देश में आम चुनाव हो या किसी राज्य का, राजनीतिक पार्टियां चुनावी वादों की झड़ी लगा देती हैं. यह बात अलग है कि इनमें से बहुत से वादे सिर्फ वादे बनकर ही रह जाते हैं लेकिन फिर भी उनमें से कुछ वादे तो जरूर पूरे करने पड़ते हैं वह चाहे अगले चुनाव के कारण हो या अपनी छवि बरकरार रखने के कारण.

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह वादे समाज के किस तबके को खुश करने के लिए किए जाते हैं. उनका प्रतिशत उस क्षेत्र में कितना है ?

अब चाहे हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव की बात करें या फिर ताजा दिल्ली विधान सभा चुनाव की. इन सभी चुनावों में या तो यूपीए सरकार में जारी किया मनरेगा हो, खाद्य सुरक्षा बिल हो, जनधन योजना या फिर झुग्गी झोपड़ियों की बात. इन सभी वादों में समाज के उन तबकों की बात की गयी है जोकि अति पिछड़े या जिनको सरकार ने गरीब माना है.

आपको याद दिला दें कि यूपीए सरकार के समय जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि प्रतिदिन 36 रुपये से कम कमाने वाला ही गरीब है. अब अगर सरकार की यह बात मान भी लें तो मेरा जहां तक मानना है कि इस आंकड़े के मुताबिक देश में करीब 20 प्रतिशत जनता ही गरीब होगी.

अब अगर देश के उन उद्योगपतियों या मझोले बिजनेसमैन की बात की जाय जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार की नई योजनाओं से फायदा होता है उनका प्रतिशत भी करीब 10 ही होगा. हालांकि राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती रहती हैं कि उनके अलावा दूसरी पार्टियों से उद्यो्गपतियों को लाभ मिलता है.

अब सबसे महत्वपूर्ण बात यहां यह है कि समाज का जो शेष 70 फीसदी तबका है उस तबके की बात आखिर कौन पार्टी करती है ?

मेरे कहने का यहां मतलब उस तबके से है जिसे सरकार गरीब नहीं मानती यानि मध्यमवर्ग. इस तबके में नौकरीपेशा व्यक्ति आता है चाहे सरकारी नौकरी में हो, प्राइवेट नौकरी में हो, अपना छोटा-मोटा रोजगार करने वाला या फिर गैर संगठनात्मक कंपनी में काम करने वाला. राजनीतिक पार्टियों के वादों पर अगर गौर करें तो इस तबके के बारे में कोई सोचने वाला नहीं है.

वहीं जिसके पास झुग्गी है उसको मकान मिलने की घोषणा की गयी, आज जो एक फैक्ट्री का मालिक है उसके पास कल दो फैक्ट्रियां होने वाली हैं लेकिन जो मिडिल क्लास दिन-रात मेहनत करता है, उसके लिए इन राजनीतिक पार्टियों ने अपने एजेंडे में क्या रखा है? मिडिल क्लास के लिए किस राजनीतिक पार्टी ने अपने एजेंडे में घोषणाएं की हैं?

मिडिल क्लास का आदमी सुरसा जैसे मुंह फैलाए महंगाई की आग में दफन हो रहा है. निरंकुश हो चुके स्कूलों की फीस भरकर आज अपने बच्चे के भविष्य को संवारने में लगा है. अपनी सुख-शांति को भूलकर उसका एक ही सपना रहता है कि अपने बच्चे को अच्छी जॉब में देखे. लेकिन चुनावों के समय समाज के सभी तबकों की बात करने वाली ये पार्टियां उस तबके को भूल जाती हैं जो कि देश की रीढ़ है.

एक नौकरीपेशा व्यक्ति का टीडीएस काटने में सरकार कभी चूक नहीं करती. वहीं नेताओं, बड़े-बड़े नौकरशाहों की बेहिसाब कमाई की सिर्फ लीपापोती कर दी जाती है. नौकरी करने वाला व्यक्ति एक साथ लाभ के दो पदों पर काम नहीं कर सकता लेकिन कई पार्टियों के मंत्री खेल जगह की दुनियां में बड़े-बड़े पदों पर सीना तानकर दो पदों की एक साथ मलाई काट रहे हैं.

आखिर गरीब कौन ?

अब अगर देखा जाए तो सरकारी आंकड़ों में जिसे गरीब माना गया है सच्चाई उससे कोसों दूर है.

शॉर्ट में अगर समझें तो आज के 50 साल पहले जिस व्यक्ति के पास अपनी साईकिल होती थी वह गरीब नहीं माना जाता था. गांव में जिसका घर पक्का होता था, जिसके दरवाजे 4 भैंस बंधी होती थी, बैलगाड़ी होती थी, गरीब नहीं माना जाता था.

लेकिन आज परिस्थितियों बदल चुकी हैं. जिस व्यक्ति के पास शहर में अपना मकान है, मोटरसाइकिल से चलता है, बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं उसकी कमर भी इस महंगाई ने तोड़ रखी है. कहने का मतलब है कि ऐसे तबके को भी गरीबी रेखा के नीचे ही मानना होगा. लेकिन अफसोस इस बात का है कि सरकार उसी व्यक्ति को गरीब मानती है जिसके बदन पर ना तो कपड़ा हो और ना ही उसके सिर पर छत.

कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो देश में गरीब तो करीब 80 फीसदी हैं लेकिन वादे किए जाते हैं सिर्फ 20 फीसदी लोगों के लिए. आखिर ये समाज के ठेकेदार उस तबके के बारे में कब सोचेंगे जो दिन रात देश की सेवा में तो लगा रहता है लेकिन उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं.

वाह दिल्ली! तुम्हे फतह करने के लिए सभी ने अपने राष्ट्र धर्म को ही किनारे लगा दिया.

इस बार दिल्ली के विधानसभा चुनाव को देखकर महाभारत की याद आ गई है. वैसे दिल्ली ने आदिकाल से कई शासकों को मौका दिया, लेकिन बड़ी तेजी से किनारे भी लगाया है.

…मैंने तो दिल्ली के बारे में किताबों में पढ़ा है.1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद दिल्ली के विकास में चार चांद लगे.

महाभारत काल से दिल्ली पांडवों की प्रिय नगरी इन्द्रप्रस्थ के रूप में जानी जाती रही है. हजारों साल पहले दिल्ली के समीप हरियाणा के कुरूक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों के बीच महाभारत का महायुद्ध लड़ा गया था.

आरएसएस मुखिया मोहन भागवत की जुबानी, मोदी की तुलना महाभारत के अभिमन्यु से की थी. अभिमन्यु को कौरवों ने आखिरकार सातवें चक्रव्यूह में घेरकर मार दिया था. हमारे अभिमन्यु चक्रव्यूह को पार करेंगे.

लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी के विजय रथ ने हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र को फतह तो कर लिया, पर दिल्ली के चक्रव्यूह में फंस गये.

अब महाभारत की एक जानकारी यह भी है कि कर्ण और अर्जुन युद्ध चल रहा था. अर्जुन तीर मारते तो कर्ण का रथ बहुत पीछे हट जाता था.

…और जब कर्ण तीर मारते तो अर्जुन का रथ थोड़ा ही पीछे हटता. फिर भी भगवान कृष्ण कर्ण की प्रशंसा करते कहते वाह कर्ण! लेकिन अर्जुन के तीर पर कुछ नहीं बोलते. अर्जुन ने कृष्ण से पूछ ही लिया कि ऐसी प्रशंसा क्यों?

कृष्ण जी ने कहा, रथ की रक्षा पर बजरंगबली है, शेषनाग पहिए संभाले हुए है. …और खुद तीनों लोक का स्वामी इस रथ पर सवार है. अगर फिर भी कर्ण इस रथ को पीछे हटाते है. …तो बड़ी बात है.

अब सोचिए. देश में मोदी सरकार है. सरकार दिल्ली में बसती है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने किरन बेदी पर दांव खेला है. इस चुनावी महाभारत में दूसरी तरफ आप के अरविंद केजरीवाल है. हां, यह तो तय हो गया है पिछले दिल्ली और आम चुनाव से कि देश के राजनेताओं की राजनीति अब मुंह जुबानी नहीं चलने वाली है, करके भी दिखाना पड़ेगा.

हर जुबान पर एक ही सवाल है कि यहां केजरीवाल वर्सेज ऑल हो गया है.कांग्रेस और बीजेपी का एक ही लक्ष्य केजरीवाल पर अटैक है. विजय रथ पर सवार प्रधानमंत्री मोदी के भी निशाने पर केजरीवाल हैं.

जनता है कि सब जानती है. यह भी कहा जा रहा है कि केजरीवाल शासक से अधिक आलोचक की भूमिका में सिमट गये हैं.

अब यह केजरीवाल का ही कमाल है कि राजधानी की राजनीति को इर्द-गिर्द समेट लिया है.  बीजेपी के लिए तो दिल्ली के चुनाव भविष्य के सवाल बन गया है. दिल्ली के बाद मोदी के विजय रथ को बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ना है.

…इसीलिए बीजेपी दिल्ली को खोना नहीं चाहती. और महाभारत की तरह केजरीवाल के लिए चक्रव्यूह बनाये गये. ये वही केजरीवाल हैं जिन्हें चुनाव घोषित होने से पहले बीजेपी क्या अन्य राजनीतिक दल भी बेहद हल्के में ले रहे थे.

लेकिन केजरीवाल जो आंदोलन की आग में तपकर निकले थे उन्होंने अपनी धीमी चाल जारी रखी और दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए बेहद सधे कदमों से आगे बढ़ते नज़र आ रहे हैं.

आखिर क्या वज़ह कि केजरीवाल की Slow Go and Win The Race रणनीति को फेल करने के लिए ना सिर्फ प्रधानमंत्री को दिल्ली में अपनी रैलियों की संख्या बढ़ानी पड़ी बल्कि अपने सारे अमले और पदाधिकारियों को दिल्ली के दंगल में जीत का परचम लहराने के लिए झोंकना पड़ा है.

अब दिल्ली की सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा ये तो मतदान से साफ हो जाएगा लेकिन इस माहौल को देखते हुए ये कहने में कोई गुरेज नहीं होनी चाहिए कि ये लड़ाई केजरीवाल वर्सेज ऑल ही है…

याद नहीं, किसी ने मुझे एक चुटकुला सुनाया था. एक चोर था, जज के घर में चोरी करने गया. पेड़ के सहारे चोर घर की छत पर चढ़ गया और सीढ़ियों से उनके घर के अंदर जाने की कोशिश करने लगा. छत से झांक कर देखा, घर में घमासान युद्ध छिड़ा हुआ है. चोर ने देखा-जज साहब दो पत्नियों के बीच फंसे हुए हैं, एक ऊपर खींच रही है, दूसरी नीचे. इसी कशमकश में रात गुजर गई और चोर पकड़ा गया. अगले दिन संयोग से चोर उसी जज साहब की अदालत में पेश किया गया. पत्नियों से पीड़ित जज साहब ने चोर को दो शादियां करने की सजा सुनाई. कहा चोर के लिए इससे बड़ी कोई और सजा नहीं हो सकती है.

कुछ ऐसा ही फरमान भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने हिंदू महिलाओं के लिए सुनाया. कहा हर हिन्दू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए. साथ ही यह भी कहा, इस देश में चार बीवियां और चालीस बच्चों वाला खेल अब नहीं चलेगा.

पहली बात गलती और दूसरी बात बिल्कुल सही है, नहीं चलेंगे. पर देश में क्या ऐसा कानून बना है? खैर इस बयान के बाद तो आंख मूंद कर ‘आबादी की राजनीति’ पर बयान शुरू हो गई. ‘दलित बढ़ाकर मुख्यमंत्री बनाओं’ किसी ने कहा, एक नहीं दस बच्चे पैदा करें हिन्दू. किसी नेता ने कहा, ‘दलित अपनी संख्या बढ़ाए.’ मानो औरतों का देह नहीं मशीन है. प्रॉडक्शन बढ़ा दो.

किसी के धार्मिक पुस्तक में लिखा हो ‘औरत को खेती की तरह जोतो “औरतें तुम्हारे लिए खेती के समान है’ यानी जितना चाहों उतने बच्चे पैदा कर लो. लेकिन 21 सदी में हर औरत का मौलिक अधिकार है कि वह कितने बच्चों को जन्म दे. ‘आबादी की राजनीति’ में महिलाएं अपनी बलि नहीं दे सकतीं. औरत न तो बच्चा पैदा करने की मशीन है और न ही किसी की खेती, जो चाहो, जितना चाहो उगा लो.

हैरानी है, अब तक सभी हिन्दुस्तानियों के लिए देश में ‘समान कानून’ नहीं? ‘आबादी की राजनीति’ करने वाले नेता चाहे किसी भी धर्म के क्यों न हो उन्हें कोई हक नहीं कि औरतओं को हथियार बनाकर सियासत करें. देश का कानून इतना लचर क्यों? हर धर्म, जाति और व्यक्ति के लिए अलग-अलग परिभाषित हो.

सच तो ये है कि ऐसी बयानबाजी करने वाले नेताओं ने सियासत के लिए अपनी ‘समझ और संवेदनाएं’ खो दी. इन्हें न तो देश के भविष्य की चिन्ता है और महिलाओं की.

बच्चा ‘जनन’ और उनकी ‘परवरिश’ सियासत की रणनीति नहीं हो सकती. यह जीवन और मरण का सवाल है, उनका मौलिक अधिकार है कि अपनी औकात के मुताबिक बच्चा पैदा करें.

देश में मातृ-शिशु मृत्यु दर घटने की वजह परिवार नियोजन है. आज का पढ़ा-लिखा वर्ग एक या दो बच्चों से अधिक की चाहत नहीं रखता है.

अगर इन नेताओं ने थॉमस रॉबर्ट माल्थस की जनसंख्या वृद्धि सिद्धांत पढ़ा होता तो शायद ऐसी बात नहीं करते. जनसंख्या एक, दो, तीन या चार की दर से नहीं, बल्कि चक्रवृद्धि ब्याज की दर से भी चार गुणा तेज गति से बढ़ती है. जनसंख्या बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं. इससे देश का विकास नहीं विनाश तय है.

इन नेताओं में अगर कुव्वत है तो देश में लोग ‘चार बीवियां और चालीस बच्चे’ न करे, इसके लिए ‘समान नागरिक कानून’ लाने की बात करें. सरकार दो से अधिक बच्चों पर टैक्स लगाएं. लोग कम से कम बच्चा पैदा करें इसके लिए कड़े कानून लाएं.

और जहां तक ‘चार बीवियां और चालीस बच्चे पैदा करने वालों की बात’ है. इनकी हालात से हर कोई वाकिफ है. देश में इनकी संख्या जितनी तेजी से बढ़ी, इनकी हालत भी उतनी ही तेजी से बद से बदतर गयी. उसी तेजी से इनमें बेरोजगारी, अशिक्षा और अपराध बढ़ा.

जरा चार शादी करने वाले मर्द और उनकी चार पत्नियों से किसी ने जाकर नहीं पूछा. किसी ने दस बच्चे पैदा करने वाली किसी महिला से उनके ‘प्रसव वेदना’ का दर्द नहीं पूछा.

फरमान जारी करने वालों ने उनके आंगन में जाकर नहीं देखा कि उनके बच्चों की परवरिश कैसे किस तरह हो रही है. देश की रक्षा के लिए सेना की फौज बनने के काबिल हैं या…

इनके छोटे-छोटे बच्चे शिक्षा से कोसों दूर छोटी उम्र में अपने परिवार को चलाने में मदद करने के लिए मेहनत मजदूरी कर रहे हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि इनका फायदा आतंकी संगठन उठा रहा है. हालांकि इनके विकास के लिए कांग्रेस सरकार लगातार प्रसासरत रही लेकिन वही ढ़ाक तीन पात.

ऐसे में कोई नेता जनसंख्या बढ़ाने की बात करता है तो उनकी ‘बुद्धि और सोच’ पर सवालिया निशान लगाया जाना लाजमी है.

सच तो यह है देश में नेताओं को अपना दिल और दिमाग दोनों को विकसित करने की जरूरत है. अब जनता जाग गई हैं. महिलाओं ने भी आंखें खोल ली है. अगर नेता ऐसी बयानबाजी करते रहे तो ‘आधी आबादी’ बिदक जायेगी और अगर बिगड़ी तो ‘जनाधार’ ही नहीं सियासत भी इनके हाथ से निकल जाएगी.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत में बतौर गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि अपने दौरे को समाप्त कर सऊदी अरब के लिए रवाना हो गए.

वहीं ओबामा ने अपना दौरा एक विवादास्पद टिप्पणी से खत्म किया.

अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने स्पीच में भारत के अंदरूनी सामाजिक और राजनीतिक द्वैष का भी अप्रत्यक्ष जिक्र किया है.

ओबामा ने कहा भारत उस समय तक सफलता अर्जित करता रहेगा जब तक वह धार्मिक आस्थाओं के आधार पर बंटता नहीं है.

उन्होंने कहा हर व्यक्ति को उत्पीड़न, भय और भेदभाव के बिना अपनी पसंद की आस्था को अपनाने का अधिकार है. ओबामा की यह टिप्पणी कुछ हिंदुत्व संगठनों के हाल के विवादास्पद धर्मांतरण और घर वापसी कार्यक्रमों के बीच आई है. इससे सोशल मीडिया में तीखी बहस छिड़ गयी है. इनमें कुछ ने ओबामा के भारत को नसीहत देने पर आपत्ति जताई है तो कुछ ने इसे सरकार को समय पर चेताने की बात कही.

दिल्ली के सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में ओबामा ने अपने 35 मिनट के अमेरिकी तर्ज के ‘टाउनहॉल’ संबोधन में  वहां मौजूद लोगों के बीच यह चेतावनी दी.

ओबामा ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 कहता है कि सभी लोगों को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार है.

माना यह भी जा रहा है कि अमेरिका एक तरफ जहां दोस्ती का हाथ बंटाता है तो वहीं दूसरी तरफ अपनी हरकतों से बाज नहीं आता. अमेरिका एक तरफ जहां भारत के लोकतंत्र की सराहना करता है तो वहीं दूसरी तरफ आतंकवाद से लैस पाकिस्तान की आर्थिक मदद भी करता है.

कहने का मतलब है कि ओबामा अगर चाहते तो अपनी इस सलाह से बच भी सकते थे.

दूसरी तरफ पीएम मोदी की लोकप्रियता से बौखलाए विपक्ष को बैठे-बैठाए सरकार को घेरने का मौका मिल गया. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने पहले तो ओबामा को उनके धार्मिक सहिष्णुता के बारे में दी उनकी सीख पर धन्यवाद किया और बाद में सरकार पर सवालों की बौछार कर दी. दिग्गी ने अपने ट्वीटर पोस्ट में लिखा कि क्या मोदी अपने दोस्त ओबामा की बात मानेंगे, क्या आरएसएस, वीएचपी को घर वापसी ना कराने की सलाह देंगे.

इसी तर्ज पर विपक्ष के और कई नेताओं ने मोदी पर अपने सवालों के तीर चलाए.

यहां देखा जाए तो विपक्षी नेताओं ने या तो ओबामा के संबोधन को ठीक से सुना नहीं या सुनकर भी अनजान बन रहे हैं.

ओबामा ने अपने संबोधन में भारत और अमेरिका के बीच कई समानताएं बतायीं. उन्होंने मोदी के शासन की शैली को अपने शासन की तरह बताया.

ओबामा ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि मोदी जिन मुद्दों पर भारत में काम कर रहे हैं मैं भी उन्हीं मुद्दों पर अमेरिका में काम कर रहा हूं. साथ ही ओबामा ने कहा कि हमारे देशों में पसंद के धर्म की आजादी सुनिश्चित करना सरकार ही नहीं वहां के लोगों की भी जिम्मेदारी है.

उन्होंने कहा हमारे दो महान देशों में धार्मिक सहिष्णुता है जहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, यहूदी, सभी बराबर हैं.

ओबामा के बयान का अगर ठंडे दिमाग से तात्पर्य निकाला जाए तो कोई भी व्यक्ति अगर किसी दूसरे शख्स के कार्यशौली की तुलना खुद से करता है तो जाहिर सी बात है कि वह उसे खराब नहीं मान रहा. कहने का मतलब ओबामा ने परोक्षरूप से मोदी की कार्यशैली की सराहना की है.

अब अगर बात हिंदू संगठनों द्वारा कराए जा रहे ‘घर वापसी’ (धर्मांतरण) कार्यक्रम की करें तो इस बहस के लिए तो मौजूदा सरकार पहले से तैयार है. जबरदस्ती धर्मांतरण ना कराया जाए इसके लिए ठोस कानून की वकालत मोदी सरकार हमेशा से करती आ रही है. वहीं विपक्ष राजनीतिक लाभ लेने के लिए तो धर्मांतरण के खिलाफ बयानबाजी करती रहती है लेकिन इसके खिलाफ ठोस कानून के लिए तैयार नहीं है. क्योंकि यहां वोटबैंक का सवाल है.

वहीं दूसरी तरफ भारत में धर्मांतरण की समस्या आज की नहीं बल्कि दशकों से होती आ रही है. क्या विपक्ष यह साबित कर सकता है कि गैर बीजेपी सरकारों में धर्मांतरण नहीं हुए ? क्या देश में साम्प्रदायिक हमले नहीं हुए ? और अगर सरकारें इसके लिए पूरी तरह से जिम्मेदार हैं तो क्या पिछली सरकारें यह जिम्मेदारी लेंगी? पिछली सरकारों ने इसके लिए क्या कदम उठाये ?

अब अगर भगवा नेताओं द्वारा कराए गए धर्मांतरण को सरकार की जिम्मेदारी मान भी लें तो क्या कांग्रेस सरकार में भगवा नेताओं ने कोई धर्मांतरण नहीं कराया. अगर ऐसा हुआ तो मौजूदा सरकार से ज्यादा पिछली सरकारें जिम्मेदार हैं जोकि यह समस्या अभी तक देश में बनी है.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने अभी बमुश्किल 8 महीने बीते हैं. उन्हें दोबारा इसी पद पर लाने के लिए हमारे कुछ भगवाधारी ज्यादा ही चिंता करने लगे हैं. उनकी यह चिंता कुछ दिनों से जोर पकड़ चुकी है.

अब आपको ज्यादा न घुमाते हुए सीधे प्वाइंट पर लाते हैं. कुछ भगवाधारी नेताओं ने अपने मार्मिक (विवादित) भाषणों में अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह शामिल कर ली है. इन लोगों ने हिंदुओं से अधिक बच्चे पैदा करने की नसीहत दी है.

इस फेहरिस्त में सबसे पहले बीजेपी नेता साक्षी महाराज का नाम जुड़ा जिन्होंने हिंदुओं से 4 बच्चे पैदा करने की नसीहत दी. इसपर लोगों के कमेंट्स आना शुरू ही हुए थे कि दूसरे भगवाधारी श्यामल गोस्वामी ने दो दिन बाद ही बच्चों की संख्या बढ़ाकर 5 कर दी. इन सभी को पीछे छोड़ते हुए तीसरा नाम जो जुड़ा उन्होंने तो हद पार कर दी.

जोशीमठ के शंकराचार्य वासुदेवानंद ने इलाहाबाद में आयोजित एक धर्मसंसद के दौरान कहा कि अगर मोदी को दोबारा पीएम बनाना है तो हर हिंदू परिवार 10 बच्चे पैदा करे.

अब मेरी एक बात समझ में नहीं आ रही कि ये लोग क्या नहीं जानते कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है. प्रजातंत्र का मतलब होता है हर वर्ग का प्रतिनिधित्व.

मोदी को दोबारा पीएम बनाने की चिंता

ऐसे में हमारे प्रधानमंत्री मोदी भी इस पद्धति से चुनकर ही आये हैं. और ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी सांसद जहां-जहां से चुनकर आये वहां हिंदुओं के अलावा किसी दूसरे संप्रदाय ने इस पार्टी को वोट नहीं दिया. जाहिर है कि पीएम को हर धर्म का प्रतिनिधित्व मिला.

अब सवाल इस बात का है कि जब मोदी की एक धर्मनिरपेक्ष नेता के तौर पर पहचान नहीं थी तब तो वह पूर्ण बहुमत से पीएम बने तो फिर यह भगवाधारी दोबारा किस तरह के चुनाव की बात करते हैं.

इन भगवाधारियों की सोच किस ओर इशारा कर रही है. क्या इस देश में जो लोग हिंदू धर्म से नहीं हैं उनके मन की सरकार नहीं होनी चाहिए? क्या उन्हें देश में रहने नहीं दिया जाएगा ? क्या उनपर उनके खिलाफ फैसले थोपे जाएंगे ?

कहने का मतलब है कि जब गैर हिंदुओं के प्रतिनिधित्व से भी मिलकर सरकार बनी है तो ऐसे पीएम मोदी से उनको क्या परहेज है. क्या इन भगवाधारियों को यह चिंता है कि मोदी को दोबारा चुनाव में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा. मोदी ऐसा क्या करने वाले हैं जिससे गैर हिंदुओं की त्योरियां उनपर चढ़ जाएंगी.

अगर सही तौर पर देखा जाए तो ये भगवाधारी बजाए मोदी का प्रचार करने के उनका दुष्प्रचार करने में लगे हैं. मतलब उनका यह नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ यानि उनके सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के एजेंडे को धता बता रहे हैं.

चीन में हर परिवार में सिर्फ एक बच्चा

आज हम अपने पड़ोसी देश चाइना से मुकाबला करने की सोच रहे हैं लेकिन यह नहीं सोंचते कि उनकी प्रगतिशीलता का राज क्या है. उनके यहां बच्चों की संख्या पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखी है. मतलब हर एक परिवार सिर्फ एक ही बच्चा पैदा कर सकता है. हालांकि अब कुछ परिवारों ने दूसरे बच्चे के लिए सरकार के पास आवेदन किया है लेकिन इसमें कुछ खास वर्ग ही शामिल है.

ज्यादा बच्चों की परवरिश नामुमकिन

बच्चों की परवरिश परिवार करता है ना कि कोई धर्म गुरू या नेता. किस परिवार को कितने बच्चे रखना है यह उसका अपना निर्णय होता है. मसलन गांव का परिवार सोचता है कि तीन-चार बच्चे होंगे तो खेती में या उसके अपने धंधे में हाथ बटाएंगे. जैसे बढ़ई, थवई, कुम्हार और लोहार इत्यादि. लेकिन अब गांवों में भी इतनी जागरुकता है कि हर व्यक्ति अपने बच्चों को अपने धंधे में ना डालकर पढ़ाना चाहता है. ऐसे में वह भी अब ज्यादा बच्चों का खर्च अपने ऊपर नहीं लेना चाहता.

शहरों में अगर नौकरीपेशा है तो आज की महंगाई में वह एक या दो बच्चों का खर्चा उठाना तो उसके लिए दूभर होता है तो वह 10 बच्चे कैसे पाल सकता है. इसलिए शहरी नौकरी पेशा परिवार बिना किसी दबाव या प्रलोभन के बच्चे कम पैदा करते हैं.

यह भी जग जाहिर है कि ज्यादा बच्चे वे ही परिवार पैदा करते हैं जिनके पास ना तो परिवार नियोजन के साधनों की पूरी जानकारी होती है और ना ही उन्हें उपलब्ध करने का आसान तरीका. जहां-जहां शिक्षा का प्रतिशत जितना ऊंचा है वहां बच्चों की संख्या उतनी कम.

इन भगवाधारी महानुभावों को यह नहीं पता कि हमारे देश का मुस्लिम समुदाय शायद इसीलिए पिछड़ा है क्योंकि उनके बच्चों की संख्या में इजाफा हुआ है. क्या हमें पिछड़े किसी तबके से बराबरी करनी चाहिए. बल्कि उन्हें भी कम बच्चों की सलाह देनी चाहिए.

भगवा लम्बरदारों को नसीहत

बड़बोले नेताओं से यही कहना है कि जहां से वह सांसद हैं अपने क्षेत्रों में जाकर वहां की बुनियादी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें. वहां के गांवों में अगर नजदीक स्कूल, कालेज नहीं हैं उसकी व्यवस्था करें. जिससे वहां के बच्चों को एक अच्छी तालीम मिले और देश के विकास में अपना हाथ बंटा सके.

घटना फैजाबाद की है। एक लड़की को पंचायत के निर्देश पर लगभग दो महीने दूसरे के घर जमानत के तौर पर रहना पडा। उसका कुसूर कुछ  भी नहीं था फिर भी वह लगातार बलात्कार की त्रासदी झेलती रही। दरअसल उसका भाई गांव की एक लड़की को भगा ले गया। इस बात पर पंचायत बैठी और फरमान सुना दिया गया कि जब तक भागे हुए प्रेमी-प्रेमिका घर लौट नहीं आते तब तक उक्त पे्रमी की बहन प्रेमिका के घर में जमानत के तौर पर रहेगी। इस घटना के सभी पहलुओं पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में महिलाओं की बदहाल स्थिति साफ नजर आती है। आज भी यहाॅ की महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल पाना दूर की कौड़ी हैं।

एक बड़ी जनसंख्या में महिला केवल हाड़ मांस के पुतले की तरह समझी जाती है जो चहारदीवारी के अंदर रहकर दिन भर खटराज निपटाये और रात में मर्द की शारीरिक भूख शांत करे यानि घर में उसकी उपयोगिता एक मशीन की तरह ही है। उसकी अपनी कोई इच्छाएं न हों, उसे कुछ भी चुनने, तय करने, निर्णय लेने और बोलने का भी अधिकार नहीं हैं। वह केवल घर के मर्द की सम्पत्ति है। ऐसी सम्पत्ति जिससे जुड़ी होती है घर की ‘इज्जत’। अगर महिला अपने मन से कुछ भी करना चाहे  तो घर की इज्जत पर आंच आती है। अब फैजाबाद की घटना को ही लीजिए उस लड़की को पता था कि उसे प्रेम करने की इजाजत नहीं है। फिर भी उसने लीक तोड़कर अपने प्रेम को परवान चढ़ाया लेकिन जीवन भर प्रेमी का साथ नहीं मिल पायेगा ये जान कर दोनो घर से भाग गये। दोनो घरों के सामंती मानसिकता के मर्दो के अहम को चोट लगी और पंचायत हुई पंचायत के फैसले में खामियाजा भुगता एक बेकसूर लड़की ने। घर की ‘इज्जत’ बचाने के लिए उसे दूसरे को सौंप दिया गया रौंदने के लिए।

सवाल ये उठता है कि एक लोकतांत्रिक देश में कब तक इस तरह के पंचायती फरमान चलते रहेंगे। घर की ‘इज्जत’ के नाम पर लड़कियों और महिलाओं की जान लेने की वैसे भी उत्तर प्रदेश में परम्परा रही है। इस मामले में पश्चिम उत्तर प्रदेश काफी आगे है। गैर जाति के युवक से प्रेम करने की सजा यहाॅ युवती को सरेआम कत्ल कर दी जाती है। कातिल कोई और नहीं लड़की के घर वाले ही होते है। लड़की ने कैसे अपने दिल की बात मान ली, ये उन्हें गवारा नहीं है। घर की ‘इज्जत’ पर दाग लगा देने वाली लड़की के साथ कई बार घर वाले ही सामूहिक बलात्कार करते है और फिर मौत के घाट उतार देते है। ये घटनाएं गांव के अंदर ही दफन हो जाती है। कुछ घटनाएं जरूर अखबारों की सुर्खिया बनती है लेकिन आज तक दोषियों को सजा मिलने का कोई मामला सामने नहीं आया।

पश्चिम उत्तर प्रदेश में ‘इज्जत’ के नाम पर महिलाओं को मौत देने के एक से डेढ़ दर्जन मामले हर वर्ष पुलिसिया डायरी में दर्ज होते हैं लेकिन वास्तविकता में इन घटनाओं की संख्या ज्यादा होती है। एक एनजीओ ने केवल मुजफ्फरनगर में ऐसी घटनाओं के आंकड़े इकठ्ठे किये तो वर्ष 2003 में 16, 2004 में 14, 2005 में 16, 2006 में 12, 2007 में 10 ओर 2008 में 14 घटनायें सामने आयी। हर वर्ष लगभग 18-20 लड़किया लापता हुूई। ये जीवित है या इज्जत की भेंट चढ़ गयी पता नहीं चला। औरत यानी मर्द की सम्पत्ति, वह जब चाहे इस सम्पत्ति का उपभोग करें, जैसे वह इसे रखे और मुसीबत आये तो आगे कर दे।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ

एक ‘मां’  और उसके मातृत्व की कीमत आप कितनी लगायेंगे, ये सवाल सुनने में अटपटा लगेगा लेकिन पिछले लगभग बीस दिनों से ये सवाल मेरे जेहन  मंे कौंध रहा है। इसका जवाब बताने के पहले मैं इस सवाल की कोख के बारे में आपको बताती हूँ  दरअसल पिछले दिनों हील फाउण्डेशन के द्वितीय राष्ट्रीय हेल्थ राइटर एण्ड कम्युनिकेटर कनवेंशन के दौरान मैं गोधरा के समीप स्थित दाहोद (गुजरात) की सांसद और स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा0 प्रभा ताबियाड से मिली। उनसे मिलकर और बात कर लग ही नही रहा था कि एक आदिवासी महिला के खाते  में इतनी सफलताएं दर्ज हैं और उन्हें गुमान तक नहीं। बात चली तो हम महिला होने के अनुभव बांटने लगे लेकिन उनके अनुभवों की पोटली जैसे-जैसे खुलती गयी मेरे शरीर के रोएं खड़े होते गये। अब तक मुझें यह भ्रम था कि हिन्दी पट्टी (उत्तर प्रदेश बिहार आदि) में ही स्त्री होने की सजा मिलती है लेकिन विकास की दौड़ में काफी आगे चल रहे गुजरात में भी स्त्री होने की सजा कम नहीं है। गोधरा से चालीस किलोमीटर दूर की एक घटना सुनकर मुझे कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों  ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी……….’ में घुला दर्द बहुत कम लगा। डा0 प्रभा बता रही थी और मेरी आंखों के सामने पूरी तस्वीर गड्डमड्ड हो रही थी। मात्र सत्रह बसंत देखने वाली एक आदिवासी बाला दर्द से तड़प रही थी और उसके नीचे बिछी चादर गंदगी से मैली है या खून से भीगी, यह पता लगाना मुश्किल था। उस गर्भवती महिला को तुरन्त खून चढ़ाने की जरूरत थी। जब उसके पति से खून देने को कहा गया तो उसने इनकार कर दिया। उसे डर था कि खून देने से उसे कमजोरी आ जायेगी। उसने पूछा कि क्या खून चढ़ाने से उसके बच जाने की गारन्टी है, उसे चालीस किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल तो नहीं ले जाना पड़ेगा। डा0 प्रभा ने कहा कि मैं पूरी कोशिश करूॅगी कि तुम्हारी पत्नी की जान बच जाये। फिर वह कुछ जोड़ने घटाने लगा और झटके से उठकर यह कहता हुआ जाने लगा कि अस्पताल ले जाने में पन्द्रह सौ रूपये खर्च हो जायेंगे इतने में तो दूसरी शादी कर लूंगा। ये मरती है तो मरने दो। डाक्टर ने जब उसे रोका कि इसके पेट में तुम्हारा बच्चा पल रहा है क्या तुम्हें उसकी जरा भी फिक्र नही है। मर्द ने बड़े गुरूर से कहा मैने अपना काम कर दिया बाकी इसकी किस्मत। डा0 प्रभा ने कहीं से खून की व्यवस्था कर उस महिला की जान बचाई। उनके पास ऐसी घटनाओं के इतने पन्ने हैं कि उन्हें इस ब्लाॅग में समेट पाना मुश्किल हैं लेकिन इन अनुभवों में जो दर्द और  बेबसी है उसे केवल इस पंक्ति से समझा जा सकता है कि यहाॅ के अधिकतर मर्दो के लिए उनकी बीवी एक यूज एण्ड थ्रो पेन की तरह है, उसकी तब तक उपयोगिता है जब तक उसमें स्याही है। बीवी की पूछ तब तक ही होती है जब तक वह हंसते-मुस्कराते सबकी सेवा टहल करती रहती है ओर उसके बीमार होते या बच्चा जनते समय जान जोखिम में पड़ते ही उसका मर्द पति उसे ‘थ्रो’ करने से गुरेज नहीं करता है। फिर नयी ‘पेन’ के साथ नयी जिन्दगी की शुरूआत, जिसमें थ्रिल है और मर्द होने का गर्व भी ।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ

दुनिया के लिए तो दूर, भारत या पाकिस्तान के लिए भी उनकी कोई अहमियत नहीं रह गई थी. लाखों करोड़ों लोगों की ही तरह जब वो पैदा हुए थे उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही वर्षों बाद वक़्त क्या करवट लेने वाला है.

और सचमुच समय का पहिया कुछ ऐसे अनपेक्षित अंदाज़ में घूमा कि जैसे इतिहास या वक़्त ही नहीं बल्कि पूरी ज़िंदगी ही काँप गई थी.

बहरहाल, शनिवार, 17 मार्च 2012 को दुनिया को अलविदा कहते समय इस व्यक्ति की ज़ुबान पर सारी वही कहानियाँ या घटनाएं थीं जो देश आज़ाद या विभाजन के समय थीं.

वक़्त उनके लिए जैसे थम गया था या मुड़कर फिर से उसी पड़ाव पर पहुँच गया था जब एक ही भारत हुआ करता था, यानी पाकिस्तान नहीं बना था.

मगर हक़ीक़त को कैसे झुठलाया जा सकता है. हालाँकि हक़ीक़त ये थी कि उनकी अंतिम घड़ियाँ नज़दीक आ पहुँची थीं लेकिन उनकी ज़ुबान पर यही पुकार थी कि उन्हें उसी घर की झलक दिखा दी जाए जहाँ उनका भरा पूरा ख़ानदान 1947 तक रहा करता था.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान की पैदाइश 1935 की थी. यानी 1947 में उनकी उम्र लगभग 12 साल थी जब इस अल्हड़ उम्र में उन्हें पहाड़ जैसे बोझ ने दबा लिया था.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान उर्फ़ नफ़ीस की कहानी भी लाखों करोड़ों हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों से अलग नहीं है जिन्होंने विभाजन होते देखा और ज़िंदगी भर ये दर्द उनके सीने से किसी गोह की तरह चिपटा रहा और मरते दम तक नहीं छूट सका.

क़रीब 77 वर्ष की ज़िंदगी जीने के बाद भी जब मौत नज़दीक आई तो जैसे वो टीस फिर से हरी हो गई और आख़िरी इच्छा रही कि काश, समय मुड़कर फिर से वहीं पहुँच जाए जैसाकि 1947 के उस ख़ास दिन से पहले हुआ करता था.

हालात चाहे सआदत हसन मंटो के टोबा टेक सिंह के हों, ए ट्रेन टू पाकिस्तान या पिंजर के, इस तरह की मुश्किल ज़िंदगियाँ जिसने जी हैं, दर्द, तकलीफ़ और खोने की टीस का अंदाज़ा और कोई नहीं लगा सकता.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान भी बग़ावत नगरी कहे जाने वाले मेरठ में अपने भरे पूरे परिवार के साथ रहते थे. परिवार में सबसे छोटे थे, तो ज़रा लाडले भी. परिवार के सभी सभी सदस्य ख़ासे पढ़े लिखे थे और अंग्रेज़ी सरकार के समय में ही नौकरी पेशा भी हो चुके थे.

ख़ासा बड़ा घर था इसलिए ठाठ बाट से रहने की आदत भी थी. मुश्ताक़ चूँकि किशोरावस्था में क़दम रख ही रहे थे, इसलिए दुनिया और ज़िंदगी की हक़ीक़तों से बेख़बर और ग़ाफ़िल भी थे. या यूँ कहिए कि वो उम्र नहीं थी ये सब सोचने की.

बहरहाल, अचानक बँटवारे का डंका बजा और जैसे सबकुछ बदल गया. मुश्ताक़ शहर में कहीं अपने दोस्तों के साथ अठखेलियाँ करने हुए निकले थे कि अचानक शहर में दंगे भड़क उठे और कर्फ़्यू लग गया. ऐसी अफ़रा-तफ़री मची कि जो जहाँ था, वहीं जान बचाने के लाले पड़ते दिखे.

हैवानियत का ऐसा खेल शुरू हुआ कि दोस्त दुश्मन में बदल गए, हालाँकि कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने दुश्मनी की चादर फेंककर दोस्ती का लिबास पहना तो इंसानियत ने राहत की साँस भी ली.

कुछ ऐसी ही चादरों ने मुश्ताक़ को इस दुनिया में अकेला होते हुए भी, अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. ख़ैर ऐसे माहौल में अपने घर पहुँचने का तो सवाल ही नहीं था इसलिए एक रिश्तेदार बुज़ुर्ग औरत के घर में पनाह लेना बेहतर समझा.

ये वो घर था जहाँ वो कभी-कभार सुस्ताने और बुज़ुर्ग ख़ातून का लाड-प्यार पाने की लालसा में आ जाया करते थे. इसलिए वो भी जैसे उनका दूसरा घर ही बन गया था. उन्हें क्या मालूम था कि नियति ने उनके लिए वो कुछ लिख दिया था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी की नहीं होगी.

ज़ाहिर सी बात है कि उस ज़माने में संपर्क के टेलीफ़ोन जैसे साधन तो थे नहीं, इसलिए बाज़ लोगों को तो ये भी पता नहीं चला कि वक़्त की उस बेरहम अंगड़ाई में कौन जीवित बचा या किसे दुनिया से ज़बरदस्ती रुख़सत कर दिया गया.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान के लिए उन बुज़ुर्ग़ रिश्तेदार के घर से निकलना जान जोखिम में डालना था, लेकिन कुछ हफ़्तों बाद जब हिम्मत करके निकले तो, जो हुआ उसे देखकर उनके होश उड़ गए.

मुश्ताक़ जब अपने घर से निकले थे उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था फिर कब और किस हालत में आना होगा. जब पहुँचे तो वो घर उनका नहीं बचा था. उस घर ने मुश्ताक़ से आँखें फेर ली थीं और पहचानने से इनकार कर दिया.

वो घर जहाँ मुश्ताक़ पैदा हुए, जहाँ उनके भरे पूरे ख़ानदान की आवाज़ें और ठहाके गूँजते थे, जिसने मुश्ताक़ को भी पैदा होते ही अपनी आग़ोश में जगह दी, लेकिन वक़्त ने फ़िज़ाँ में इतनी बेरहमी घोल दी थी, कि जो भी अपना था, पराया हो गया या पराया लगने लगा.

बहरहाल, उस घर में मुश्ताक़ को दाख़िल होने की इजाज़त नहीं मिली क्योंकि पूरा ख़ानदान रातों-रात खींची गई विभाजन रेखा के उस पार यानी पाकिस्तान चला गया था.

नियमों के अनुसार वो घर किसी और ख़ानदान को आबंटित कर दिया गया था और जैसा कि बाद में पता चला, मुश्ताक़ के ख़ानदान को पाकिस्तान के कराची में रिहायश मिल गई थी. लेकिन मुश्ताक़ के हिस्से में क्या आया?

ये बात और थी कि या तो मुश्ताक़ भी अपने पूरे ख़ानदान के साथ पाकिस्तान चले जाते या फिर उनका पूरा ख़ानदान यहीं रहता तो हालात कुछ और होते. ये बहस का मुद्दा नहीं है कि मुश्ताक़ का पूरा ख़ानदान पाकिस्तान जाकर अच्छा रहा या भारत में ही अच्छा रहता, मुद्दा ये है कि 12 साल का एक अपरिपक्व लड़का अगर पूरे ख़ानदान से बिछड़ जाए तो उसके दिमाग़ और दिल की कैफ़ियत समझने के लिए कुछ अलग समझदारी की ज़रूरत होगी.

अब मुश्ताक़ के सामने हिमालय से भी बड़ी चुनौती ये थी कि ज़िंदगी को कैसे जिया जाए, जिया भी जाए या नहीं. ये एक ऐसा फ़ैसला था जो किसी के लिए भी मुश्किल था. बल्कि सच कहा जाए तो ये चुनौती मुश्ताक़ के ही सामने नहीं बल्कि उन हज़ारों लोगों के सामने थी जिन्हें सदियों से बसी-बसाई ज़िंदगी को छोड़कर सीमा को लांघना पड़ा था.

12 साल के बच्चे को कौन सहारा देता, वो भी ऐसे माहौल में जहाँ ख़ुद का वजूद बनाए रखना हर किसी के लिए हर दिन की चुनौती थी. वजूद बनाए रखने की इस जद्दोजहद में मुश्ताक़ के सामने दो रास्ते थे, वैसे सच कहें तो एक ही रास्ता बचा था और वो ये कि शिक्षा को जारी रखना तो संभव ही नहीं था, इसलिए रोज़ी-रोटी चलाने के लिए जो भी काम मिला करना शुरू कर दिया.

शुरू में तो उन्हें भी यही उम्मीद थी कि एक दिन वो भी पाकिस्तान जाकर अपने ख़ानदान के साथ बस जाएंगे लेकिन वक़्त ने फिर करवट बदली और उनकी ये ख़्वाहिश पूरी ना हो सकी.

बताते थे कि वो जब भी पाकिस्तान जाते थे तो उनकी माँ तब तक दरवाज़े पर खड़ी होकर देखती रहती थीं जब तक वो उनकी आँखों से ओझल नहीं हो जाया करते थे.

और हर बार यही कसक दिल में रहती थी कि अब न जाने एक दूसरे को फिर देख सकेंगे या नहीं. जब तक माँ-बाप और भाई बहन रहे तो उन्होंने और उनके कुछ बच्चों ने ताल्लुक़ात रखे और आना जाना भी रहा, लेकिन ये सिलसिला ज़्यादा दिनों तक ना चल सका, ख़त भी आने बंद हो गए और फिर तो कभी-कभार टेलीफ़ोन से ही बात हो जाती थी, जो थोड़े समय बाद बंद हो गई.

1947 में जब मुश्ताक़ का सामना ज़िंदगी की कठोर हक़ीक़त से हुआ तो 12 साल की उम्र वैसे भी रूमानी ख़यालों में जीने की ही होती है और मुश्ताक़ हुसैन ख़ान भी उर्दू और फ़ारसी के शेर पढ़ने में दिलचस्पी रखते थे जिनमें कुछ फ़लसफ़ाना पुट भी होता था.

बाद में ये शेर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए लेकिन इसी दानिशमंदाना अंदाज़ ने उन्हें एक सच्चा और ईमानदार इंसान बनाया जिसने कभी भी लालच को अपने दिल में नहीं घुसने दिया.

हमेशा दूसरों की मदद की और ज़िंदगी भर हमेशा इस बात की ही भरसक कोशिश करते रहे कि अनजाने में भी किसी का रत्ती भर भी नुक़सान ना हो जाए. तालीम के बहुत बड़े हिमायती थे मुश्ताक़ हुसैन ख़ान.

ख़ुद तो हालात की सितमज़रीफ़ी की वजह से नहीं पढ़ सके मगर इकलौती बेटी को समाज के तमाम तानों और उलाहनों के बावजूद उच्च शिक्षा दिलाई. लेकिन मरते दम तक किसी का अहसान लेने का क़याल ही उनकी रूह को हिला देता था इसलिए बेटी-दामाद के इंग्लैंड आकर बसने के न्यौते को भी क़बूल नहीं किया.

यूँ तो बात बहुत लंबी हो जाएगी लेकिन असल बात ये है कि जब मुश्ताक़ हुसैन ख़ान की मौत की घड़ियाँ नज़दीक आईं तो वो एक बार फिर से 1947 के दिनों में वापिस चले गए लगते थे.

वो सारी वही बातें याद कर रहे थे जो 77 साल पहले पीछे छूट गई थीं. उन्हें पाकिस्तान में बसे और दुनिया छोड़ चुके सारे रिश्तेदार उसी शिद्दत से याद आए और वो घर भी जहाँ उनके सिर्फ़ 12 साल गुज़रे थे लेकिन वो 12 साल बाक़ी 65 साल से अलग थे.

ज़माना बहुत आगे बढ़ चुका है, अब तीसरी पीढ़ी परवान चढ़ चुकी है, नई उम्मीदों और मूल्यों के साथ. पुरानी पीढ़ी अपने मूल्यों के साथ भी पुरानी पड़ गई लगती है जहाँ ईमानदारी, भलमनसाहत, दूसरों का भला चाहने और करने की आदत को बेवकूफ़ी क़रार दे दिया गया है.

लेकिन मुश्ताक़ हुसैन ख़ान ने ना सिर्फ़ इन मूल्यों को कभी छोड़ा बल्कि अपनी पत्नी और औलाद को भी इन्हें ना छोड़ने की विरासत करके गए हैं.ये और बात है कि भारत पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व 65 साल पुरानी इस टीस को कभी समझ पाएगा जो मुश्ताक़ हुसैन ख़ान जैसे लाखों-करोड़ों लोगों की रही है जिनमें से ज़्यादातर तो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं और जो कुछ होंगे, वो भी ज़्यादा दिन इस दुनिया के सूरज की रौशनी नहीं देख सकेंगे.

लेकिन एक बड़ा सवाल सभी की आँखों में चमकता रहता है कि 1947 में जो कुछ हुआ क्या उससे इंसानियत का कुछ भला हुआ है. अगर वही एक मात्र समस्या का हल था तो इन 65 वर्षों में अनगिनत लोगों की जानें क्यों गई हैं और अब भी ये सिलसिला रुका नहीं है.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान जैसे बुज़ुर्गों की सूनी आँखों में आख़िरी हिचकी तक मौजूद रहे इन सवालों का जवाब किसी के पास हो तो मेहरबानी करके ज़रूर पेश कीजिएगा, बहुत मेहरबानी होगी.

महबूब ख़ान
लंदन से

कहते हैं कि सपनों की भी अपनी अलग ही दुनिया होती है. हकीकत में जिन चीज़ों को हम नहीं पा सकते सपनों में उन सबको सहजता से हासिल कर लेना नामुमकिन नहीं. यह बात भी कितनी सच है कि अगर सब कुछ असल ज़िंदगी में मिल ही जाता तो सपने भला आते ही क्यों!

मैंने भी कई तरह के सपने देखे हैं. मेरे सपने कभी मुझे लंदन- अमेरिका की सैर करा लाए तो कभी हसीनाओं के संग अठखेलियां करने के लिए समंदर किनारे भी छोड़ दिया. ये मरे सपने ही हैं जिनमें मुझे अपनी नौकरी में इतना बड़ा प्रोमोशन मिला कि मैं अपने बॉस का बॉस बन गया. सपनों की रंगीन दुनिया के सहारे ही मैं कभी लंबी सी कार में बैठकर फाइव स्टार होटल में डिनर करने गया तो कभी ठीक इसके उलट रेलवे स्टेशन के बाहर चरसियों के बीच रात गुज़ारी.

मैं दूसरों के सपनों के बारे में तो नहीं जानता पर अपने सपनों के बारे में ज़रूर कह सकता हूं कि मुझे कुछ इसी तरह के अजब-गजब सपने आते रहते हैं. शायद इसीलिए कभी व्याकुल हो जाता हूं कि कहीं मुझमें कोई ऐब तो नहीं जो इस तरह के सपने दिखाई देते हैं.

कभी- कभी सोचता हूं तो लगता है कि शायद मैं बहुत संवेदनशील हूं और जो कुछ भी गहराई से महसूस करता हूं, देखता हूं या फिर जो बातें मेरे दिल-दिमाग़ को छू जाती हैं वो सब किसी न किसी रूप में, कभी न कभी मेरे सपनों का हिस्सा बन जाती हैं.

हमारे देश में राजनीति और क्रिकेट का बहुत महत्व है. पता नहीं क्यों क्रिकेट कभी बहुत अपील नहीं किया परन्तु राजनीति और नेता मुझे अकसर झकझोरते रहते हैं.

राजनीति के प्रभाव और फैलाव का ही असर है कि कुछ दिन पहले मेरे सपने में एक नेताजी आए. उनके पास कोई सत्ता या राजनीतिक पद तो नहीं था पर राजनीति के गलियारों में उनका कद बहुत ऊंचा था. वो मंत्री तो नहीं थे पर लोगों को मंत्री बनवाने का रुतबा रखते थे.

नेताजी से मेरी मुलाकात दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई. हम दोनों को चेन्नई जाना था– मुझे दफ्तर के काम से और उन्हें भी किसी चुनावी सभा में भाग लेने के लिए. इत्तफाक की बात कि नेताजी के साथ कई टीम-टाम नहीं था और हम दोनों एयरपोर्ट पर अगल-बगल बैठकर फ्लाइट का इंतज़ार कर रहे थे. कुछ ही पलों में न जाने कैसे और क्यों हम एक दूसरे से खुल गए. बातों- बातों में नेताजी ने मेरे बारे में काफी पूछताछ कर डाली, मसलन मेरी नौकरी, तन्ख़्वाह, मेरी आकांक्षाएं, मेरा परिवार आदि. देश, समाज और राजनीति पर भी हमारी काफी बातचीत हुई. जान-पहचान और अपनापन कुछ इतना बढ़ गया कि हमने तय किया कि हम लोग चेन्नई में भी मौका निकालकर मुलाकात करेंगे.

मैं चेन्नई के एक होटल में ठहरा और वह एक सरकारी भवन में. दूसरे दिन सुबह ही नेताजी ने मुझे बुलावा लिया और कुछ ही देर में एक गाड़ी होटल के नीचे आ खड़ी हुई. सफेद रंग की रपारप टाटा सफारी, सीटों पर सफेद कवर और चारों ओर काले शीशे. कार में एक ड्राइवर, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक अर्दली. मेरा मन गदगद हो गया. इतनी शान से सड़क पर निकलूंगा यह तो मेरी कल्पना से भी परे था.

थोड़ी ही देर में मैं नेताजी के पास था. सोचा था वो सरकारी भवन में रुके हैं, सरकारी किस्म का ही होगा. पर यहां के ठाट-बाट तो मेरे होटल से कहीं अधिक थे. नेताजी एक बड़े से कमरे में कोई बैठक ले रहे थे सो मुझे एक दूसरे कमरे में आराम करने के लिए कहा गया. यह कमरा भी कम नहीं था. शानदार बेड और उसपर सफेद चादर-तकिया-तौलिया, बगल में पढ़ने की मेज़-कुर्सी और दूसरी तरफ बढ़िया सा सोफा सेट. फर्श पर साफ-सुथरा कालीन. सरकारी चमक-दमक मुझे भा गई.

करीब एक घंटे के बाद नेताजी आए और हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ. इस बार बातें राजनीति, शासन, समाज और आम आदमी से जुड़ी हुई थीं. थोड़ी ही देर में नेताजी ने कहा कि राजनीति में आओगे! एकाएक ऐसी बात सुनकर मैं सकपका गया और वह मेरी घबराहट भांप गए. बोले घबराओं नहीं मेरा हाथ तुम्हारे ऊपर रहेगा और तुमको हर जगह वीआईपी ट्रीटमेंट मिलेगा. मन तो ललचाया पर राजनीति मेरी पिछली सात पुश्तों में किसी ने नहीं की थी. उल्टे सभी लोग नेताओं का मज़ाक ही बनाते रहते हैं. तरह-तरह के सवाल मेरे मन में उठने लगे. नेताजी ने कहा घबराओँ मत और हां कर दो, ज़िंदगी संवर जाएगी और आने वाली पुश्तें भी निश्चिंत हो जाएंगी.

मैंने कहा हां तो कर दूं पर कामकाज कैसे करूंगा, मुझे तो इस विधा का दूर-दूर तक ज्ञान नहीं है. नेताजी ने कहा कि राजनिति ही तो वह विधा है जिसके लिए किसी विशेष ज्ञान, शिक्षा या योग्यता का होना ज़रूरी नहीं है. पढ़ाई की डिग्री है ही, एक सफल करियर का सपोर्ट भी है. बस तुम्हें मंत्री बनाने के लिए इतना काफी है.

वाह, सपनों में एक नेता ने मुझे मंत्री बनने का सपना दिखा दिया. अब तो मैं सचमुच सपने बुनने लगा. फिर भी मन में शंकाएं थीं. लग रहा था कि राह आसान नहीं है और अगर कहीं नैया डूबी तो राजनीति तो जाएगी ही करियर से भी हाथ धो बैठूंगा.

इसके बाद तो नेताजी ने एक लेक्चर ही पिला दिया. बोले डॉक्टर, इंजीनियर और बड़े-बड़े मैनेजरों को तुमने नेता बनते देखा होगा पर क्या कभी किसी नेता को वापस डॉक्टर, इंजीनियर या मैनजर बनते सुना है. उन्होंने कहा कि राजनिति नौकरी की तरह सुरक्षित तो नहीं है पर इसमें पैसे और शोहरत की कमी भी नहीं है. मीटिंग, कामकाज और चुनाव के कारण देशाटन करने का भरपूर मौका मिलता है. हवाई जहाज़ का खर्च, रहना-खाना, गाड़ी-बंगला तो देख ही रहे हो, ठसके में कोई कमी लग रही हो तो बताओ? और यह सब मेरे पास तब है जब मैं मंत्री तक नहीं हूं.

नेताजी ने कहा कि चुनावी सभा में लोगों का दिल जीतने के बजाय उनका ब्रेन वॉश करना ही तुम्हारा मकसद होगा. इसके लिए सच का झूठ और झूठ का सच भी कहना पड़े तो घबराना मत, ये सब तो बातें हैं—आज कह दीं, कल भूल गए. सफलता के लिए सिर्फ अपनी पार्टी और अपने काम का ही गुणगान करते रहो. साथ ही दूसरी पार्टी की बुराई और उसके नेता पर उंगली उठाने से मत चूकना, बस जीत पक्की समझो.

उन्होंने कहा कि आम आदमी बहुत मासूम होता है और उसकी भावनाएं कोमल. जहां जाओ वहां के लोगों के बारे में पहले से ही फीडबैक ले लो और मिलने पर उन्हीं की भाषा बोलो, उनकी समस्याओं के बारे में बातें करो और उनको आगे बढ़ने का सपना दिखाओ. बस जीत पक्की समझो.

रैलियों में भाग लेने से लेकर मंत्री बनने तक तुम छोटे-बड़े इतने इलाकों में घूम चुके होगे और इतने लोगों से उनकी इतनी समस्याएं सुन चुके होगे कि मंत्री बनने पर कुछ भी याद नहीं रहेगा. और मंत्री बनने के बाद इतने बड़-बड़े काम होते हैं कि गली-मोहल्लों की बातें पूरी करने का वक्त किसके पास है. मोटे-मोटे काम कर दो और उन्हें जताने में पीछे मत रहो. बस सफलता पक्की समझो.

हो सकता है कुछ लोग तुम्हें बेशर्म कहें या मौकापरस्त पर कामयाबी की कुछ तो कीमत चुकानी पड़ती है मेरे यार. उन्होंने कहा कि आखिर नौकरी में भी तो तुम कभी झूठ बोलते हो, अपने काम की तारीफ और दूसरे के काम की बुराई करते हो. इतना ही नहीं तरक्की पाने के लिए बॉस की चाटुकारिता भी करते हो. दिन-रात इसी में गुज़र जाते हैं कि नौकरी बनी रहे, बॉस खुश रहे, प्रोमोशन मिलता रहे और इन्क्रीमेंट अच्छा हो जाए.

नेता भी यह सब करते हैं. पर इसका फायदा बड़े लेवल पर होता है. रहने को बड़ा बंगला मिलता है, हवाई जहाज़ से देश-विदेश जाते हो, नौकर-चाकर, सेक्रेटरी और आगे-पीछे घूमते लोग. किसी का काम करना नहीं है, करने का आदेश दे देना है. काम हो गया तो वाह-वाही आपकी और अगर और नहीं हुआ तो विरोधियों की चाल. ऊपर से तुम्हारा हर काम समाजसेवा कहलाएगा और देशभक्त कहलाने का सम्मान जो मिलेगा वह अलग.

सत्ता बड़ी चीज़ है भैया, बस हर नेता को थोड़ा चमड़ी मोटी करनी ही पड़ती है. थोड़ी होशियारी से चलो और ज़रूरत से ज़्यादा लालच अगर न रखो तो लंबी पारी पक्की समझो.

नेताजी की बातें मुंगेरीलाल के सपनों से कम नहीं थीं और मैं इन्हें समझ भी रहा था. पर फिर भी मैने तय कर लिया कि अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ दूंगा और राजनीति के समंदर में कूद जाऊंगा. अगर मोती पाना है तो तालाब में नहीं, सागर में गोता तो लगाना ही होगा.

इतनी देर में घड़ी का अलार्म घनघना उठा. मेरी नींद खुल गई और सपना टूट गया. पलंग पर मैं अकेला पड़ा था और मेरे चारों तरफ थीं कोरी दीवारें. रात के अंधेरे में जिस नेता से मैं सपने में मिला था, दिन के उजाले में अब अपने सपनों के नेता को तलाशने की कोशिश कर रहा था.


कहते हैं मुनष्य योनि श्रेष्ठ होती है और बड़े भाग्य से इसमें जन्म मिलता है. ऐसा हो भी क्यों न–  आख़िर 84 करोड़ योनियों को पार करके हम मनुष्य रूप में धरती पर अवतरित होते हैं.

विकास कुदरत का नियम है. हर बच्चा शैशवकाल से निकल कर शनै: शनै: बड़ा होता है और विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए जीवन को अपनी तरह से बेहतर बनाने के प्रयास में जुट जाता है. एक पंक्ति  में कहा जाए तो यही जीवन का क्रम है.

कुछ ऐसा ही क्रम उस शहर का भी होता है जिसमें हमारा जन्म एक बालक के रूप में होता है, जिस शहर में हम चलना सीखते हैं, खेलते- कूदते हैं, पढ़ते-लिखते हैं और अपने जीवन को एक निश्चित दिशा देते हैं ताकि हम एक कामयाब मनुष्य बन सकें और अपने आसपास के लोगों में यश के भागीदार बन सकें.

मनुष्य और शहर का नाता अधिक समझाने की ज़रूरत नहीं है. जिस तरह एक मानव का विकास  होता है ठीक उसी तरह एक शहर का भी विकास होता है. हर शहर अपनी बाल्यावस्था से होते हुए, विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए अपना एक मुकाम बनाता है. वैसे तो हर शहर विकास की दौड़ दौड़ता है पर इनमें से कुछ इस दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं कि पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं. कुछ शहर तो इतने भाग्यशाली होते हैं कि उनके देश की पहचान भी उन्हीं से बन जाती है.

मनुष्य के विकास और शहर के विकास में थोड़ा फर्क़ भी होता. जहां मनुष्य का विकास काफी सीमा तक स्वत: होता है, शहर का विकास मानव बुद्धि और मानव शक्ति के बिना असंभव है.

मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ. पिता की आजीविका उन्हें दिल्ली शहर तो ले ही आई साथ में मुझे भी शैशवकाल से ही इसी शहर में ला पटका. शायद नियति की यही इच्छा थी. मैने कब दिल्ली शहर में होश संभाला और चलना सीखा कह नहीं सकता. इसके बाद तो मैं, और अब मेरा हो चुका दिल्ली शहर, दोनों ही विकास के क्रम में आगे बढ़ने लगे.

धीरे- धीरे मैं तो दिल्ली की भीड़ में कहीं खो गया लेकिन दिल्ली नहीं हारी और विकास को अपना हमसफर चुन जीवनपथ पर बढ़ती रही, बढ़ती रही. दिल्ली भाग्यशाली है कि भारत की सत्ता को अपने हाथ में ले चुके फिरंगी भी इसके विकास की बात निरंतर सोचते रहे. दिल्ली ही वह खुशकिस्मत शहर है जो इतिहास के हर दौर में विकास पथ पर अग्रसर रहा. शुरुआती दिनों से आज तक न जाने कितने लोगों ने दिल्ली पर शासन किया, इसके विकास को अपने कार्यक्षेत्र की एक उपलब्धि समझा और इस पर फक्र किया.

दिल्ली के विकास में भले ही मेरी भूमिका नगण्य हो फिर भी मैं कम किस्मत वाला नहीं हूं क्योंकि मैंने दिल्ली को विकास पथ पर चलते देखा है. यह बात दीगर है कि यह सब यूं ही नहीं आया और बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना भी पड़ा.

मुझे याद है दिल्ली अपने गोल-चक्करों के लिए जानी जाती थी लेकिन विकास के लिए इनकी कुर्बानी देनी पड़ी और ये रफू-चक्कर हो गए. दिल्ली जानी जाती थी अपनी चौड़ी और लंबी सड़कों के लिए. ये आज भी हैं पर अब ये सड़कें कम, भूल-भुलैया ज़्यादा हैं. दिल्ली जानी जाती थी अपने शानदार बंगलों के लिए पर अब आधुनिकिकरण का ज़माना है और इनकी जगह गगन-चुंबी इमारतें खड़ी हो गई हैं. कोई ताज्जुब नहीं आने वाले समय में दिल्लीवासी सूर्योदय और सूर्यास्त सिर्फ फिल्मों में देखा करेंगे.

दिल्ली जानी जाती थी अपने बाज़ारों के लिए. कनाट प्लेस लाटसाहबों का बाज़ार कहलाता था पर आधुनिकीकरण के युग में अब अपनी पहचान गंवा बैठा है. कुछ यही हाल यहां के प्रसिद्ध थोक बाज़ारों का भी है. वो मशहूर थे और आज भी हैं, मगर अफसोस, विकास अभी यहां से कोसों दूर है. अपने पिता की उंगली थामकर चांदनी चौक और उसकी गलियों को मैंने जिस हाल में देखा था, लगभग उसी हाल में मेरे बेटे ने मेरी उंगली थाम कर चांदनी चौक को देखा. अगर यही आलम रहा तो कोई ताज्जुब नहीं मेरा बेटा भी अपने पुत्र को ठीक वैसा ही चांदनी चौक दिखाएगा. ऐसा हुआ है यहां का विकास कि पुश्तें बीत गईं पर बदहाली वैसी की वैसी है.

दिल्ली के इन बाज़ारों में, यहां की गलियों में व्यापार तो करोड़ों का होता है पर इनकी बेहतरी के लिए क्या हुआ है यह तो सरकारी अमला ही जानता होगा. बहरहाल सच तो यह है कि इन इलाकों में आधुनिकीकीरण या विकास दिखाई तो ज़रा भी नहीं देता, फाइलों और नेताओं के भाषणों में इनका ज़िक्र अलबत्ता हुआ होगा.

खेलकूद में भी दिल्ली कभी पीछे नहीं रही. यह गौरव की बात है कि दिल्ली में एक नहीं कई-कई स्टेडियम बने हैं जहां अनेकों अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताएं और खेल आयोजन हुए हैं. सन 1982 के एशियाड खेल और अक्टूबर 2010 में संपन्न हुए कॉमनवेल्थ गेम्स किसे याद नहीं. दिल्ली के विकास का बहुत बड़ा श्रेय इन खेल आयोजनों को जाता है. यह बात दीगर है कि इन खेलों के आयोजक भी कम खिलाड़ी नहीं थे. इन्होंने दिल्ली का विकास और श्रृंगार कम, अपना और अपनों का भरपूर विकास ज़रूर किया.

पहले की दिल्ली की तुलना में आज की दिल्ली बहुत दूर आ गई है. आज यहां बड़ी-बड़ी इमारते हैं, बड़े- बड़े फ्लाईओवर हैं, बड़े-बड़े शापिंग माल हैं, चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं, सड़क के नीचे और सड़क के ऊपर दौड़ने वाली मेट्रो ट्रेन है, ढेर सारी कारें हैं, ढेर सारे दफ्तर, छोटे-बड़े उद्योग हैं, और सबको लुभाने वाली चमक-दमक भी है. पहले यह सब कुछ इतने बड़े पैमाने पर न था. एक चीज़ और जो पहले इतने बड़े पैमाने पर नहीं थी वह है अपराध. दिल्ली आगे ज़रूर बढ़ी लेकिन इसके साथ ही आधुनिक होते इस शहर में अपराध भी बढ़े. रंजिश, ईर्ष्या, संवेदनहीनता, छीना-झपटी, छुरेबाजी, चोरी-डकैती, वृद्धों का अपमान, औरतों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, बच्चों की असुरक्षा, तुनकमिजाज़ी, गुस्सा, बेसब्री, बेईमानी, झूठ-फरेब और न जाने क्या-क्या बढ़ा है दिल्ली में. आधुनिकीकरण की दौड़ में इंसानियत, प्रेम और सह्रदयता जैसी छोटी-छोटी बातें न जानें कहां छूट गई हैं.

मेरी दिल्ली विकास पथ पर है. इसके साथ-साथ मेरा भी विकास हुआ है और मैंने नए ज़माने की बहुत सी आधुनिक सुविधाओं के साथ जीना सीखा है. कभी- कभी मुझे गर्व होता है कि जिस शहर में मेरा तीन-चौथाई जीवन गुज़रा है वह दुनिया के किसी दूसरे बड़े शहर से कम नहीं. पर फिर भी अफसोस होता है कि इतना विकास और आधुनिकीकरण दिल्ली को वह मुकाम नहीं दिला पाया है जो न्यूयॉर्क ने अमेरिका को दिलाया, जो लंदन ने इंग्लैंड को दिलाया, जो टोक्यो ने जापान को दिलाया, जो शांघाई ने चीन को दिलाया, जो हांगकांग ने थाईलैंड को दिलाया, जो दुबई ने यूएई को दिलाया.

ऐसे में बहुत दुख और कोफ्त होता है. गुस्सा अपने नेताओं और सरकारी बाबुओं पर आता है जो बड़े- बड़े ओहदे पाने के लिए बड़ी- बड़ी बातें करते हैं, बड़े- बड़े वादे करते हैं, ढेर सारी उपलब्धियां गिनाते हैं, कभी न पूरी होने वाली योजनाएं बनाते हैं और मासूम जनता को हसीन सपने दिखाते हैं. सही मायनों में दिल्ली के अपराधी यही लोग हैं, नहीं तो आज सचमुच मेरी दिल्ली मेरी शान होती.