आम आदमी पार्टी की सभा में एक आम आदमी की खुदकुशी पर सभी अपनी सहानुभूति दिखा रहे हैं. सभी को उसकी मौत पर गहरा सदमा पहुंचा है. वह चाहे नेता हो, पुलिस हो, मीडिया या वहां मौजूद भीड़.

किसान ने खुदकुशी किसी सुनसान जगह पर नहीं की बल्कि देश का दिल कही जाने वाली दिल्ली के मशहूर जंतर-मंतर पर की है. वह भी ऐसे समय जब वहां हजारों की तादात में लोग अपने चहेते मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सुनने के लिए इकट्ठे हुए थे.

आप को बता दें कि यह वही केजरीवाल हैं जोकि आम आदमी की मदद के लिए बिजली के खंभों पर पलक झपकते ही चढ़ जाया करते थे.

गौरतलब है कि राजस्थान के जिला दौसा के गांव नांगल झमरवाड़ा के रहने वाले किसान गजेंद्र ने आम आदमी की सभा में बुधवार को जंतर-मंतर के पास एक पेड़ से लटककर खुदकुशी कर ली.

इस साल फसल की बर्बादी के बाद किसानों की मौत के आंकड़ों की अगर बात करें तो महाराष्ट्र में 601, उत्तर प्रदेश में 599, तेलंगाना में 106, राजस्थान में 21, हरियाणा में 10 और पंजाब में 7 ने खुदकुशी की है.

लेकिन इन सभी किसानों की खुदकुशी से जंतर-मंतर पर किसान द्वारा की गयी खुदकुशी में जमीन आसमान का फर्क है. क्योंकि यह खुदकुशी जिस समय की गयी उस समय वहां हजारों की भीड़ में आम आदमी, आम आदमी के मसीहा बने आम आदमी पार्टी के नेता, पुलिस और पत्रकार सभी मौजूद थे. किसी का दिल किसान के जिंदा रहते नहीं पसीजा. किसी ने उसके प्रति अपनी सहानुभूति नहीं दिखायी.

आम आदमी की मौत के बाद उसके मौत की जिम्मेदारी अब कोई नेता तो ले नहीं सकता क्योंकि मरने के बाद उसका नाम तो वोटर लिस्ट से अपने आप ही खत्म हो गया.

पुलिस ने यह जिम्मेदारी लेने से साफ इंकार करते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया. आम आदमी वहां केजरीवाल को सुनने में मशगूल थे.

फिर क्या था आरोप-प्रत्यारोप की मानो बाड़ सी आ गयी.

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा हम तो कहते रहे पुलिस से बचाओ पर वह बैठी रही. पुलिस मेरे कंट्रोल में नहीं है.

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने व्यंगात्मक लहजे में कहा कि यह तो केजरीवाल की गलती है जो पेड़ पर नहीं चढ़े अगली बार अगर ऐसा हादसा हुआ तो उन्हें पहले से ही पेड़ पर चढ़ा देंगे.

कुमार विश्वास ने तो हद ही खत्म कर दी. उन्होंने उल्टे मीडिया से ही सवाल दाग दिया. उन्होंने कहा आप क्या टीआरपी बढ़ा रहे थे? आप ने क्यों नहीं बचाया?

इसके अलावा और सभी पार्टी के नेताओं ने एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया.

इन सभी नेताओं के कमेंट्स के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने करारा जवाब दिया. लोगों ने ट्वीट कर केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को गिद्ध करार दिया. कि किसान मरता रहा और यह दोनों गिद्ध की तरह देखते रहे.

राजस्थान में विपक्षी नेता सचिन पायलट ने किसान के दाह संस्कार में पहुंचकर उसे श्रद्धांजलि दी.

देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आनन-फानन में दिल्ली के पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी को मामले की जांच का आदेश दिया.

दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने खुदकुशी के एक दिन बाद मृतक किसान के परिजनों को 10 लाख रुपये अनुग्रह राशि देने का एलान किया.

बात अगर मेन घटना की करें तो प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक वह सभा शुरू होने के कई घंटे पहले ही पेड़ पर चढ़ चुका था. नेताओं को अपनी व्यथा-कथा सुनाने के लिए वह काफी देर तक इशारे करता रहा. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आने के बाद भी वह इशारे से कुछ कहता देखा गया और कुछ परचे भी वहां फेंके लेकिन किसी ने गौर नहीं किया.

अब सवाल यहां जो सबसे बड़ा है वह यह कि देश के इस तरह के हजारों किसान खुदकुशी के कगार पर पहुंच चुके हैं लेकिन इन नेताओं ने सदन से लेकर बाहर तक केवल राजनीतिक बयानबाजी के अलावा कुछ नहीं किया.

किसान गजेंद्र ने जो फांसी लगायी है शायद उसकी समस्या 2 या 4 लाख रुपये में हल हो जाती लेकिन सरकार नहीं चेती. हालांकि उसके मरने के बाद उसके परिवार वालों को 10 लाख रुपये देने का एलान किया है.

देश के हुक्मरानों से मैं कहना चाहता हूं कि क्या जिंदा आम आदमी से मरा हुआ ज्यादा कीमती होता है?

राजस्थान का किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर फांसी लगाकर मर गया. या मार दिया गया?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनके हजारों ‘आप’ कार्यकर्ता आंखें फाड़-फाड़कर देखते रहे. किसान चोरी छिपे नहीं मरा. हजारों की भीड़ के सामने मर गया. फांसी लगाकर मर गया. लोग देखते रहे. फिर दोष किसका?

कोई शक नहीं कि पहली नजर में दोष पुलिस पर जाएगा. पार्टी के नेता कुमार विश्वास हो, संजय सिंह या फिर खुद अरविन्द केजरीवाल, सबने उसकी मौत के लिए पुलिस पर दोष मढ़ा.

तीनों ने मुक्तकंठ से मारे गये किसान गजेन्द्र का महिमामंडन किया और कहा कि पुलिस ने बचाने की कोशिश नहीं की. उसके बाद उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से बचाने की अपील की.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल गजेन्द्र को बचाना चाह रहे थे या फिर बचाने का नाटक कर रहे थे? ये सवाल इसलिए क्योंकि अरविन्द केजरीवाल क्या अपनी पुरानी मांग इस किसान की जान के बूते केन्द्र सरकार के सामने रखना चाह रहे थे कि दिल्ली पुलिस उनके नियंत्रण में नहीं है?

इस घटना के पीछे ये सच या सोच थी तो ये बेहद शर्मनाक और निंदनीय है.

दूसरी बात ये भी गौर करने वाली है कि आत्महत्या करने वाले गजेन्द्र की जेब से सुसाइट नोट मिला है. जिसमें उसने अपने को परिवार से भगा देने का आरोप अपने पिता पर लगाया है और अंत में ‘जय जवान जय किसान’ का नारा लिखा था.

क्या ये शक नहीं होता कि कोई भी किसान अपनी चिट्ठी में नारा नहीं लिखता. ये भाषा केवल और केवल आन्दोलनकारी की ही हो सकती है.

हो सकता है कि मौत के शिकार हुए गजेन्द्र नाम का युवक कोई किसान नहीं बल्कि आप कार्यकर्ता हो जो अपने अरविन्द केजरीवाल लिए जान देकर भाषण का बड़ा प्लॉट तैयार कर रहा होगा. और इसमें उसकी जान चली गई.

तमाम सवालों के जवाब ढूंढने के लिए जांच के आदेश केन्द्र सरकार की तरफ से दे दिये गये हैं.

बहरहाल, प्रथम दृष्टि में दोष दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर जाता है. वो और उनके कार्यकर्ता सरेआम किसान को पेड़ पर गमछे से फांसी लगाता हुआ देखते रहे. किसान की मौत का तमाशा बना दिया. हां तमाशा.

उनकी राजनीति को लोग राजनीति कम तमाशा ज्यादा कहते हैं. वही तमाशा जिसमें उनकी पार्टी आपस में ही गुत्थम-गुत्थी कर रही है. संवेदनशील और भावनात्मक मसलों को उठाकर दिल्ली की गद्दी हासिल करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने किसानों की आत्महत्या की संख्या को और बढ़ा दिया.

भले ही दिल्ली में किसान नाम भर के हों वो भी करोड़ और अरब पति होंगे. ये अतिश्योक्ति नहीं कि किसान राजनीति के बहाने वो गृह प्रदेश हरियाणा की राजनीति दिल्ली में रहकर कर रहे हैं.

देश की राजधानी दिल्ली में किसान कैसे मर गया? उनके सामने कैसे मर गया? ये सवाल उनसे पूछकर होगा भी क्या? जिनके उसूल में अब तक केवल आन्दोलन और हंगामा खड़ा करना दिखता हो. उनसे इस सवाल का जवाब, दोषारोपण से ज्यादा क्या हो सकता है. जिस हालत में किसान की मौत हुई. उससे ये शक जाहिर होता है कि क्या ‘आप’ कार्यकर्ताओं ने उसे उकसाया? क्या ‘आप’ ने मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए ये खेल रचा? और खेल-खेल में ही इतना बड़ा कांड हो गया?

फसल की बर्बादी और भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर किसान की मौत जैसी संवेदनशील घटनाओं पर राजनीतिक रोटियां सेकने से नेता गुरेज नहीं कर रहे हैं. अरविन्द केजरीवाल ने कुछ खास नहीं किया था. इसलिए उन्होंने रैली की. शायद कांग्रेस की ‘बी’ टीम बतायी जाने वाली ‘आप’ ने उसका अनुकरण किया.

आपको याद होगा कि राहुल गांधी ने 59 दिनों के अज्ञातवास से लौटने के बाद अपनी रिलॉन्चिंग में सदन से बाहर निकलकर राहुल गांधी ने कहा कि ‘किसानों को लेकर अच्छा भाषण दिया लेकिन जवाब सही नहीं मिला’.

गौर कीजिए अच्छा भाषण दिया, ये कहकर राहुल गांधी ने फिर नौसिखिये नेता वाली अपनी छवि को सामने ला दी. या फिर कांग्रेस ने करीब 65 साल के अपने शासन के दौरान किसानों के दर्द पर केवल भाषण दिया है, अन्दर की बात बाहर कर दी.

खैर, किसानों की मौत को जितनी हवा दी जा रही है, उतनी ही ये बढ़ रही है. तो क्या ‘भाषण’ का दूसरा संस्करण कांग्रेस की ‘बी’ टीम ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी किया? जिसमें किसान की जान ही ले ली गई.

किसानों को भी इस घटना के बाद समझ लेना चाहिए कि आत्महत्या के मुद्दे से ज्यादा वो नेताओं के मोहरे बन रहे हैं. जिनके साथ वो राजनीति के शतरंज की बाजियां खेल रहे हैं. अपनी रैली में भी किसान की मौत पर भी क्या ‘आप’ आन्दोलन करेगी?

जी हां ये शीर्षक लिखने का मेरा मकसद प्रेमी प्रेमिका या दोस्तों के किए गए वादों से नहीं हैं ना ही मैं किसी ऐसे वादों की बात कर रहा हूं जो व्यक्ति विशेष से जुड़े हैं.

हम बात कर रहे हैं ऐसे वादों की जिनका सरोकार भारत की करोड़ों जनता से है जिन्होंने इन्हीं वादों के भरोसे ना सिर्फ अपना वोट दिया बल्कि अपना बहूमूल्य विश्वास भी इसके साथ दिया था.

साल भर पीछे चलते हैं केंद्र में सत्तारुढ़ मोदी सरकार को सत्ता संभाले हुए करीब साल भर होने को आ रहा है.

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देश में प्रचंड बहुमत पाने से पहले जनता से तमाम वायदे किए थे जिनमें प्रमुख था काले धन को वापस लाने का वायदा जिसमें कहा गया था कि ब्लैक मनी वापस आने पर हर व्यक्ति के खाते में कई लाख रुपये आ जाएगा.

काले धन वापसी को लेकर मोदी ने जो तेजी अपने भाषणों में दिखायी थी शायद उतनी तेजी उसे लाने के प्रयासों में नहीं दिखती है. हां ये जरुर है कि जस्टिस शाह कमेटी का गठन कर दिया गया है लेकिन काले वापसी को लेकर कोई कंक्रीट वर्क फिलहाल तक तो सामने नहीं आया है.

मोदी ने करप्शन मिटाने का वादा किया था लेकिन करप्शन में कितनी कमी आई है ये तो जांच का विषय है लेकिन फिलहाल तो आम आदमी को कदम कदम पर करप्शन का सामना पहले भी करना पड़ता था आज भी करना पड़ रहा है भले ही इसमें थोड़ी बहुत कमी आई हो.

धारा 370 पर मोदीजी का जो वादा था उसका क्या हश्र हुआ ये कहने का विषय नहीं वह जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती सरकार में भाजपा की भागीदारी से साफ है कि इस वादे का क्या होगा.

अब बात करते हैं दिल्ली में हाल ही में गठित आम आदमी सरकार के वादों की.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 अप्रैल को ये कहकर चौंका दिया कि यदि पांच साल में उनकी सरकार ने चुनाव में किए गए 40-50 फीसदी वादे भी पूरे कर दिए तो यह बुरा नहीं होगा.

एक बार फिर बता दें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में रिकार्ड तोड़ बहुमत पाने से पहले दिल्ली की जनता से तमाम वादे किए थे.

चुनाव जीतने के तुरंत बाद से ही केजरीवाल के जिस वादे की हर तरफ चर्चा रही, वह है पूरी दिल्ली में फ्री वाई-फाई देने का वादा.

महिलाओं के ख़िलाफ अपराधों से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का वादा.

महिलाओं की सुरक्षा का अहम वादा. दिल्ली के गांवों में 20 नए कॉलेजों का वादा.

पूरी दिल्ली में सुरक्षा के लिए कई लाख सीसीटीवी कैमरे लगाने का वादा.

दिल्ली में सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाने का वादे की बात हो या महिलाओं की सुरक्षा का वादा इन वादों पर कितना काम हो रहा है ये फिलहाल तो साफ तौर पर नहीं ही दिखाई दे रहा है.

हां शुचिता और सबसे अलग होने का दावा करने वाली आप पार्टी की अंदरुनी रार किसी से छिपी नहीं है बल्कि इसकी छीछालेदर दिल्ली से निकलकर देशभर में फैल गई है.

यहां ये अहम है कि केजरीवाल सरकार ने बिजली बिल पानी को लेकर जो वादा किया था उसपर वह जरुर खरी उतरी है जिसकी फायदा दिल्लीवालों को मिल रहा है, लेकिन ये कब तक जारी रहेगा ये देखने वाली बात होगी.

बिहार में नीतीश सरकार के वादों की बात करें तो वहां भी कितने वादे पूरे हुए हैं ये बिहार की जनता बेहतर जानती है लेकिन बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और सत्ता बचाए रखने के कुत्सित खेल जरुर सामने आए हैं.

आंदोलन से उपजी नेता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वादों की बात करें तो वहां की स्थिति भी सबके सामने है.

और राज्यों की बात करें तो वहां भी राजनेताओं के किए गए वादों की स्थिति कमोबेश हर राज्य में यही देखने को मिलेगी.

और ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री का ये कह देना कि हमने जो 100 फीसदी वादे किए थे उसमें से 40-50 फीसदी वादे भी पूरे कर दिए तो काफी होगा ये तो वैसा ही है कि है कि इतना तो नहीं दे पायेंगे, इतना ही ले लो.

क्योंकि वादों का क्या है वो तो सत्ता पाने के लिए किए जाते हैं और नेताओं का एजेंडा साफ है कि सत्ता पाने के बाद तो हमें सत्ता की मलाई खाने दो और सत्ता का सुख भोगने दो क्योंकि वादे तो किए ही जाते हैं तोड़ने के लिए.

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हितेंद्र गुप्ता

कुछ दिनों से मुझे अपनी बड़ी बहन की करतूत याद आ रही है. हम गांव से बड़े शहर आये थे. मां ने बड़ी मशक्कत से दोनों बहनों का नाम एक अच्छे स्कूल में लिखवाया.

एक दिन बहन की लड़ाई एक क्लासमेट से गई. उसने बहन के हाथ में चूड़ियों से खरोच लगा दी तो बहन ने एक भद्दी सी गाली जड़ दी. उसके बाद मेरी बहन पूरे क्लास के लिए अछूत हो गई. बात टीचर-प्रिंसिपल तक पहुंची और मां की सारी मशक्कत पर पानी फिर गया. मां को शर्मसार होना पड़ा.

हम भी शर्मसार हुए. आज भी शर्मसार हो रहे हैं पर आज बहन की नासमझी और बचपना के लिए नहीं बल्कि अपने देश के नेताओं की बदजुबानी की वजह से. ये अभी-अभी गांव से नहीं आये और न ही बच्चे हैं. फिर ऐसी शर्मसार कर देने वाली बदजुबानी क्यों? ऐसे नेताओं को पार्टी और जनता अछूत क्यों नहीं मानती है. इन्हें पार्टी और समाज की तरफ से सजा क्यों नहीं दी जाती?

गाली देना ‘विरेचन’ यानी दूषित मनोविकारों को उचित रूप से निष्कासित करना है. हर किसी का मन आक्रोश में गाली देने का होता है. लेकिन सामाजिक नियंत्रण उसे रोकता है. हमारा ‘सुपर ईगो’ उसे संतुलित करता है. लेकिन सवाल है क्या हमारे नेताओं में ‘ईड’ ‘इगो ‘है  ‘सुपर इगो’ नहीं?

इनकी वजह से पूरा समाज शर्मसार हो रहा है. देश के नेतृत्व में ‘ओछा और छिछलापन’ आ रहा है. साहित्य हो या सर्वजनिक जीवन ‘असंसदीय’ भाषा वर्जित है. इसका ख्याल राजनेताओं को करना पड़ेगा. नहीं तो उन्हें नेत़त्व छोड़ना होगा.

ये ओछापन देश के तमाम पार्टी के नेताओं में दिख रहा है. यहां किसी पार्टी विशेष की बात नहीं की जा सकती. चाहे ये नेता हिन्दू हों या मुस्लिम, कांग्रेसी हों या भाजपाई, समाजवादी हों या नवोदित ‘आप’ नेता इन्हें अपनी जुबान पर नियंत्रण नहीं है.

हैरान करने वाली बात तो है कि साधु, संत, महिला और साध्वी नेत्रियों के बोल भी बेलगाम होते जा रहे हैं. पहले सभ्रांत कही जाने वाली एक महिला नेत्री की ही बात करें. ऐसे नेताओं की तो लंबी फेहरिस्त है.

हाल ही में एक साध्वी नेता ने नासमझी की हदे पार कर मुस्लमानों पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी. हालांकि बाद में इसपर उन्हें खुद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को लोकसभा में माफी मांगनी पड़ी.

इन नेताओं के ओछे बोल सर्वविदित है. यहां लिखना हम मुनासिब नहीं समझते लेकिन इनके कहे से हम शर्मसार हैं.

नितिन गडकरी, गिरीराज सिंह, शरद यादव, ममता बनर्जी, साध्वी निरंजना, आजम खान, भाजपा में साधु से नेता बने स्वामी चिन्मयानंद, वीके सिंह, अरविंद केजरीवाल, संजय निरुपम, मणिशंकर अय्यर, हैदराबाद के ओवैसी बंधु जैसे दर्जनों राजनेताओं ने हमें अपनी बदजुवानी और बड़बोलेपन की वजह से शर्मसार किया है. इन्हें खुद एक नहीं कई बार सदन और सदन के बाहर माफी भी मांगनी पड़ी है, लेकिन इनके बोल नहीं थम रहे.

इतिहास में ये राजनेता अपनी ऐसी ‘बोल’ की बजह से जाने जाएंगे. सवाल है कि आने वाली पीढी इन से क्या सबक लेगी और इसके बदले में इन्हें क्या देगी?

भट्टा पारसौल पार्ट-1 के बाद एक बार फिर से भट्टा पारसौल पार्ट-2 के जरिए राहुल गांधी को रीलांच किया गया. पहली बार की असफलता को देखते हुए कांग्रेस ने इस बार बढ़चढ़ कर तैयारी की थी. पार्टी के बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी तक को कांग्रेस उपाध्यक्ष के पीछे लगा दिया गया.

करीब-करीब दो महीने तक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से गायब रहे कांग्रेस के नायक ने भी पर्दे पर धमाकेदार एंट्री की. राहुल गांधी मोदी सरकार के लिखे भूमि अधिग्रहण बिल की पूरी पटकथा को अच्छी तरह से पढ़कर आए थे लिहाजा गलती की गुंजाइश कम थी.

कांग्रेस उपाध्यक्ष ने बीजेपी सरकार और खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोपों की झड़ी लगा दी. यहां तक कह डाला कि लोकसभा चुनाव में कॉरपोरेट से लिए चंदों का कर्ज उतारने के लिए ही मोदी सरकार जमीन बिल को लेकर अड़ी है.

हमला तीखा था लिहाजा प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक थी. बीजेपी ने इस बयान को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए राहुल से माफी मांगने की बात कह डाली.

दरअसल, भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर किसानों के बारे में चिंता कम और सियासत ज्यादा हो रही है.

अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस को इसमें संजीवनी नजर आ रही है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जमीन बिल को देश की तरक्की का लाइसेंस मान रहे हैं.  हालांकि इस बिल को लेकर देश में जो माहौल बना है उससे बीजेपी बैकफुट पर दिखाई दे रही है. लेकिन मोदी ने साफ कर दिया है कि सरकार न तो कदम पीछे हटाएगी और न ही विपक्ष के दबाव में आएगी.

इन सबसे बीच लोकसभा चुनाव और कई राज्यों में हार के बाद अब कांग्रेस को लग रहा है कि एक बार फिर से उसके पास भूमि अधिग्रहण बिल के सहारे वापसी करने का बेहतरीन मौका है. ऐसे में उसने न सिर्फ वापसी की कोशिश की है बल्कि राहुल गांधी को एक बार फिर से सियासत के केंद्र में बिठाने की कोशिश की है.

हालांकि इन सबसे बीच एक बड़ा सवाल अब भी है कि क्या जमीन बिल को लेकर लड़ी जा रही इस जंग में वाकई किसानों का कोई फायदा है? या फिर ये कांग्रेस के युवराज के लिए सियासत में एक बार फिर से जमीन खोजने की कवायद भर है?

बात 1987 की है. एलबम में एक-दो फोटो को देखकर अभिभावक ने कहा कि इसे यहां से अलग रख लें.
मेरे समझ में न आया तो कहा कि पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ. पर्दा उठ गया तो भेद खुल जायेगा. तब उन्होंने बताया कि एलबम में कैसी फोटो रहनी चाहिए.

…तब और आज.

मेरे समझ में आ गया कि कुछ तो पर्दा होना चाहिए. लेकिन सोशल मीडिया और…. से तो आज पर्दा ही उठ गया है.

अब सभी अपनी सेल्फी और पारिवारिक चित्रों को सार्वजनिक करने में हिचक नहीं कर रहे हैं. बोलने में भी झिझक तो गायब हो गई है.

उपन्यासकार यशपाल ने भी इस पर लिखा है कि इज्जत का आधार था, घर के बाहर लटका पर्दा.

पहले फिल्मिस्तान वैसे मनोरंजन का सस्ता साधन माना जाता है. लेकिन वह धीरे-धीरे बेपर्दगी की ओर बढ़ गया है.  विश्वास में कोई पर्दा नहीं होना चाहिए. पर्दा से अविश्वास पैदा होता है… यह मैं भी मानता हूं.

कहते हैं भारत में हिन्दुओं में पर्दा इस्लाम की देन है. इस्लाम के प्रभाव से हिन्दू स्त्रियां भी परदा करने लगीं. वैसे इस प्रथा की शुरुआत यहां 12वीँ सदी मेँ मानी जाती है. इसका ज्यादातर विस्तार राजस्थान के राजपूत जाति में था.

प्रदूषण को रोकने के लिए उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने निर्माण करने के लिए पर्दा लगाना अनिवार्य कर दिया है.निगम ने इसके लिए भवन विभाग को निर्देश जारी कर दिए हैं.

पर्दा समाज के लिये बहुत ही आवश्यक है. इसके पीछे के कारण के बारे में इस प्रथा से पुरूष कामुकता को वश में किया जा सकता है. …तो क्या ये माना जाये कि पर्दा प्रथा से दुराचार रोका जा सकता है? ऐसा भी नहीं है.

देश के मॉल और सार्वजनिक स्थानों पर लड़कियों और महिलाओं के पहनावे पर उंगली उठ रहीं है. नेता और पंचायतें इसका विरोध कर रही हैं.

क्या पर्दा करने से पुरूषों पर अंकुश लगाया जा सकता है? लेकिन यह तो तय है कि इस आधुनिक युग में महिलाओं के पहनावा कम कपड़ों में होता जा रहा है. जबकि पुरूषों में पहले जैसा ही है.

आज स्त्री अपरहण, बलात्कार की घटनाएं अपने देश मे घटित होती है. कोई तो कारण है ही.

पर्दा पर मैं विश्वास नहीं रखता हूं. मैं तो कहना चाहता हूं कि ऐसे कपड़े न पहने जाएं जिसकी नुमाइश लग जाये.  ऐसी फोटो सोशल मीडिया में न लोड की जाये जो घर के ऑगन की शोभायमान हो रही है.

धूप से बचने के लिए लड़कियां और महिलाएं दुपट्टा और ग्लप्स का प्रयोग करतीं हैं, लेकिन वैसे मॉल और अन्य स्थानों पर शॉर्ट कपड़े पहनती दिख जाती हैं.

कहने का मतलब यह है कि बचाव के लिए पुरुष हो या स्त्री शरीर ढकना तो जरुरी है ही.चाहे वह समाज हो या बीमारी. ऐसा फैशन किस काम का जो शरीर को नुकसान दे और समाज में बुराई.

शॉर्ट कपड़ों का यह चलन आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहता है, समय बताएगा.

क्या बारिश भी किसी को रुला सकती है आप कहेंगे बारिश तो तन मन को भिगोती है धरती की प्यास बुझाती है लेकिन क्या कीजिएगा जब बारिश कहर बरपाये और साथ लेकर आए तबाही….

जी हां बात यहां बेमौसम बारिश की हो रही है उत्तर भारत के कई प्रदेशों में अमूमन अप्रैल में बारिश नहीं ही होती है लेकिन अब इसे प्रकृति का प्रकोप कहें या प्राकृतिक असंतुलन जब लगता है ठंड जा रही है तो अचानक ठंड की वापसी हो जाती है.

गर्मी के मौसम में भी बारिश का होना और इस बारिश से किसानों पर तबाही की मार पड़ना ये सब प्रकृति के ऐसे अनूठे रुप हैं जिनसे किसान इन दिनों दो चार हो रहे हैं.

इस मौसम में कहीं कहीं तो ऐसी बारिश हो रही है जो कि सामान्यतः बारिश काल में दर्ज होती है.

देश के कई राज्यों में बेमौसम बारिश और ओलों ने किसानों की महीनों की मेहनत पड़ पानी फेर दिया. बेमौसम बारिश के चलते खराब हुई फसलों के चलते हजारों हेक्टेयर फसलें बर्बाद हो गई. कई जगहों पर कर्ज नहीं चुका पाने के चलते किसान खुदकुशी को भी मजबूर होने लगे हैं.

उत्तर भारत के कई इलाकों में भारी बारिश के चलते खेतों में खड़ी फसल तबाह होने से हजारों किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं. मध्यप्रदेश के ग्वालियर, चंबल समेत छतरपुर, टीकमगढ़ और राजस्थान से सटे इलाकों में बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा रखी हैं. बारिश के साथ साथ ओले गिरने से फसलों पूरी तरह तबाह हो गईं.

इस बारिश से किसानों के चेहरों पर मायूसी साफ नजर आ रही है इसकी वज़ह भी साफ है कि गेहूं की फसल पूरी तरह से पककर खेतों में खड़ी थी ऐसे में लगातार बारिश होने से गेहूं की बाले पानी के संपर्क में आने के बाद गल कर ज़मींदोज हो गई हैं. किसान खेती में लगायी गयी लागत को भी नहीं निकाल सके है.

वहीं जबकि दूसरी ओर इसका दुखद पहलू ये है कि तमाम जगहों पर प्रशासन बारिश व ओलावृष्टि से नुकसान हुई गेहूं की फसल की जो सर्वे रिपोर्ट शासन को भेजी जा रही है उसमें फसल को नुकसान काफी कम करके बताया जा रही है.

ऐसी स्थिति के चलते किसानों पर अपनी खड़ी फसल को गंवाने के साथ शासन प्रशासन से भी सिवाय धोखे के कुछ नहीं मिल रहा है.

ये ठीक वैसे ही है कि आप कमाई पानी में डूब गई हो और आप सिवाय मायूस होने के और हाथ मलने के कुछ नहीं कर पायें.बैंकों व साहूकारों के कर्ज से दबे किसानों की कोई राह नहीं सूझ रही है कि आखिर वह कहां जाए और क्या करें.

किसान जोकि अन्नदाता कहलाता है वो अन्नदाता इस बेमौसम की बारिश से इतना टूट गया है कि उसके सामने मायूसी और भारी नुक्सान के चलते अपनी जान देने का रास्ता ही नज़र आ रही है. तभी तो इस बारिश के चलते तमाम किसान मौत को गले लगा चुके हैं.

एक अनुमान के मुताबिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में तमाम किसानों की मौत हुई है कहीं किसी किसान को हार्ट अटैक आ गया तो किसी ने फांसी लगा ली तो किसी ने किसी और तरीकों से इस बेमौसम बारिश के चलते अपनी जान होम कर दी.

ये मौतें या तो नुकसान के सदमे से हुई है या किसानों ने खुदकुशी की है. लेकिन बेहद दुखद है कि कई राज्यों की सरकारें यह नहीं मान रही हैं कि फसलें बर्बाद होने से किसानों की मौत का कोई संबध है और दावा तो यहां तक है कि बेमौसम बारिश अब तक किसी भी किसान की मौत नहीं हुई है.

लेकिन मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है और रोज किसानों की मौतों की खबरें आ रही हैं.

केंद्र सरकार इस मुद्दे पर कितना गंभीर है ये तो पड़ताल का विषय है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी हफ्ते प्रभावित किसानों को 50 फीसदी ज़्यादा मुआवज़ा देने का ऐलान किया है.

वहीं यूपी में किसानों के साथ किस तरह मजाक हो रहा है, इसका नमूना उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में देखने को मिला वहां कई किसानों को 75 और 100 रुपये के चेक मिले हैं कितना हास्यास्पद है कि अपनी खड़ी फसल को गंवाने के बाद किसानों को ये मुआवज़ा जले पर नमक छिड़कने के समान है.

एक अनुमान के मुताबिक कई हेक्टेयर में दालों की फसल प्रभावित हुई है और इस वजह से रबी सीज़न में दाल की पैदावार भारी तादात में घट सकती है.

कम उत्पादन का मतलब है कि इस बार दाल औसत से ज़्यादा आयात करना पड़ेगा, ताकि बाज़ार में दाल की सप्लाई कम न रहे.

कृषि मंत्री पहले ही गेहूं के उत्पादन में गिरावट का अंदेशा जता चुके हैं. अब इस आपदा की वजह से दाल के उत्पादन पर भी पड़ने वाले असर से साफ है कि सरकार को आने वाले महीनों में बाज़ार में खाने-पीने की ज़रूरी चीजों की सप्लाई मुहैया कराने की तैयारी भी अभी से शुरू करनी होगी.

बात यहीं तक रहेगी ऐसा नहीं है जो आम आदमी इस मौसम का मज़ा ले रहा है और गर्मी के मौसम में बारिशों की फुहारों का मज़ा लेकर फिलहाल इन्जॉय कर रहा है असली दिक्कत तो अब उसके सामने आने वाली है.

मतलब तस्वीर साफ है कि ये कि जो फसल और दलहन इस बेमौसम बारिश की भेंट चढ़ गई है उसके दुष्परिणाम तो आने वाले समय में सामने आयेंगे जब बाज़ार में ना सिर्फ दालें चावल गेंहूं मंहगा होने का अनुमान है बल्कि मंहगी सब्ज़ियों की मार भी झेलने को आम आदमी को तैयार रहना चाहिए.

अब आप ब्लॉग और वेबसाइट से भी लाखों की कमाई कर सकते हैं. जानिए कैसे?

वेबसाइट से पैसा कमाने के कई तरीके मौजूद है. इन तरीकों को अपनाकर आप लाखों रुपए की कमाई कर सकते हैं.

आइए हम आपको बताते हैं कुछ लोकप्रिय तरीके-

गूगल एडसेंस- आप अपने ब्लॉग- वेबसाइट पर गूगल एडसेंस का एड लगाकर हर महीने लाखों कमा सकते हैं. गूगल एडसेंस का विज्ञापन टेक्स्ट, इमेज और वीडियो के रूप में होता है. इसके कोड को ब्लॉग-वेबसाइट पर डालने के बाद विज्ञापन दिखने लगता है.

जब भी कोई पाठक आपके गूगल एडसेंस के विज्ञापन को क्लिक करेगा. आपको पैसा मिलेगा. लेकिन आपको खुद इस   विज्ञापन को क्लिक नहीं करना है या किसी से क्लिक करने के लिए नहीं कहना है. ऐसा करने पर आपका अकाउंट बैन हो सकता है.

एक बात ध्यान रखें कि विज्ञापन का प्लेसिंग सही हो. विज्ञापन वहां लगाएं जहां लोगों की नजर जरूर जाए और लोग उसे क्लिक करने से खुद को रोक ना पाए. अगर आपके ब्लॉग में फोटो और वीडियो नहीं के बराबर है या कम है तो सिर्फ टेक्स्ट एड लगाना आपके लिए बेहतर होगा.

एफिलिएट प्रोग्राम- अगर आपका ब्लॉग-वेबसाइट नया है तो गूगल एडसेंस अकाउंट खुलेने में टाइम लगेगा. एडसेंस के लिए आपको अप्लाई करना होगा. तब तक आप एफिलिएट प्रोग्राम का फायदा उठा सकते हैं. आप गूगल में जाकर affiliate programs सर्च कीजिए सैकड़ों ऑप्शन मिलेंगे. linkshare.com, dgmpro.com, flipkart.com, jabong.com, JeevanSaathi.com, Makemytrip.com, BharatMatrimony.com, LifepartnerIndia.com, Shaadi.com, Yatra.com, और india-herbs.com पर जाकर आप अपने ब्लॉग-वेबसाइट के हिसाब से एफिलिएट अकाउंट बना लीजिए और पैसा कमाइए.

पब्लिशर अकाउंट- वेबसाइट से पैसा कमाने का एक ऑप्शन पब्लिशर अकाउंट का भी है. गूगल एडसेंस वाले भी इसे लगाकर पैसा बना सकते है. इसके लिए आप OMG, Shoogloo, InfinityAds, BidVertiser, payoffers.in, clickbank.com, Commissionjunction.com, Admaya.com, cuelinks, komli और trootrac.com जैसी साइट पर जाकर अपना पब्लिशर अकाउंट बनाइए. लेकिन एक साथ कई विज्ञापन डालने से बचिए. ऐसा ना लगे कि ब्लॉग, साइट पर सिर्फ विज्ञापन ही विज्ञापन है.

अमेजन और इबे अकाउंट- Amazon.com और Ebay.com भी काफी लोकप्रिय है. अमेजन और इबे पर अकाउंट बनाकर आप इसके उत्पादों के एड को वेबसाइट पर लगाकर कमा सकते है. आपको सेल के हिसाब से कमीशन मिलेगा.

चितिका- Chitika.com पर जाकर भी आप अपना अकाउंट बना सकते हैं. Chitika आपके ब्लॉग-वेबसाइट के अनुसार विज्ञापन दिखाता है.

पोल और सर्वे- दुनिया भर में ऐसी सैकड़ों कंपनियां और एजेंसियां है जो सर्वे के बदले में पैसे का भुगतान करती है. सर्वे और पोल इस हिसाब से पैसा कमाने के लिए यह एक अच्छा जरिया है. पोल, सर्वे का एक फायदा यह भी है कि इसके कारण लोग आपके ब्लॉग पर ज्यादा देर पर रहते हैं.

समीक्षा- आप किसी प्रॉडक्ट, फिल्म समीक्षा से भी पैसा कमा सकते हैं. प्रॉडक्ट लांच के समय या फिल्म रिलीज के समय इससे जुड़े लोग पॉजीटिव रिव्यू करने वाले को भुगतान भी करते हैं. इसके लिए आपको उनके संपर्क में रहना होगा.

इन टेक्स्ट लिंक एड- कई साइट या ब्लॉ़ग पर आप कई देखते होंगे कि किसी लिंक के नीचे दो-दो लाइन है. आमतौर पर हाइपर लिंक में कलर चेंज हो जाता है लेकिन इसके नीचे दो लाइन होते हैं और वहां पर कर्सर ले जाने पर एक बॉक्स खुलता है. आप इसके लिए infolinks, Kontera, Text-Link-Ads, Text-Link-Brokers और Vibrant Media की साइट पर जाकर अपना अकाउंट बना सकते हैं.

जॉब बोर्ड एड- आप अपने ब्लॉग-वेबसाइट पर JobThread और Job Board का एड लगाकर भी कमा सकते हैं. इसमें नौकरी के बारे में जानकारी होती है और लोग इसे क्लिक भी काफी करते हैं. पैसा कमाने का यह बढ़िया तरीका है.

यूट्यूब पार्टनर- अगर आप वीडियो फोटोग्राफी के शौकीन हैं. मोबाइल, एचडी कैमरा या मिनीकैम से फोटोग्राफी करते रहते हैं तो अपने वीडियो को दुनिया को तो दिखाइए ही साथ ही जमकर कमाई भी कीजिए.

इसके लिए आपको यूट्यूब पर अपना अकाउंट बनाना पड़ेगा. अकाउंट बनाने के बाद आप जो भी वीडियो लें उसे यूट्यूब पर अपलोड करते जाइए. ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने वीडियो के बारे में बताइए. फेसबुक, ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उसके बारे में लोगों को बताइए. जितना ज्यादा लोग आपके वीडियो को देखेंगे आपको उतना ज्यादा पैसा मिलेगा.

यूट्यूब पर ध्यान रखिएगा कि म्यूजिक आपका ऑरिजनल हो. किसी बॉलीवुड-हॉलीवुड फिल्म का संगीत होने पर यूट्यूब आपको बैन कर सकता है.

वीडियो पर आपका अपना कॉपीराइट होना चाहिए ऐसा नहीं कि कहीं से उठाकर यूट्यूब पर डाल दिया.

एक बात ध्यान रखिएगा कि Google Adsense, Chitika, Bidvertiser और Adbrite आपको क्लिक के हिसाब से भुगतान करते हैं. इसे PPC यानी Pay Per Click कहते हैं.

जबकि कुछ साइट आपके ट्रैफिक के अनुसार आपको पैसा देते हैं. जितना ज्यादा हिट उतना ज्यादा भुगतान.. इसे CPM कहते हैं यानी Cost Per Mille (Thousand). इसमें Value Click और Tribal Fusion शामिल है. इसलिए आपकी कोशिश ये होनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोग आपके ब्लॉग पर आए.

इसके लिए आपको रोज ऑरिजनल पोस्ट लिखने होंगे. जिससे कि लोगों को रोज कुछ ना कुछ नया पढ़ने को मिले. इससे आपका पेजव्यू-ट्रैफिक बढ़ेगा. जितना ट्रैफिक बढ़ेगा आपके पास उतना पैसा आएगा.

तो शुरू हो जाइए नेट से नोट बनाने के लिए.

-हितेंद्र कुमार गुप्ता

वो भी क्या दिन थे. स्कूल की अगली कक्षा में जाते ही किताब पाने ललक होती थी.

बड़े भाई-बहन की किताबें, छोटों को मिल जाती थी. और घर में कोई न हुआ तो नई किताबें खरीदने से पहले अपने यार-दोस्तों या रिश्तेदारों से सम्पर्क साधे जाते थे कि किसी के पास फलानी कक्षा की पुरानी किताबें हैं या नहीं.

पुरानी किताबें नहीं मिलने पर ही नई किताब के लिए दुकानों की तरफ लोगों के कदम मुड़ते थे.

आज किताबों के लिए आपको किसी दुकान पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती बल्कि स्कूल वाला ही किताबें देता है. इसमें खुश होने वाली कोई बात नहीं. क्योंकि ये आज की सबसे दुःखद अहसास है.

दुकानों में तो 2-4 प्रतिशत की छूट भी मिल जाया करती थी. जान पहचान वाला दुकानदार हो तो 10 प्रतिशत तक भी छूट मिल जाया करती थी. लेकिन, आज जहां लूट की छूट हो, वहां रियायत की कल्पना भी बेकार है.

किताबों के मूल्य में स्कूल प्रशासन का मुनाफा भी होता है और कमोबेश प्रकाशकों का भी. इसमें किसी का नुकसान होता है तो केवल और केवल उन अभिभावकों का, जो पाई-पाई के लिए दिन रात एक करता है. वो नई किताब की वजह से मार्च महीने को मनहूस मानता है और अप्रैल को मूर्ख बनाने वाला महीना.

1 अप्रैल को मूर्ख दिवस बनाने की हमारे देश में एक परम्परा भी बन गई है. अभिभावकों को न चाहते हुए भी मूर्ख बनना पड़ता है.

हालात अजीब हो गये हैं. हर साल बच्चों की किताबें बदल जाती हैं. इसके पीछे स्कूल प्रशासन की तरफ से बड़ा अजीब तर्क भी दिया जाता है. कहा जाता है कि किताबों का ‘अपग्रेडेशन’ होता है. कोई ये क्यों नहीं करता कि देश में आज केवल किताब विक्रेता और किताब छापने वालों का ‘अपग्रेडेशन’ होता है.

किताबों के अपग्रेडेशन के नाम पर केवल कवर के चटकीले रंग, अंदर के पन्ने पर कुछ रंगीन तस्वीरें, कुछ फॉन्ट के आकार-प्रकार बदल दिये जाते हैं.

हैरानी तो इस बात की भी कई बातें निरर्थक रूप से उन किताबों में छपी मिलेंगी. कुछ अध्याय आगे या पीछे कर नयी किताब तैयार कर दी जाती है. कोई कुछ बोले तो आखिर किससे?

पता चलता है कि कोई स्कूल, फलाने नेता जी का है. कोई स्कूल, फलाने दबंग का है. कोई स्कूल, फलाने अफसर का है. यानी कुल मिलाकर प्रभावशाली लोगों का ही प्रभाव प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा पर है. जो कारोबार का एक चक्र बनाकर चलते हैं.

तुमसे जुड़े हम, हमसे जुड़ो तुम. कुछ तुम खाओ, कुछ हमें खिलाओ के नाम पर शिक्षा का गोरखधंधा बदस्तूर जारी है.

‘शिक्षा का व्यावसायीकरण’, इस विषय पर कोई नहीं बोलना चाहता. सोचिए, ठेले-खोमचे वाले भी अपने बच्चों आज सरकारी स्कूलों को छोड़कर प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाता है, वो अपने बच्चों को महंगी किताबें कैसे दिला पाता है.

समझिए तो किताबों में रंग-बिरंगी स्याही नहीं बल्कि उस खून से किताबें लिखी जाती हैं, जो अभिभावकों से वसूल की जाती हैं. और तो और किताबों के बोझ उनके बच्चों की पीठ पर लादने की मजबूरी भी होती है. कई बस्ते तो बच्चों के भार से भी ज्यादा होते हैं. उफ…इतना बोझ किताबों का ? कागज की बर्बादी से देश पर पर्यावरण पर बोझ पड़ता है वो अलग.

कागज बचाने को लेकर देश में पेपरलेस पार्लियामेंट बनाने की बात हो रही है. लेकिन इस तरफ सरकार का ध्यान क्यों नहीं? शिक्षा मंत्री भी इस तरफ कोई ध्यान क्यों नहीं दे रहीं? शायद प्राइवेट शिक्षा के उपरोक्त ताने-बाने से वो भी घबराती हैं?

एक आकलन के मुताबिक एक पेड़ से 7 हजार पन्ने तैयार किये जा सकते हैं. ऐसे में देश में चल रहे लाखों स्कूल मिलकर कितने पेड़ों की बर्बादी सालाना करते हैं, ये आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. नई किताबों की छपाई और कागजी कार्यवाही के नाम पर न जाने कितने पेड़ देश में कुर्बान किये जा रहे हैं.

हर साल दुनिया भर में डेढ़ लाख वर्ग किलोमीटर जंगल नष्ट हो जाते हैं. दुनिया परेशान है. लेकिन, प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर हमारे देश की ये विडंबना है कि पर्यावरण और जलवायु को लेकर चिन्ता जतायी जाती है. पर्यावरण दिवस पर कसमें खायी जाती हैं, लेकिन पेड़ जैसे प्रकृति-मित्र का दोहन बदस्तूर जारी है.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हर वैश्विक मंच से पर्यावरण संरक्षण और उसे सम्वर्धन को लेकर विश्व समुदाय को मिलकर प्रयास करने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं. फ्रांस के दौरे पर भी उन्होंने यूनेस्को, कनाडा और जर्मनी में अपने सम्बोधन में जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाव की ओर आगाह किया. इससे पहले उन्होंने अमेरीका, चीन, जापान, भूटान, नेपाल और म्यांमार समेत अन्य दौरे में भी उन्होंने जलवायु परिवर्तन को एक महत्वपूर्ण वैश्विक चुनौती बताया है.

प्रधानमंत्री ने अगले सात वर्षों में देश में 175,000 मेगावट स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है. लेकिन, ये पूरा होगा कैसे? देश में कागज के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है. कागज के प्रयोग को लेकर कोई गाइडलाइन नहीं है. कागज की बर्बादी के बहाने सालाना लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं. हमारे देश में किताबों की छपाई के नाम पर सालाना बड़े पैमाने पर पेड़ कट रहे हैं.