हमने धर्म तो अलग कर लिए चलो आओ आज, सूरज….पानी….पेड़…प्रकृति को भी अलग कर लें. हिस्से कर दें इनके भी कुछ नाम भी रख दें जैसे धर्म के नाम रखें हैं. एक मुस्लिम सूरज एक हिंदू सूरज…कैसा लगेगा. प्रकृति के लिए भी बना दें कुछ नियम कानून हमारे कहने से हमारे धर्म के लोगों पर बरसें..सुकूंन दें. ऐसा संभव है क्या..किससे लड़ना चाहते हैं किसका विभाजन करना चाहते हैं जो कि इस सृष्टि का निर्माता है. प्रकृति का किसी भी धर्म से क्या लेना देना हो सकता है..योग किसी भी धर्म से कैसे जुड़ा हो सकता है …समझ से परे हैं.

योग पर विवाद तो सही में हैरान कर देने वाली बात है कुछ कट्टरपंथियों द्वारा ये पैदा किया गया ये विवाद सच में नादानी ही है वरना सृष्टि के अनवरत विकास क्रम में सूर्य की समान रूप से निर्विवाद भागीदारी बनी हुई है. हम इसी सृष्टि का अंश है. कोई भी धर्म इस सच से मुंह नहीं मोड़ सकता है.

धर्म का अर्थ है धारण करना…धर्म का अर्थ है सेवा या परोपकार करना. धर्म एक आचरण है जिसे हम समझे बिना विवाद करने पर आमादा रहते हैं. कुछ कट्टरपंथी लोग इसलिए सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहते क्योंकी सूर्य के साथ भगवान शब्द जुड़ा है. अगर बात ऐसी ही है तो नमाज के समय मुसलमानों के सामने दीवार होती है तो इसका मतलब क्या वह दीवार से सामने सिर झुका रहे हैं और सूर्य की किरणों में ही तो हमारी सांसें बसती है इस सत्य से हम मुंह कैसे मोड़ सकते हैं.

योग में सूर्य नमस्कार को शामिल करने पर कई मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताने के बाद तो सरकार ने योग दिवस पर आसनों की लिस्ट में सूर्य नमस्कार को नहीं रखा है लेकिन क्या ये वाकई में सही है. अब कुछ नहीं बचा तो योग का भी राजनीतिकरण शर्मनाक बात है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान कहा था कि योग जीवनशैली को बदलकर और मस्तिष्क की चेतना जगाकर हमारे जीवन में शांति पहुंचा सकता है. जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है. आपको बता दें जलवायु की वजह से भी लोगों में गुस्सा देखा जा रहा है और जिस तेजी से दुनिया में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसका एक कारण जलवायु में हो रहा बदलाव भी है. शायद इसीलिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में से 171 देशों ने योग दिवस को मान्यता दी है.

योग शब्द का अर्थ है जोड़ना वह चाहे किसी भी धर्म जाति अथवा संप्रदाय के लोग हों- योग का प्रयोग शारीरिक रूप से स्वस्थ्य और मानसिक रूप से सकारात्मक सोच विकसित करता है.

योग की क्रिया सूर्य नमस्कार क्योंकि धर्म नहीं स्वास्थ्य लाभ से जुड़ी क्रिया है, लिहाजा इसे नकारना अपने ही स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना है. हमें इस नादानी से बचना चाहिए.

भारतीय देवी-देवताओं का सम्मान विश्व स्तर पर किया जाता रहा है. यही कारण है कि लोकप्रिय चित्रकार एमएफ हुसैन की देवी-देवताओं पर बनाई गई पेंटिंग्स को लेकर काफी विवाद हुआ था.

राम गोपाल वर्मा के भगवान गणेश का अपमान करने वाले ट्वीट पर भी खूब हो-हल्ला हुआ था. अब ताजा मामला चीन से जुड़ा हुआ है.

भारत में मेड इन चाइना की गणेश जी और लक्ष्मी जी की मूर्तियां मिल जायेंगी. लेकिन चीन से आने वाली भगवान गणेश की मूर्तियों की आंखें छोटी से छोटी होती जा रही हैं.

सभी धर्म का सम्मान करना हम भारतीयों की विशेषता है. फिर हमारे धर्म का सम्मान क्यों नहीं?

रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने मेक इन इंडिया की वकालत करते हुए कहा था कि उन्हें कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के दौरान अक्सर देवी-देवताओं की मूर्तियां तोहफे में मिलती हैं, विशेष तौर पर भगवान गणेश की. एक दिन मैंने उसे पलटकर देखा तो पाया कि यह मेड इन चाइना है.

अगर देवी-देवताओं की मूर्तियां धीरे-धीरे बदलती हैं तब इस पर आश्चर्य नहीं करें. इसलिए हमें इसी दीपावली से ही तोहफों से हमारे अपने देवी देवताओं के संदर्भ में मेक इन इंडिया की शुरुआत करनी होगी.

पर्रिकर ने कहा-मैं इस बारे में गंभीरता से विचार कर रहा हूं.

चीन में बनाई जा रही गणेश की मूर्तियों की लगातार छोटी होती जा रही आंखों के पीछे छुपी गंभीरता और चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इसकी गहरी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी.

कहने को हमारा व्यापारिक रिश्ता साठ अरब डॉलर की सीमा छूने वाला है, लेकिन हकीकत में पूरा संतुलन चीन के पक्ष में झुका हुआ है. कीमत कम होने से आकर्षण होता ही है. चीनी सामानों से हमारे देश पटा पड़ा है. आखिर कब से शुरु होगा मेक इन इंडिया.

सीमा विवाद पर चीन की दागदार मंशा लगातार सामने आ रही है. चीन धमकी दे रहा है कि दक्षिण चीन सागर में पांव रखा तो खैर नहीं. जबकि भारत वहां वियतनाम के बुलावे पर उसकी जलसीमा में पेट्रोलियम की खोज में लगा है.

पेंटिंग्स और ट्वीट की तरह ही भगवान की मूर्तियों के बनाने में गलती अक्षम्य है. बाजार में किसी भी वस्तु को उतारने से पहले उसकी गुणवत्ता को देखना सरकार का काम है.

मेक इन इंडिया की वकालत अपनी जगह ठीक है किन्तु इसे भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है. रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के साथ ही देश के राजनेता और माननीयों को इसे गंभीरता से लेना चाहिये.

मेरी आप सबसे यही अपील है कि सरकार जो भी करें लेकिन हमारा प्रयास यह हो कि आने वाले दिनों में भारतीयता को बढ़ावा मिले और खासकर पूजा-अर्चना में स्वदेशी सामानों का प्रयोग किया जाये.

साथ ही सरकार को भी हमारे धर्म और आस्था का सम्मान करना चाहिए और दूसरे देशों से भारतीय देवी-देवताओं पर बनी वस्तुओं को लेकर हमारे देश में आने पर प्रतिबंध लगना चाहिये.

बात हमारे बचपन की है स्कूलों में गर्मी की छुटिटयां शुरू होते ही हम लोग मां से एक ही रट लगाए रहते थे कि नानी के यहां कब चलेंगे.

मेरी नानी का घर मेरे गांव से ज्यादा दूरी पर ना होकर बमुश्किल 25 किलोमीटर की दूरी पर है. अपने गांव से 10 किलोमीटर की दूरी तांगे से तय करने के पश्चात् तकरीबन इतनी ही दूरी ट्रेन से यात्रा करते थे.

हम लोगों का ट्रेन का सफर जहां समाप्त होता था वहां स्टेशन पर ही नाना अपनी बैलगाडी भिजवा देते थे. बैलगाडी का सफर शुरू होते ही शुरू हो जाती थी हम लोगों की पिकनिक ग्रामीण इलाके का सुनसान कच्चा रास्ता होता था.

रास्ते के दोनों ओर छायादार वृक्ष थोडी-2 दूर पर रास्ता किसी घने बगीचों के अंदर से होकर गुजरता था. बगीचे में ठंडी छांव के साथ ताजे मीठे फल भी खाने को मिलते थे. क्योंकि बगीचे इतने ज्यादा होते थे कि कोई भी अपना बगीचा बचाने भी नहीं बैठता था.

बैलगाड़ी हांकने वाला बैलगाड़ी रोककर हम लोगों को आम, जामुन, खजूर जैसे फल तोडकर खाने के लिए देता था. कहने का मतलब हम लोग भूल जाते थे कि मई, जून की तमतमाती दोपहरी में रास्ता तय कर रहे हैं. कहीं से भी गर्मी का अहसास ही नहीं होता था.

वहीं अगर उस दौर की तुलना आज से करें तो परिस्थितियों में अंतर जमीन आसमान का मिलेगा. आज ना तो वह गांव के बगीचे रहे, ना तो गांव के ताल तलैयों में पानी.

शहरों का तो पूछना ही क्या है. लम्बी चौड़ी उम्र से भी लम्बी और ना खत्म होने वाली सडकें मुंह बाए ऐसी चलती जाती हैं जिन पर छायादार वृक्ष तो क्या एक पौधा तक नजर नहीं आता.

आज देश में जितने नए हाईवे बन रहे हैं उनके किनारे कहीं भी पथिक के लिए छाया का ध्यान नहीं रखा गया है. शहरी रिहायशी इलाकों में यदा-कदा जहां कहीं भी पुराने तालाब, पोखरे आदि हैं भी, वह धीरे-2 भूमाफियाओं का शिकार होते जा रहे हैं, और वहां कालोनियां बसती जा रही हैं.

शायद इसी का नतीजा है कि आज पूरा देश ग्लोबल वार्मिंग की मार झेल रहा है. पूरे देश में वृक्षों की कटान अनवरत जारी है. वृक्षों की कटान में सरकारी अमला भी पीछे नहीं है.

पूरे देश में जारी भीषण गर्मी से मरने वालों की संख्या 1400 पार कर गयी है. केंद्र सरकार और राज्य सरकारें सिर्फ अगले चुनाव की तैयारी में लगी रहती हैं.

ठंडक के महीनों में तो रैन बसेरों का इंतजाम सरकार की ओर से किया जाता है. वहीं गर्मी के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किया जाता. कुल मिलाकर इस समय पूरे देश में गर्मी से त्राहि माम्-त्राहि माम् की स्थित बनी हुई है.

खैर सरकारों का रवैया छोडिये, लोगों को अपनी इस परेशानी का खुद ख्याल रखना होगा. केंद्र और राज्य सरकारों को क्या दोष देना, उनका लापरवाह रवैये का अपना इतिहास रहा है.

इस मौसम में सबसे ज्यादा खतरा हीट सट्रोक का होता है. यानि गर्मी के कारण तेज बुखार आ जाना. गर्मी में अधिक देर तक रहने से शरीर अपने आप को ठंडा रखने की क्षमता खो देता है.

इसलिए हमें इस मौसम में धूप में सुरक्षित चीजों के इस्तेमाल के साथ खान-पान का विशेष ध्यान रखना होगा. थोड़ी-2 देर पर पानी पीते रहना चाहिए. इस मौसम में तली-भुनी चीजों से बचना चाहिए.

इसके अलावा और बहुत सारी जरूरी बाते हैं जो हमें हमारी आने वाली पीढियों के लिए ध्यान रखना होगा. क्योंकि उसकी चिंता भी हमें ही करनी है.

पानी की अधिक बर्बादी ना करें. छोटे-2 जलाशयों में पानी एकत्र करने में मदद करें. प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल बंद करें. क्योंकि इससे भी ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढता जा रहा है.

अपने आसपास छायादार वृक्ष लगाएं. ना हो तो पास के पार्क में ही कम से कम एक पौधा लगाएं और उसे खुद ही पानी दें.

अपने घरों में ज्यादा से ज्यादा गमलों में पौधों को लगाएं जिससे हमें कम से कम अच्छी आक्सीजन तो मिलती रहे और हमें गर्मी का अहसास कम हो.

‘दो मिनट रुक सकते हैं, सिर के बल रह सकते हैं क्योंकि….’

ऐसा शायद ही हो कि आपको इसके आगे की लाइनें न याद हों. चलिए नहीं याद तो हम आपको याद दिला देते हैं, ‘दो मिनट रुक सकते हैं, सिर के बल रह सकते हैं क्योंकि.. बड़ी गजब की भूख लगी, मैगी चाहिए मुझे अभी.’

जी हां, बचपन में तो खाना खाने के बाद भी भूख लग जाती थी और वह भूख मैगी के लिए होती थी. हॉस्टल के कितने ही दिन मैगी के भरोसे गुजरे.

मुझे लगता है आज बहुत कम लोग होंगे जिन्हें मैगी पसंद न हो. शायद ही कोई घर हो जहां मैगी ने अपना जगह न बनाई हो और आज से नहीं सालों साल से लोग मैगी के लोग दीवाने रहे हैं.

कहीं न कहीं लोग बड़े ब्रांड पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि खुला सामान लेने से अच्छा है अच्छे ब्रांड का पैक्ड सामान लेने में भलाई है. हम अच्छी गुणवत्ता के लिए अच्छे पैसे भी देने को तैयार रहते हैं. यही कारण है कि ब्रांड पर आंखमूंद कर भरोसा कर लेते हैं. लेकिन मैगी की गुणवत्ता पर सवाल उठे तो खाने की और चीजें भी शक के घेरे में आ गईं.

ऐसी कितनी ही चीजें हैं जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में खुद भी खाते हैं और अपने बच्चे और परिवार को भी खिलाते हैं. हम सेहत से समझौता न करने के बदले ज्यादा पैसे देते हैं लेकिन बदले में हमें क्या मिल रहा है?

मैगी की गुणवत्ता पर यूपी में सवालिया निशान लगा. फिर तो ये सिलसिला पूरे देश में चल पड़ा. मैगी को बाय-बाय कहने का वक्त भी आ गया. लेकिन सिर्फ मैगी ही क्यों? क्या बाजार में मिल रही खाने-पीने की बाकी चीजें सुरक्षित हैं? कहीं हम ज्यादा पैसे देकर भी सेहत से समझौता तो नहीं कर रहे? ये नामी कम्पनियां हमारे साथ धोखा कर रही हैं? ऐसे ही जाने कितने सवाल हैं जो हर किसी के मन में उठ रहे हैं.

लेकिन एक सवाल यह भी है कि आज हमारी जिंदगी इन्हीं बाजार की चीजों पर निर्भर है. हम तो आंख बंद करके इन चीजों को इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं. क्योंकि हमारे पास इसके अलावा विकल्प ही क्या बचता है?

मैगी पहला मामला नहीं है. पहले भी खाने-पीने की दूसरी चीजों में हानिकारक तत्व मिलना, कभी खाने की चीजों में मिलावट, कभी कीड़े मिलना जैसी बातें सामने आती रही हैं.

मुझे समझ नहीं आता कि ये कंपनियां जब भारत में पांव पसार रही होती हैं. लोगों की जुबान पर चढ़ रही होती हैं तब इन चीजों की जांच क्यों नहीं की जाती. उस वक्त ये खाद्य सुरक्षा विभाग कहां सोया रहता है. जाने कितने वक्त से हमारे साथ ये धोखा हो रहा था? लेकिन हमारी जान इतनी सस्ती है कि कंपनियां अपना खेल, खेल रही थीं और सरकार सो रही थी.

अब मैगी का एड करने वाले सितारों पर भी केस दर्ज हो गया है उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही जा रही है. फिर तो ये कार्रवाई उन विभागों पर भी होनी चाहिए जिन्होंने अपना काम सही तरीके से नहीं किया. असली सजा के हकदार तो वही हैं.

मैगी का मामला सामने आने के बाद अब मै जब भी खाने का कोई सामान खरीद रही होती हूं तो दो मिनट रुकती हूं, सोचती हूं… फिर सामान खरीदना ही पड़ता है क्योंकि… हमारे पास विकल्प ही क्या है?

गर्मी का मौसम है तो ज़ाहिर सी बात है गर्मी होगी ही और होनी भी चाहिए क्योंकि कहा भी जाता है कि मौसम को मोटे तौर पर जाड़ा गर्मी बरसात के खानों में बांटा गया है और हर मौसम का अपना मज़ा और नुक्सान दोनों ही हैं.

गर्मी के मौसम में गर्मी की मार से यूं तो सभी बेहाल हैं क्या आम और क्या खास सभी पर गर्मी की तपिश भारी पड़ रही है.

ये दीगर बात है कि उच्च तबके को इसकी तपिश का एहसास कम होता है या यूं कहे कि कम वास्ता पड़ता है तो ग़लत ना होगा, उच्च तबके के पास एसी घर हैं एसी ऑफिस हैं और एसी कारें हैं और तमाम साधन हैं तो वो तो गर्मी से मात खाने से रहे.

अब बात करते हैं इससे नीचे के तबके के लिए जिनके लिए मौसम शायद ही कभी रूमानी होता है और कभी वो भी मौसम के मिज़ाज से कदमताल करते चहकते हों.

भीषण गर्मी हो या जाड़ा तेज़ बारिश हो या आंधी तमाम ऐसे लोग हैं जिनको काम के लिए अपनी रोजी रोटी की तलाश में घर से बाहर निकलना ज़रुरी ही नहीं बल्कि मज़बूरी भी है आखिर अपना और अपने परिवार का पेट जो पालना है.

ऐसे तमाम लोगों के लिए भीषण गर्मी और लू का प्रकोप इस साल बेहद जानलेवा साबित हो रहा है.

मेरे कहने का तात्पर्य ये नहीं है कि इस साल गर्मी और लू कोई अनूठे अंदाज़ में आई है बल्कि ये है कि इस साल मई का महीना जाते जाते ही पूरे देश से गर्मी और लू के चलते जो मौत के आंकड़े सामने आ रहे हैं वो खासे डराने वाले हैं.

सूत्रों के मुताबिक इस साल अबतक ये आंकड़ा करीब 2000 को पार कर चुका है.गर्मी का सबसे ज्यादा असर दक्षिणी राज्यों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में है.

सबसे ज्यादा मौतें भी यहीं हुईं हैं, मरने वालों में ज्यादातर मजदूर शामिल हैं. गर्मी और लू से मौत के मामले उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम पंगाल में भी सामने आए हैं.

कहीं पारा 44 तो कहीं 46 और 47 तो कहीं 48 को भी छू रहा है.डाक्टरों के मुताबिक हीटस्ट्रोक या लू लगने का अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो पीड़ित व्यक्ति की मौत हो सकती है और गर्मी और लू से मरने वाले ज्यादातर लोगों की मौत का यही कारण बताया जा रहा है.

मरने वालों में अधिकतर ग़रीब और दिहाड़ी मज़दूर हैं, जिन्हें काम की तलाश में अक्सर खुले में खडा रहना पड़ता है.

पारे का तीखापन बढ़ता ही जा रहा है और गर्मी से जूझने के तमाम उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं और मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है.

गर्मी और लू पहले भी पड़ती थी लेकिन तब मौतों की संख्या इतनी ज़्यादा नहीं होती थी तब शायद प्रकृति के साथ इतना खिलवाड़ करने की लोगों की प्रवृति नहीं थी और प्रकृति भी हमें कई आपदाओं से महफूज़ रखती थी.

लेकिन ज्यों ज्यों हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होते गए और वनों को साफ करने की मुहिम में अंधाधुंध जुटे हुए हैं.

नए पेड़ तो बहुत थोड़ी तादात में लग रहे हैं और शहरों से पेड़ साफ होते जा रहें हैं.

थोड़ा फ्लैशबैक में जाते हैं हम सभी ने अपने बचपन में पेड़ों के नीचे कितने खेल खेले और गर्मियों के मौसम में भी पेड़ों की छांवों में गर्मी की छुट्टियां मजे से बिताईं हैं.

तब लोगों के पेड़ों की घनी छांव से लोगों को बड़ा आसरा होता था और उसकी छांव में वो गर्मी को मात देते रहते थे.

लेकिन समय बदला और हम आधुनिक होते गए और छांव देने वाले पेड़ हमें चुभने लगे तो क्यों ना उन्हें साफ कर दिया जाए इसी सबमें लोग जुटे हैं.

अब प्रकृति के साथ खिलवाड़ करेंगे तो प्रकृति तो अपनी रौद्र रुप दिखाएगी ही, इसी का परिणाम है कि भीषण गर्मी और लू से इस साल मौतों की तादात खासी बढ़ी है.

प्रकृति मूक रहकर भी हमें कई संकेत देती है और इसको अभी भी ना समझे तो आने वाले समय में और भी बढ़ी तबाही के लिए तैयार रहना होगा.

मोदी सरकार ने तमाम वादों की फेहरिस्त में 25 मई को एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया.

अपनी सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने के मौके पर मथुरा में आयोजित ’जनकल्याण सभा’ में पीएम मोदी ने अपनी उपलब्धियों को गिनाने के साथ ही कांग्रेस पर जमकर हमला बोला. इसके बाद कांग्रेस का तिलमिलाना स्वाभाविक था.

हालांकि कांग्रेस ने भी मोदी सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है. दोनों सरकारों की लडाई का विषय है देश की बहुसंख्यक गरीब जनता.हालांकि यह बात अलग है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के घोटालों से ऊबकर ही जनता ने सत्ता परिवर्तन किया था.

लेकिन अब यहां देखना यह है कि जिन वादों के साथ मौजूदा सरकार सत्ता में आयी थी उस पर उसने कितना काम किया. वह भी ऐसे मौके पर जब वह अपना एक वर्ष पूरा कर चुकी है.

मोदी ने एक वर्ष पूरा होने के पश्चात जनता के नाम एक पत्र लिखा. उन्होंने लिखा कि प्रमुख फैसले लेने के समय हमेशा वंचित, गरीब, मजदूर और किसान उनकी आंखों के सामने रहते हैं.

जनधन योजना में हर परिवार का बैंक खाता और प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना एवं अटल पेंषन योजना इत्यादि. लेकिन इन साभी योजनाओं का क्या मतलब है जब देश की आधी आबादी से ज्यादा भूखे पेट ही सोते हों.

देश में कितने गरीब हैं यह विषय हमेशा से विवादों भरा रहा है. लेकिन फिर भी पिछली यूपीए सरकार ने गरीबी का जो मानक तय किया था उसके मुताबिक सामाजिक, आर्थिक व जातिगत जनगणना का काम 2011 में शुरू किया था क्योंकि इसके पूरा नहीं होने से सबसे महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा कानून में अडचनें आ रही थी.

देश के साढे छह सौ जिलों में से बमुश्किल अभी तक सवा सौ जिलों में ही जनगणना का काम पूरा हो पाया है. इसमें से भी गरीबी से बुरी तरह से प्रभावित यूपी और बिहार में यह काम ना के बराबर ही हरे पाया है. जिछली सरकार के कामकाज की रफ्तार का खामियाजा तो उसने पिछले लोकसभा चुनाव में ही चख लिया था.

वहीं अब अगर मौजूदा सरकार की बात करें तो हर बात पर गरीबों के नाम का दम भरने वाले मोदी ने इस कार्य को तेजी से क्यों नहीं बढाया हालांकि इसके लिए सिर्फ केंद्र सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कयोंकि जनगणना का काम सबसे पहले राज्यों का है, केंद्र तो बाद में योजना क्रियान्वित करेगा.

दोषी इसलिए भी ठहराया जा सकता है क्योंकि मेक इन इंडिया कार्यक्रम शुरू करने के बाद मोदी ने टीम इंडिया का एलान किया था.मतलब किसी भी योजना का कार्यान्वयन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सलाह और सहयोग के साथ हो. इस सबके बावजूद भी टीम इंडिया अभी तक यह तय नहीं कर पायी है कि देश में गरीब कितने हैं.

मौजूदा समय में तो केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-2 ढपली पीटकर स्वयं का गुणगान कर रही हैं. और इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं कि मोदी की टीम इंडिया मस्त और जनता पस्त.

किसी परिवार में कितने लोग भूखे सो रहे हैं जाने बगैर मुखिया परिवार कैसे चलाएगा. मौजूदा सरकार की उपरोक्त सभी योजनाएं तभी कारगर साबित होंगी जब देश के हर गरीब के पेट में दोनों वक्त भोजन का निवाला जाएगा.

एक औरत अपने तीन बच्चों को लेकर मेट्रो में चढ़ी जिसमें दो बेटियां और एक बेटा था. इन्हें बैठने के लिए दो सीट ही मिल पाई बच्चा बड़ा परेशान था बैठने के लिए, मां ने कहा बेटा दीदी को बैठने दो, बेटा गुस्से में बोला मां तुम दोनों दीदी को अपने साथ लेकर ही क्यों आई…क्या जरूरत थी इन्हें लाने की.. मां मायूस, अब कैसे बताती बेटा तुम्हें दुनिया में लाने के चक्कर में ये दोनों आ गई.

वरना हमारा देश कितना भी विकास की ओर अग्रसर हो जाए लोग तो बेटियां पैदा करने के लिए मुझे ही दोषी ठहराएंगे. कारण वही पुराने घिसे पिट्टे बेटा बुढ़ापे में कौन साथ देगा और फिर समाज के रस्मों रिवाज का निपटारा भी तो वही करेगा. चुपके से एक बात और बता दूं बेटा पैदा करने से समाज और खुद मां भी गर्व महसूस करती है. रिश्तेदारों के बीच थोड़ी चाल और वाणी में दम आ जाता है. महसूस किया है मैंने.

सच बताऊं तो बेटा पैदा करने की उम्मीद का शहर और गांव से कोई लेना देना नहीं होता. ये बस एक सोच है एक घिसा हुआ सा टॉपिक. बहुत आर्टिकल लिखे गए…कंधे उचका के बहुत भाषण कहे गए बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता लेकिन ऐसा नहीं है हमारा समाज अभी भी इतना मार्डन नहीं हो पाया है कि इस सोच और सच के साथ चल सके. एक आईएएस…आईपीएस…डॉक्टर के बेटे की मां से पूछिए कितनी खुश होगी, बेटा वो भी इस ओहदे पर….शादी में लड़की के साथ दहेज लाने का क्राइटेरिया फिक्स है, मोल भाव में ज़रा सा भी कम में बात नहीं बनेगी ये अलग बात है कि चाहे लड़के ने पढ़ाई के दौरान कितनी बार पढ़ा हो कि दहेज लेना देना अपराध है. बेटे-बेटी में कोई अंतर नहीं लेकिन क्या फर्क पड़ता है जब बात खुद पर आती है तो समाज के साथ तो आपको चलना ही होगा. यही बेटी पैदा होती तो बाप की झुकी हुई कमर साफ नज़र आ जाती.

अगर आप बेटे के सुख से वंचित है और बेटा पैदा करके समाज में प्रतिष्ठा पाने का शौक है तो चिंता मत कीजिए इसके लिए आप दवाई भी ले सकती हैं शर्तिया बेटा पैदा होगा. ऐसे गंभीर मामलों में जरा सी भी चूक नहीं होनी चाहिए..

मेरी बातों से जरा सा भी ये निष्कर्ष नहीं निकालइएगा कि मां खुद भी ऐसा चाहती है. नहीं, समाज…आस पास के लोग…परिवार के लोग..ऐसा सोचने पर मजबूर कर देते हैं. लेकिन वक्त मिले तो आप भी जरा सोचना, एक बच्चे की मुस्कान ज्यादा प्यारी होती है या उसका बेटा या बेटी होना.

दहेज…पढ़ाई..खर्च…इज्जत…बेटी के साथ आखिर क्यों इतने भारी भरकम शब्द रख दिए जाते हैं. खैर, मैं तो बस इतना ही कहना चाहूंगी कि मैं भी दो बेटियों की मां हूं….मेरी जिंदगी की रौनक और गर्व हैं मेरी दो बेटियां, मैं खुश हूं और अपनी बेटियों को खुश रखने का सामर्थ्य रखती हूं, आपकी हेय दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा…माफ कीजिएगा.

एक-दो दिनों से हमें अपना बचपन याद आ रहा है. हम गांव में रहते थे. पूरे दिन इधर-उधर खेत-खलियान में घूमते थे. कई बार कांटे भी चुभ जाते थे. तब हम नागफनी ढूंढ़ते थे.

नागफनी का लंबा, नुकीला मजबूत कांटा चुटकी में कांटे को निकाल देता था. तब यह मुहावरा पता भी नहीं था कि ‘कांटे से कांटा’ निकाला जाता है. लेकिन जान जरूर लिया था कि कांटा निकालने के लिए कांटे का ही इस्तेमाल करना चाहिए. सेफ्टीपिन का नहीं उससे नासूर बन जाता है.

हां, सेफ्टीपिन से कांटा निकालने से नासूर बनते देखा भी है, लेकिन हैरान हूं अब तलक हमारे देश के नेताओं ने क्यों नहीं समझा, क्यों नहीं उनके जेहन ये बात आयी कि ‘कांटे से कांटा’ से निकाला जाता है.

हमारे रक्षा मंत्री ने पहली बार ये बात कही तो लोग चौंके क्यूं? क्यों हैरान हूए? हमने अब तक कांटों को सेफ्टीपिन से निकालने की कोशिश की, जिसका नतीजा यह हुआ कि यह नासूर बना ही नहीं बढ़ता गया.

रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर के आतंकियों के संदर्भ में कहा गया मुहावरा ‘कांटे से कांटा निकालना’ पड़ोसी देश  को चुभ गया है. पाक बौखला गया है, अपने देश की सियासत में भी खलबली मच गयी, विपक्षी पार्टी सरकार को कोसने लगी, नैतिकता का हवाला देने लगी. रक्षा मंत्री के बयान से नाराज मुख्य विपक्षी दल ने इसके सुबूत देने या फिर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की बात तक कह डाली. यही राजनीति भी है.

हम भी इस बात से सहमत हैं कि उन्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए थी. ऐसी बातें कही भी नहीं जाती. कौटिल्य ने भी कहा है करने वाली बातें नहीं कहनी चाहिए. कूटनीति यही कहती है.

आतंकवाद हमारे देश का बड़ा नासूर है. देश में कितनी आतंकी घटनाएं हुईं? कितनी जानें गयीं? अंगुलियों पर नहीं गिने जा सकते. कितने घर बर्बाद हुए, कितने बच्चे अनाथ हुए, कितनी महिलाएं विधवा हो गईं, किसी से छुपा नहीं है.

दुखद बात तो यह है कि इन आतंकियों से लड़ते-लड़ते हमारे हजारों जवान शहीद हो गए. हम हैरान हैं कि आतंकवाद से निपटने के मुद्दे पर हमारे राजनेता सिद्धांत और नैतिकता की बात कैसे कर रहे हैं. उनसे निपटने के लिए अब तक वाजिब रास्ता नहीं ढूंढा.

क्या इन्होंने बम धमाके की घटनाएं नहीं दिखी, बम विस्फोट की आवाज इनके कान तक नहीं पहुंची. ऐसे नेताओं को अगर इनके सामने आंकड़े और सबूत पेश कर दिया जाएं तो वह अंधों के सामने आईना दिखाने जैसा ही होगा.

अब बात पाकिस्तान की है. रक्षामंत्री की बात पर उसका बौखलाना लाजमी है. किसी से छुपा नहीं है. आतंक की पौध कहां लगी है? कौन सींच रहा है? और इसके पीछे किसका हाथ है. अगर पड़ोसी देश के पास नैतिकता और मानवता जैसी चीज नहीं है तो हम क्यों सिद्धान्त बघार रहे हैं.

दुख तो इस बात का है कि नैतिकता और सिद्धान्त की बात करने वाले अपने ही नैतिक ग्रंथों को ठीक से समझ नहीं पाएं, जहां लिखा है, जो नहिं दंड करों सठ तोरा है भ्रष्ट होइ श्रुति मारग मोरा.

ये बात भी सही है कि रक्षा मंत्री पार्रिकर ने ऐसी बात कहकर भारत के लिए कूटनीतिक मुसीबत खड़ी की, उन्हें रक्षा मंत्री के तौर पर औपचारिक रूप से ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी. हालांकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने स्थिति को संभालने की कोशिश की और पार्रिकर ने भी बयान से पलटने का प्रयास किया. लेकिन कहते हैं ‘तीर कमान से और बात जबान से’ निकलने के बाद वापस नहीं आती.

हम तीन दशक से आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं. इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं. सरकार आतंकवादियों से जूझती रही, चिन्ता व्यक्त करती रही पर सही विकल्प नहीं ढूंढ पायी. अगर पिछली सरकारों ने इसका सही इलाज किया होता तो आज ‘कांटे से कांटा’ का मुहावरा नहीं पढ़ा जाता.

आतंकवाद अब देश का सबसे बड़ा नासूर बन चुका है. चाहे कांटे से हो या लेजर से…अब इसका सही इलाज जरूरी है. पर एक बात यह भी सच है कि कांटा निकालना है तो नागफनी तलाशनी होगी. गोस्वामी तुलसी दास ने भी कहा है ‘जेही मोहे मारा तेही मैंने मारा’.

क्या आप जानते हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा दी जाने वाली चीज क्या है… मुझे लगता है इसका जवाब है, सलाह.

जी हां, क्योंकि अगर आप अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो आपको बिन मांगे ही ढेरों सलाह दे डालेंगे. जैसे कि आप क्या पढ़े, कहां जाएं, क्या करें, क्या न करें. यहां तक कि लोग यह सलाह देने से भी नहीं चूकते कि आप क्या खाएं और क्या पहनें.

अगर आप देखें तो यह आप का निजी मामला है कि आप क्या खाएं और क्या पहनें, लेकिन सलाह देने वाले तो आदत से मजबूर हैं ना.

अब अगर मैं आपसे अगला सवाल करूं कि सबसे कम ली जाने वाली चीज? तो आपका जवाब क्या होगा. ….इसका भी जवाब सलाह ही है.

दरअसल, लोग बिना मांगे ढेरों सलाह दे डालते हैं. लेकिन अंतिम निर्णय तो आपका ही होता है.

शायद ऐसे लोग यह नहीं जानते कि कई बार वह अपनी बिन मांगी सलाह देकर लोगों को कन्फ्यूजन और दबाव में तो डालते ही हैं. साथ ही कई बार ऐसे लोग दूसरों के लिए परेशानी भी खड़ी कर देते हैं.

ऐसे मुफ्त की सलाह देने वाले लोग अगर किसी पैरेंट्स को बच्चों के पालन-पोषण और करियर के संबंध में सलाह दे डालें तो बच्चे के लिए परेशानी, पति या प्रेमी को सलाह मिली तो प्रेमिका और पत्नी की परेशानी, मरीज और उसके परिजनों को मिले तो उनकी परेशानी बढ़ जाती है.

तो ऐसे मुफ्त की सलाह देने वालों को मेरी भी एक मुफ्त की सलाह है कि प्लीज दूसरों को सलाह देने के बजाए आप खुद पर ध्यान दें और अपनी कीमती सलाह को मुफ्त में बांटने की बजाय मांगने पर ही दें.

इस तरह आपकी सलाह की कीमत भी बढ़ जाएगी और दूसरे भी परेशानी से बच जाएंगे.

हालांकि मेरी यह मुफ्त की सलाह पता नहीं ली जाएगी या नहीं…

सत्ता के एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पीएम मोदी और उनकी ब्रिगेड ने सरकार की उपलब्धियों का बखान शुरू कर दिया है.

मोदी सरकार अगले 15 दिनों में देशभर में करीब 100 रैलियां आयोजित करेगी जिसकी अगुवाई बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री करेंगे.

उपलब्धियां इसलिए गिनाने जा रही है क्योंकि मोदी कैबिनेट के मुताबिक मीडिया सरकार की उपलब्धियों को पूरी तरह से जनता तक नहीं पहुंचा रही.

हालांकि देखा जाए तो पिछले आम चुनावों में इसी मीडिया ने मोदी के वादों को देश की आवाम तक पहुंचाया था. सरकार के इतने बडृे आरोप के बाद भी मीडिया का एक बडा तबका एनडीए सरकार के प्रति अभी भी सकारात्मक है.

आमतौर पर सरकार की उपलब्धियों का आकलन कार्यकाल के अंतिम पड़ाव में किया जाता है.

लेकिन इतनी जल्दी आकलन भी एक बडा सवाल खडा करता है. कहीं मोदी सरकार यूपी, बिहार के चुनावों को देखते हुए मीडिया के जरिए जनता के अंतर्मन को तो नहीं टटोल रही.

सरकार की उपलब्धियों का इतनी जल्दी मूल्यांकन भी शायद मोदी के भावनात्मक चुनावी वादों से जुडा है. क्योंकि जिन्होंने मोदी को वोट दिया है वह चाहे बेरोजगार, किसान, गरीब, मध्यमवर्ग हों इन सभी को एक वर्ष में कुछ हासिल होता नहीं दिखाई दे रहा.

मोदी द्वारा किए गए बडे चुनावी वादों को अगर छोड दिया जाए तो भी छोटे-2 वादों पर भी सरकार अभी तक खरा नहीं उतर पाई है.

मसलन किसानों की फसल के सही दाम, अनाज, सब्जी मंडियों से बिचैलियों का सफाया, बेरोजगारों का अपने, गांव शहर से पलायन, ट्रेनों की लेटलतीफी, शिक्षा के क्षेत्र में माफियाराज और मध्यमवर्ग की अनदेखी आदि.

ऐसी समस्याओं को तो सरकार अविलम्ब सुधार सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हालांकि जनधन, जीवन बीमा सहित कुछ जनउपयोगी योजनाओं को सरकार ने जरूर शुरू किया है.

मोदी के आलोचकों में कुछ लोग उनकी वनमैन आर्मी की छवि को भी करार देते हैं. अभी हाल ही में ब्रिटेन की चर्चित पत्रिका इकोनामिस्ट ने मोदी को वन मैन बैंड करार दिया है. इसी के साथ उनकी एक तस्वीर भी छापी है जिसमें मोदी कई वाद्य यंत्रों के साथ नजर आ रहे हैं.

विदेशनीति की अगर बात करें तो सरकार कमोवेश पूर्ववर्ती आलोचित यूपीए सरकार के समकक्ष ही खडी दिखाई देती है. समस्या जस की तस है. वह चाहे पाकिस्तान का गुस्ताख रवैया हो, चीन का अडियल रुख. अमेरिका, जापान यात्रा से भी मोदी को कुछ खास हासिल नहीं हुआ. और रूस के साथ संबंध भी पूर्ववत ही हैं.

भूमि अधिग्रहण मुददे पर भी अगर देखा जाए तो मोदी सरकार बैकफुट पर है. मोदी सरकार महात्मा गांधी, लोहिया और दीनदयाल के आदर्शों पर चलने की बात करती है लेकिन आज अगर वह होते तो सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति का शायद विरोध ही करते.

इसलिए सरकार को दूसरे पर पलटवार करने से अच्छा है कि चुनाव के समय किए अपने वादों को अच्छी तरह से याद कर उनपर अमल करना शुरू कर दे.