब के पेट में दोनों वक्त भोजन का निवाला जाएगा.

एक औरत अपने तीन बच्चों को लेकर मेट्रो में चढ़ी जिसमें दो बेटियां और एक बेटा था. इन्हें बैठने के लिए दो सीट ही मिल पाई बच्चा बड़ा परेशान था बैठने के लिए, मां ने कहा बेटा दीदी को बैठने दो, बेटा गुस्से में बोला मां तुम दोनों दीदी को अपने साथ लेकर ही क्यों आई…क्या जरूरत थी इन्हें लाने की.. मां मायूस, अब कैसे बताती बेटा तुम्हें दुनिया में लाने के चक्कर में ये दोनों आ गई.

वरना हमारा देश कितना भी विकास की ओर अग्रसर हो जाए लोग तो बेटियां पैदा करने के लिए मुझे ही दोषी ठहराएंगे. कारण वही पुराने घिसे पिट्टे बेटा बुढ़ापे में कौन साथ देगा और फिर समाज के रस्मों रिवाज का निपटारा भी तो वही करेगा. चुपके से एक बात और बता दूं बेटा पैदा करने से समाज और खुद मां भी गर्व महसूस करती है. रिश्तेदारों के बीच थोड़ी चाल और वाणी में दम आ जाता है. महसूस किया है मैंने.

सच बताऊं तो बेटा पैदा करने की उम्मीद का शहर और गांव से कोई लेना देना नहीं होता. ये बस एक सोच है एक घिसा हुआ सा टॉपिक. बहुत आर्टिकल लिखे गए…कंधे उचका के बहुत भाषण कहे गए बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता लेकिन ऐसा नहीं है हमारा समाज अभी भी इतना मार्डन नहीं हो पाया है कि इस सोच और सच के साथ चल सके. एक आईएएस…आईपीएस…डॉक्टर के बेटे की मां से पूछिए कितनी खुश होगी, बेटा वो भी इस ओहदे पर….शादी में लड़की के साथ दहेज लाने का क्राइटेरिया फिक्स है, मोल भाव में ज़रा सा भी कम में बात नहीं बनेगी ये अलग बात है कि चाहे लड़के ने पढ़ाई के दौरान कितनी बार पढ़ा हो कि दहेज लेना देना अपराध है. बेटे-बेटी में कोई अंतर नहीं लेकिन क्या फर्क पड़ता है जब बात खुद पर आती है तो समाज के साथ तो आपको चलना ही होगा. यही बेटी पैदा होती तो बाप की झुकी हुई कमर साफ नज़र आ जाती.

अगर आप बेटे के सुख से वंचित है और बेटा पैदा करके समाज में प्रतिष्ठा पाने का शौक है तो चिंता मत कीजिए इसके लिए आप दवाई भी ले सकती हैं शर्तिया बेटा पैदा होगा. ऐसे गंभीर मामलों में जरा सी भी चूक नहीं होनी चाहिए..

मेरी बातों से जरा सा भी ये निष्कर्ष नहीं निकालइएगा कि मां खुद भी ऐसा चाहती है. नहीं, समाज…आस पास के लोग…परिवार के लोग..ऐसा सोचने पर मजबूर कर देते हैं. लेकिन वक्त मिले तो आप भी जरा सोचना, एक बच्चे की मुस्कान ज्यादा प्यारी होती है या उसका बेटा या बेटी होना.

दहेज…पढ़ाई..खर्च…इज्जत…बेटी के साथ आखिर क्यों इतने भारी भरकम शब्द रख दिए जाते हैं. खैर, मैं तो बस इतना ही कहना चाहूंगी कि मैं भी दो बेटियों की मां हूं….मेरी जिंदगी की रौनक और गर्व हैं मेरी दो बेटियां, मैं खुश हूं और अपनी बेटियों को खुश रखने का सामर्थ्य रखती हूं, आपकी हेय दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा…माफ कीजिएगा.

एक-दो दिनों से हमें अपना बचपन याद आ रहा है. हम गांव में रहते थे. पूरे दिन इधर-उधर खेत-खलियान में घूमते थे. कई बार कांटे भी चुभ जाते थे. तब हम नागफनी ढूंढ़ते थे.

नागफनी का लंबा, नुकीला मजबूत कांटा चुटकी में कांटे को निकाल देता था. तब यह मुहावरा पता भी नहीं था कि ‘कांटे से कांटा’ निकाला जाता है. लेकिन जान जरूर लिया था कि कांटा निकालने के लिए कांटे का ही इस्तेमाल करना चाहिए. सेफ्टीपिन का नहीं उससे नासूर बन जाता है.

हां, सेफ्टीपिन से कांटा निकालने से नासूर बनते देखा भी है, लेकिन हैरान हूं अब तलक हमारे देश के नेताओं ने क्यों नहीं समझा, क्यों नहीं उनके जेहन ये बात आयी कि ‘कांटे से कांटा’ से निकाला जाता है.

हमारे रक्षा मंत्री ने पहली बार ये बात कही तो लोग चौंके क्यूं? क्यों हैरान हूए? हमने अब तक कांटों को सेफ्टीपिन से निकालने की कोशिश की, जिसका नतीजा यह हुआ कि यह नासूर बना ही नहीं बढ़ता गया.

रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर के आतंकियों के संदर्भ में कहा गया मुहावरा ‘कांटे से कांटा निकालना’ पड़ोसी देश  को चुभ गया है. पाक बौखला गया है, अपने देश की सियासत में भी खलबली मच गयी, विपक्षी पार्टी सरकार को कोसने लगी, नैतिकता का हवाला देने लगी. रक्षा मंत्री के बयान से नाराज मुख्य विपक्षी दल ने इसके सुबूत देने या फिर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की बात तक कह डाली. यही राजनीति भी है.

हम भी इस बात से सहमत हैं कि उन्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए थी. ऐसी बातें कही भी नहीं जाती. कौटिल्य ने भी कहा है करने वाली बातें नहीं कहनी चाहिए. कूटनीति यही कहती है.

आतंकवाद हमारे देश का बड़ा नासूर है. देश में कितनी आतंकी घटनाएं हुईं? कितनी जानें गयीं? अंगुलियों पर नहीं गिने जा सकते. कितने घर बर्बाद हुए, कितने बच्चे अनाथ हुए, कितनी महिलाएं विधवा हो गईं, किसी से छुपा नहीं है.

दुखद बात तो यह है कि इन आतंकियों से लड़ते-लड़ते हमारे हजारों जवान शहीद हो गए. हम हैरान हैं कि आतंकवाद से निपटने के मुद्दे पर हमारे राजनेता सिद्धांत और नैतिकता की बात कैसे कर रहे हैं. उनसे निपटने के लिए अब तक वाजिब रास्ता नहीं ढूंढा.

क्या इन्होंने बम धमाके की घटनाएं नहीं दिखी, बम विस्फोट की आवाज इनके कान तक नहीं पहुंची. ऐसे नेताओं को अगर इनके सामने आंकड़े और सबूत पेश कर दिया जाएं तो वह अंधों के सामने आईना दिखाने जैसा ही होगा.

अब बात पाकिस्तान की है. रक्षामंत्री की बात पर उसका बौखलाना लाजमी है. किसी से छुपा नहीं है. आतंक की पौध कहां लगी है? कौन सींच रहा है? और इसके पीछे किसका हाथ है. अगर पड़ोसी देश के पास नैतिकता और मानवता जैसी चीज नहीं है तो हम क्यों सिद्धान्त बघार रहे हैं.

दुख तो इस बात का है कि नैतिकता और सिद्धान्त की बात करने वाले अपने ही नैतिक ग्रंथों को ठीक से समझ नहीं पाएं, जहां लिखा है, जो नहिं दंड करों सठ तोरा है भ्रष्ट होइ श्रुति मारग मोरा.

ये बात भी सही है कि रक्षा मंत्री पार्रिकर ने ऐसी बात कहकर भारत के लिए कूटनीतिक मुसीबत खड़ी की, उन्हें रक्षा मंत्री के तौर पर औपचारिक रूप से ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी. हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने स्थिति को संभालने की कोशिश की और पार्रिकर ने भी बयान से पलटने का प्रयास किया. लेकिन कहते हैं ‘तीर कमान से और बात जबान से’ निकलने के बाद वापस नहीं आती.

हम तीन दशक से आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं. इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं. सरकार आतंकवादियों से जूझती रही, चिन्ता व्यक्त करती रही पर सही विकल्प नहीं ढूंढ पायी. अगर पिछली सरकारों ने इसका सही इलाज किया होता तो आज ‘कांटे से कांटा’ का मुहावरा नहीं पढ़ा जाता.

आतंकवाद अब देश का सबसे बड़ा नासूर बन चुका है. चाहे कांटे से हो या लेजर से…अब इसका सही इलाज जरूरी है. पर एक बात यह भी सच है कि कांटा निकालना है तो नागफनी तलाशनी होगी. गोस्वामी तुलसी दास ने भी कहा है ‘जेही मोहे मारा तेही मैंने मारा’.

क्या आप जानते हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा दी जाने वाली चीज क्या है… मुझे लगता है इसका जवाब है, सलाह.

जी हां, क्योंकि अगर आप अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो आपको बिन मांगे ही ढेरों सलाह दे डालेंगे. जैसे कि आप क्या पढ़े, कहां जाएं, क्या करें, क्या न करें. यहां तक कि लोग यह सलाह देने से भी नहीं चूकते कि आप क्या खाएं और क्या पहनें.

अगर आप देखें तो यह आप का निजी मामला है कि आप क्या खाएं और क्या पहनें, लेकिन सलाह देने वाले तो आदत से मजबूर हैं ना.

अब अगर मैं आपसे अगला सवाल करूं कि सबसे कम ली जाने वाली चीज? तो आपका जवाब क्या होगा. ….इसका भी जवाब सलाह ही है.

दरअसल, लोग बिना मांगे ढेरों सलाह दे डालते हैं. लेकिन अंतिम निर्णय तो आपका ही होता है.

शायद ऐसे लोग यह नहीं जानते कि कई बार वह अपनी बिन मांगी सलाह देकर लोगों को कन्फ्यूजन और दबाव में तो डालते ही हैं. साथ ही कई बार ऐसे लोग दूसरों के लिए परेशानी भी खड़ी कर देते हैं.

ऐसे मुफ्त की सलाह देने वाले लोग अगर किसी पैरेंट्स को बच्चों के पालन-पोषण और करियर के संबंध में सलाह दे डालें तो बच्चे के लिए परेशानी, पति या प्रेमी को सलाह मिली तो प्रेमिका और पत्नी की परेशानी, मरीज और उसके परिजनों को मिले तो उनकी परेशानी बढ़ जाती है.

तो ऐसे मुफ्त की सलाह देने वालों को मेरी भी एक मुफ्त की सलाह है कि प्लीज दूसरों को सलाह देने के बजाए आप खुद पर ध्यान दें और अपनी कीमती सलाह को मुफ्त में बांटने की बजाय मांगने पर ही दें.

इस तरह आपकी सलाह की कीमत भी बढ़ जाएगी और दूसरे भी परेशानी से बच जाएंगे.

हालांकि मेरी यह मुफ्त की सलाह पता नहीं ली जाएगी या नहीं…

सत्ता के एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पीएम मोदी और उनकी ब्रिगेड ने सरकार की उपलब्धियों का बखान शुरू कर दिया है.

मोदी सरकार अगले 15 दिनों में देशभर में करीब 100 रैलियां आयोजित करेगी जिसकी अगुवाई बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री करेंगे.

उपलब्धियां इसलिए गिनाने जा रही है क्योंकि मोदी कैबिनेट के मुताबिक मीडिया सरकार की उपलब्धियों को पूरी तरह से जनता तक नहीं पहुंचा रही.

हालांकि देखा जाए तो पिछले आम चुनावों में इसी मीडिया ने मोदी के वादों को देश की आवाम तक पहुंचाया था. सरकार के इतने बडृे आरोप के बाद भी मीडिया का एक बडा तबका एनडीए सरकार के प्रति अभी भी सकारात्मक है.

आमतौर पर सरकार की उपलब्धियों का आकलन कार्यकाल के अंतिम पड़ाव में किया जाता है.

लेकिन इतनी जल्दी आकलन भी एक बडा सवाल खडा करता है. कहीं मोदी सरकार यूपी, बिहार के चुनावों को देखते हुए मीडिया के जरिए जनता के अंतर्मन को तो नहीं टटोल रही.

सरकार की उपलब्धियों का इतनी जल्दी मूल्यांकन भी शायद मोदी के भावनात्मक चुनावी वादों से जुडा है. क्योंकि जिन्होंने मोदी को वोट दिया है वह चाहे बेरोजगार, किसान, गरीब, मध्यमवर्ग हों इन सभी को एक वर्ष में कुछ हासिल होता नहीं दिखाई दे रहा.

मोदी द्वारा किए गए बडे चुनावी वादों को अगर छोड दिया जाए तो भी छोटे-2 वादों पर भी सरकार अभी तक खरा नहीं उतर पाई है.

मसलन किसानों की फसल के सही दाम, अनाज, सब्जी मंडियों से बिचैलियों का सफाया, बेरोजगारों का अपने, गांव शहर से पलायन, ट्रेनों की लेटलतीफी, शिक्षा के क्षेत्र में माफियाराज और मध्यमवर्ग की अनदेखी आदि.

ऐसी समस्याओं को तो सरकार अविलम्ब सुधार सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि जनधन, जीवन बीमा सहित कुछ जनउपयोगी योजनाओं को सरकार ने जरूर शुरू किया है.

मोदी के आलोचकों में कुछ लोग उनकी वनमैन आर्मी की छवि को भी करार देते हैं. अभी हाल ही में ब्रिटेन की चर्चित पत्रिका इकोनामिस्ट ने मोदी को वन मैन बैंड करार दिया है. इसी के साथ उनकी एक तस्वीर भी छापी है जिसमें मोदी कई वाद्य यंत्रों के साथ नजर आ रहे हैं.

विदेशनीति की अगर बात करें तो सरकार कमोवेश पूर्ववर्ती आलोचित यूपीए सरकार के समकक्ष ही खडी दिखाई देती है. समस्या जस की तस है. वह चाहे पाकिस्तान का गुस्ताख रवैया हो, चीन का अडियल रुख. अमेरिका, जापान यात्रा से भी मोदी को कुछ खास हासिल नहीं हुआ. और रूस के साथ संबंध भी पूर्ववत ही हैं.

भूमि अधिग्रहण मुददे पर भी अगर देखा जाए तो मोदी सरकार बैकफुट पर है. मोदी सरकार महात्मा गांधी, लोहिया और दीनदयाल के आदर्शों पर चलने की बात करती है लेकिन आज अगर वह होते तो सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति का शायद विरोध ही करते.

इसलिए सरकार को दूसरे पर पलटवार करने से अच्छा है कि चुनाव के समय किए अपने वादों को अच्छी तरह से याद कर उनपर अमल करना शुरू कर दे.

अच्छे दिन आ गए....नरेंद्र मोदी का दिया गया ये जुमला खासा लोकप्रिय हुआ था जिसकी यादें प्रधानमंत्री मोदी अपनी स्पीचों में अक्सर ताज़ा कराते रहते हैं.

मोदी के इस कार्यकाल की शुरुआत में लोगों ने संसद की सीढ़ियों पर आँसुओं को छलकते देखा और देश ने देखा कि कैसे देश का प्रधानमंत्री सड़क पर झाड़ू लेकर निकल पड़ा था.

उम्मीदों की लहरों पर सवार होकर बनी मोदी सरकार को एक साल होने को आया मोदी सरकार ने जो चुनावी वायदे किए थे उनको अमल में लाने के प्रयास तो सरकार में दिखे लेकिन उनको ठोस दिशा मिलना अभी बाकी है.

एक साल के अंदर जन-धन योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना, अटल पेंशन योजना और सुरक्षा बीमा योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने की पहल की गयी है.

किसानों के लिये आपदा राहत योजना में बदलाव किये गये है.

सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिए खोले गए जन-धन बैंक खाते जिनके लिए कहा गया कि ये बैंक सेवा से वंचित लोगों के लिए हैं.

मोदी सरकार के इस कार्यकाल में ये भी आरोप लगे कि सरकार कार्पोरेट समर्थक है और बिज़नेस ग्रुप्स को सपोर्ट करती रहती है.

मोदी का मेक इन इंडिया पर ज़ोर देना और इस अपनाने के लिए पुरज़ोर अपील करना ये भी इस कार्यकाल में दिखा लेकिन इसको लेकर भी आशा अनुरुप काम होता नहीं ही दिख पाया है.

इस दौरान भारत में पेट्रोल डीज़ल के रेट्स में काफी कमी आई और लोगों ने मोदी सरकार को इसका क्रेडिट दिया.

ये दीगर बात है कि इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड आयल के दामों में नरमी के चलते ये कमी आई थी और अभी फिर इसमें तेज़ी के चलते फिर से भारत में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ने लगे हैं.

मोदी सरकार को इस दौरान भू अधिग्रहण बिल को लेकर तमाम पापड़ बेलने पड़े और अभी भी इसको लेकर तस्वीर साफ नहीं है.

लेकिन कहते हैं कि जहां यश है वहां अपयश भी है मोदी सरकार पर इस दौरान विपक्ष तमाम आरोप भी लगाता रहा है मसलन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का ये कहना कि ये सूट बूट वालों की सरकार है और मोदी तो अक्सर विदेशी दौरों पर ही व्यस्त रहते हैं वगैराह.

ये जरुर कहा जा सकता है कि मोदी ने अपनी ताबड़तोड़ विदेश यात्रायें करके जरुर विदेशों में भारत का मान बढ़ाया है, भारत की एक अलग ही छवि को बेहतर और प्रभावी तरीके से पेश करने का काम किया है.

मोदी सरकार एक साल के काम को जनता के बीच कैसे परिभाषित करेगी और क्या उन्हें जनता की आकांक्षाओं का डर नहीं लगता है जैसे सवालों पर सरकार का मानना है कि सरकार को जनता की आकांक्षाओं का कोई डर नहीं लगता है.

‘अच्छे दिन’ के नारे के साथ स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई मोदी सरकार को लगता है कि अच्छे दिन तो आ गए हैं इसलिए सरकार ने अब दो नए नारे दिए – ‘साल एक-शुरुआत अनेक’ और ‘मोदी सरकार-विकास लगातार’.

मोदी सरकार के आने वाले कार्यकाल में जनता के हाथों क्या आता है और सरकार जनता से किए वायदों पर कितना खरी उतरेगी इसका इंतज़ार जनता को बेसब्री से है.

ऐसा होना भी लाज़िमी है क्योंकि मोदी सरकार को लोगों ने यूपीए सरकार के दो कार्यकाल के बाद बड़ी उम्मीदों और आकांक्षाओं के साथ चुना था और अब उसके हिस्से में खुशी आती है या मायूसी ये देखना बाकी है.

जिंदगी जीने की गुजारिश करते हुए तो लोगों को सुना होगा लेकिन मौत की गुजारिश…अजीब तो है लेकिन सच में कितना दुखदायी है खुद ही कहना कि मेरी जिंदगी ले लो…हमेशा के लिए बंद कर दो मेरी सांसें. लेकिन अगर जिंदगी नासूर ही बन जाए तो इसमें इंसान कब तक अपनी दिल की धड़कनों का मोह रख सकता है. और ऐसे में अगर एक व्यक्ति सुलभ मृत्यु की इच्छा रखता है तो क्या ये अपराध है. अगर आदमी जिंदगी की उथलपुथल की घबराहट से निकल कर आखिरी सांस चैन की लेना चाहता है तो क्या ये गुनाह है. कानून के दांवपेंच का पता नहीं पर इतना पता है जब सांस शरीर पर भारी पड़ने लगे तो उसका छोड़ना ही बेहतर होता है. हो सकता है ये एक आम आदमी का नजरिया हो. लेकिन अगर उन डॉक्टरों के नजरिए से देखा जाए तो जो कि भगवान के नाम से जाने जाते है. जो मृत्यु को जिदंगी की थपकी से उत्साहित करना चाहते हैं वो क्या करें. कैसे उस शख्स को मृत्यु का दरवाजा खटखटाने को कहे जिसको बचाने की कभी शपथ खाई थी.

चूंकि भारत संवेदनाओं में तैरता एक देश है इसलिए इसमें मानसिक रूप से इच्छा मृत्यु के लिए खुद को तैयार करना मुश्किल हो जाता है. इस बात पर बहस को फिर से ताजा कर दिया नर्स अरूणा शानबाग की मौत ने. वही नर्स अरूणा जो बीमार लोगों की सेवा करने में दिन रात एक कर देती है इस बात से अनजान की एक दिन उसकी जिंदगी इसी बिस्तर पर ही लिपट कर रह जाएगी. अरूणा का सपना उस दिन 27 नवम्बर, 1973 को अधूरा रह गया जब वार्ड ब्वॉय सोहनलाल भरथा वाल्मीकि ने अरूणा का रेप करने की कोशिश की यही नहीं उसे कुत्ते को बांधने वाली जंजीर से उनका गला बांधा. गला घोंटे जाने के कारण अरूणा के दिमाग में आॅक्सीजन जाना बंद हो गई और वो हमेशा के लिए कोमा में चली गई. हर दिन.. हर पल की बढ़ती पीड़ा ने अरूणा को बुरी तरह जकड़ लिया जिसे देखते हुए पत्रकार पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि अरुणा को इच्छामृत्यु की इजाजत देकर उनकी अनवरत पीड़ा से निजात दिलाई जाए. लेकिन उनकी ये अर्जी खारिज कर दी गई. आखिरकार चार दशक कोमा में रहने के बाद अरूणा ने दम तोड़ दिया और फिर इस बहस को जन्म दे दिया कि हमें इच्छा मृत्यु की गुजारिश का हक होना चाहिए.

अगर भारत की बात की जाए तो अदालतों में ऐसी कई दलीले दी जा चुकी हैं कि अगर इंसान को जीने का अधिकार है तो मरने का भी होना चाहिए. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कह दिया था कि हमें अनुच्छेद-21 में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है. इस पर कई लोगों का तर्क है कि अगर इसमें जीने का अधिकार शामिल है तो इसमें गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी शामिल होना चाहिए. लेकिन 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञान कौर बनाम पंजाब सरकार के मामले में स्पष्ट किया  कि अनुच्छेद-21 में जीवन जीने के अधिकार में मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है. अगर ऐसा किया जाता है तो वह धारा 306 और 309 के तहत आत्महत्या का अपराध माना जाएगा.

भारत में तो नहीं लेकिन विश्व के कई हिस्सों में इच्छा मृत्यु को कानूनी अधिकार प्राप्त है. स्विट्जरलैंड में 1937 में सबसे पहले असिस्टेड सुसाइड की मंजूरी मिली थी. बेल्जियम में इच्छा मृत्यु को 2002 में कानूनी मान्यता मिली. वहां 2013 में बीमारियों से जूझ रहे बच्चों तक के लिए इच्छा मृत्यु को वैध बना दिया गया है. हालांकि ये भी इतना आसान नहीं होता इसके लिए बकायदा बीमारियों की लिस्ट बनाई जाती है और एक खास आयोग को वाजिब वजह बताई जाती है जिसके बाद ही निर्णय लिया जाता है कि ये इच्छा मृत्यु के लायक हैं या नहीं.

अरुणा शानबाग की दर्दभरी मौत के बाद लोगों की निगाहें फिर से एक बार सुप्रीम कोर्ट की ओर टकटकी लगाए हैं कि मृत्यु की परिभाषा को कानून कैसे परिभाषित करेगा. क्या चरमसीमा तक पहुंचे दर्द को इच्छा से विराम मिलेगा या शरीर फिर अनवरत बहेगा दर्द के दरिया में मौत को पाने के लिए.

आप बहुत अच्छा लिखते हैं. किसी खास विषय पर आपकी अच्छी पकड़ भी है. अगर आपको लगता है कि हम इसपर लिखेंगे तो लाखों लोग उसे पढ़ेंगे. आपको लगता है कि आपमें इतनी क्षमता है कि आप अपनी लेखनी से पाठकों को बांध कर रख सकते हैं.

अगर ऐसी बात है तो आप अपना एक ब्लॉग बनाइए और रख दीजिए दिल की बात खोल कर. आइए हम बताते हैं ब्लॉग बनाया कैसे जाए?

आमतौर पर हम ब्लॉग बनाने के लिए दो प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं-
1- ब्लॉगस्पॉट
2- वर्डप्रेस

पहले हम ब्लॉगस्पॉट ब्लॉगर के बारे में बात करेंगे. ब्लॉगर के लिए आपके पास जीमेल का ईमेल होना जरूरी है जबकि वर्डप्रेस पर किसी भी ईमेल जैसे याहू, लाइव, हॉटमेल या जीमेल से काम चल जाता है.

जीमेल पर लॉगिन करने पर आपको ऊपर राइट साइड में नौ डॉट दिखाई देगा.

उसे क्लिक करने पर एक बॉक्स खुलेगा. उसमें आपको कुछ ऑइकन दिखेंगे. अगर यहां आपको बी वाला ब्लॉगर का एक ऑइकन दिखता है तो सही नहीं तो more ऑप्शन क्लिक कीजिए.
हिट के साथ रेवन्यू के लिए रेवन्यू हिट्स

More ऑप्शन के बाद जो बॉक्स पॉपअप खुलता है इसमें आपको बी वाला एक ब्लॉगर का ऑइकन दिखेगा. आप उसे क्लिक कीजिए.

इसके बाद एक नया विंडो Welcome to Blogger आएगा जिसके नीचे continue to blogger लिखा मिलेगा आपको उसे क्लिक करना है.

इसके बाद जो विंडो खुलेगा उसमें आपको New Blog को क्लिक करना है.

ब्लॉग में Infolinks से कैसे हो कमाई

New Blog को क्लिक करने पर एक पॉप अप विंडो खुलेगा जिसमें Create a new blog लिखा होगा. इसमें आपको अपने ब्लॉग का Title लिखना है.

Title कॉलम भरने के बाद आपको Address कॉलम में अपने ब्लॉग का एड्रैस लिखना है. जैसे अगर आप ब्यूटी टिप्स पर ब्लॉग बनाना चाहते हैं और उसका नाम beautytips रखना चाहते हैं तो आपको उस कॉलम में beautytips लिखना होगा.

इसके बाद वह कॉलम आपको खुद बताएगा कि आपको यह नाम मिलेगा या नहीं. यह नाम अगर पहले से किसी ने बुक करा लिया होगा तो आपको नहीं मिलेगा. आपको इसके आगे-पीछे कुछ जोड़कर नया नाम सर्च करना होगा.

ब्लॉग से भरिए बटुआ

जो नाम पहले से किसी से नहीं लिया होगा वह नाम आपको मिल जाएगा और राइट साइड में सही का निशान दिख जाएगा.

आप जो नाम रखेंगे उसके आगे .blogspot.com या blogspot.in जुड़ जाएगा. जैसे अगर आप अपने ब्लॉग का नाम Hindi Blog Money रखेंगे तो आपके ब्लॉग का Address होगा- hindiblogmoney.blogspot.com

जब आपको अपने ब्लॉग का नाम मिल जाए और एड्रैस के आगे सही का निशान दिख जाए तो उसके नीचे Create Blog को क्लिक करें. लीजिए आपका ब्लॉग तैयार है.

अब आपको अपने ब्लॉग के लिए लिखना शुरू करना है. Create Blog ऑप्शन करने के बाद जो पेज खुलेगा उसमें आपको केसरिया रंग का एक ऑइकन दिखेगा जिसमें पेंसिल बना होगा. इसे क्लिक कर आप नया पोस्ट डाल सकते हैं.

आप पोस्ट टाइटल देकर अपना ऑर्टिकल/लेख/ब्लॉग लिखना शुरू कीजिए. टाइटल लिखने के बाद पोस्ट बॉडी में अपना ऑर्टिकल लिख लीजिए.

ऑर्टिकल लिखने के बाद राइट साइड में ऊपर आपको Publish लिखा मिलेगा उसे क्लिक करना है. इसके बाद आपका ऑर्टिकल ब्लॉग पर दिखने लगेगा. इसके साथ ही आपने ब्लॉगिंग का पहला पड़ाव पार कर लिया है.

इसके बाद आप लेफ्ट साइड में View blog क्लिक कर अपना ब्लॉग देख सकते हैं. Hindi Blog Money का
एड्रैस है- http://hindiblogmoney.blogspot.in

आप इसे सिर्फ hindiblogmoney.blogspot.in टाइप करके भी खोल सकते हैं. आपको एड्रैस बार में www या https:// डालने की जरूरत नहीं है. यह अपने आप हो जाता है.

How To Make A Blog
अभी के लिए इतना ही आगे पोस्ट में कैसे फोटो लगाए…उसमें read more कैसे लगाए और ले आउट सेटिंग कैसे करें के बारे में चर्चा करेंगे.

हैप्पी ब्ल़ॉगिंग…

-हितेंद्र गुप्ता