रोजमर्रा सीजफायर का उल्लंघन के बीच पाकिस्तान से संबंध सुधारने की पहल कितनी खतरनाक हो सकती है. गुरदासपुर के आतंकी हमले से भारत को सीख लेनी चाहिए.

खुफिया रिपोर्टों अनुसार स्वतंत्रता दिवस से पहले लश्करे तैयबा जैसे आतंकी गिरोह हर सूरत में भारत को निशाना बनाने की ताक में हैं. इनके इस दुस्साहसी मंसूबों के पीछे पाकिस्तान की चाल और समर्थन माना जा रहा है.

अगर पाकिस्तान की नवाज सरकार अपनी सेना पर अंकुश रखने में नाकाम है तो ऐसी सरकार से की गई वार्ता और समझौतों का मूल्य क्या होगा?

एक तरफ पाक सरकार भारत और विश्व समुदाय के समक्ष शांति का राग अलापती रहती है और दूसरी तरफ वहां की सेना अपने पिट्ठू आतंकी गिरोहों के जरिए भारत को लहूलुहान करने के फिराक में लगी रहती है.

देखना है कि दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की प्रस्तावित बैठक होती है या नहीं और होती है तो इससे क्या निकलता है.

केंद्र सरकार के सूत्रों की माने तो पंजाब के गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले के बारे में पाकिस्तान को कोई जानकारी नहीं थी. हमले के घटनास्थल से मिले सबूतों के मुताबिक 17 दिन पहले इस हमले की योजना बनाई गई थी.

एक दिन पहले ही भारत की ओर से इस हमले पर करारा जवाब देने की चेतावनी दी गई थी.

भारत-पाक सीमा से 18 किमी भीतर किए गए इस हमले में 7 लोगों की मौत हुई थी. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पब्लिक बस और फिर पुलिस स्टेशन गोलियां चलाने वाले हमलावर पाकिस्तान से आए थे.

इसके तुरंत बाद ही भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि आने वाले दिनों में शीर्ष पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ होने वाली बातचीत रद्द नहीं की जाएगी.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, ‘सरकार की कूटनीतिक रणनीति के तहत पाकिस्तान से वार्ता जारी रहेगी.’

पाकिस्तान की सरकार ने भी गुरदासपुर में हुए हमले की निंदा की थी. दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की दिल्ली में आतंकवाद से निपटने को लेकर चर्चा होनी है. कुछ हफ्ते पहले दोनों देशों के पीएम ने रूस के ऊफा में मुलाकात की थी.

जरूरत है कि पाकिस्तान की ही तरह भारत भी कुटिलता दिखाये और वार्ता की मेज पर उसकी पोल खोलने के साथ आतंकी मंसूबों को निर्ममता से कुचले.

इस रणनीति की अपनी हदें हैं कि सीमापार आतंकी घुसपैठ करने के लिए जुटे रहें और हम सिर्फ इस फिराक में रहें कि कैसे उन्हें रोका जाए.

अच्छे दिन आने वाले है! हमारे प्रधानमंत्री का ये नारा शायद आम आदमी समझ नहीं पाया.
भोला है न बहुत, जल्दी सपने देखने लगता है. सोचा रातों रात अमीर हो जाएगा. महंगाई न के बराबर हो जाएगी. अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे. नौकरियां आसानी से मिल जाएगी और ऐसे न जाने कितने ही सपने ये भोला आदमी देखने लगा.
मासूम है बेचारा! नहीं जानता था कि समस्या उनकी नहीं भाजपा की खत्म हो गई. जो भाजपाई कब से केंद्र में सत्ता काबिज करने को लालालित थी आखिरकार वो सत्ता पाने में कामयाब हो गई.
प्रधानमंत्री तो भाजपा के अच्छे दिनों की आने की बात कर रहे थे बस जनता से तो केवल बुलवा रहे थे, अच्छे दिन आने वाले है. जनता जज्बाती हैं जज्बात में बह गई और कांग्रेस अपना जनाधार खो गई.
खैर और भी कई कारण है कांग्रेस के सत्ता खोने के. महंगाई, भ्रष्टाचार और न जाने क्या-क्या.
ऐसा नहीं कि भाजपा वालों ने जनता के लिए सपने नहीं देखे थे. देखे थे कि कैसे आम आदमी का बैंक में अकाउंट खुलवा दें. कम से कम आम आदमी पैसा तो जमा करना सीख जाएगा.
बैंक में चाहे उसे रोजगार मिले या न मिले, अगर किस्मत से उसने कुछ पैसा जमा भी कर दिया तो काम तो व्यापारियों के ही आएंगे.
आखिरकार अगला चुनाव भी तो लड़ना हो तब यहीं तो पूंजीपति ही काम आने वाले है न. आम आदमी तो यहीं चाहता था रोटी-कपड़ा और मकान मिल जाएं तो अपना जहान बन जाएं. जिंदगी में कुछ राहत आ जाए तो जीने की चाहत बढ जाएं.
लेकिन शायद ऐसा कुछ न हुआ. आज भी गरीब तंगी में गुजर बसर कर रहा है दो जून की रोटी के लिए लड रहा है.
काम करने वालों का वेतन बढे या न बढे,हमारे सांसदों को तो वेतन बढ़ रहा है न. याद आ जाता है वो गाना ये गाड़ी तो यू ही चलेगी, शायद हमारे नेताओं ने भी सोच ही लिया है ये इंडिया तो यू ही चलेगा जो ज्यादा सोचेगा वो हाथ मलेगा.
भाजपा हो या कांग्रेस मिलकर ऐश करेंगे. लोंगों के जज्बात यू हीं कैश करेंगे.
आम आदमी पूरा महीना काम करके सैलेरी पाता है फिर सोच में पड़ जाता है कि इस सैलेरी से कैसे मैनेज करूं. घर का बजट बच्चों की फीस, पानी-बिजली का बिल, घर का राशन और न जाने क्या-क्या बेचारा इसी सोच में आधा हो जाता है.
प्रधानमंत्री जी प्लीज आम आदमी की इस चिन्ता को साझा कीजिये. कुछ दिन तो भारत में इनके साथ गुजारिए.
आम आदमी को 2जी, 3जी, कोल घोटाला समझ नहीं आता. उसे तो अपने घर में हर महीने बजट में पड़ा घाटा समझ आता है. प्लीज उसके इस घाटे को समझ लीजिये तो शायद उसका जीवन आसान हो जाए.
आम आदमी को बड़ी-बड़ी योजनाएं नहीं, वायदे नहीं- सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया करवा दीजिये तो शायद अगले पांच साल नहीं वो आपको 50 साल कुर्सी पर आसीन रखेगा. वरना तो आप जानते है ये जो पब्लिक है सब जानती है. इसी जनता ने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया और भाजपा को ताज पहना दिया.

बच्चों स्कूल के लिए तैयार हो जाओ तुम्हारा नाश्ता तैयार है. अजी चिंता क्यों करते हो खाना नहीं तैयार है तो मैगी तो दो मिनट में बन जाएगी.

एक तरह से लगभग हर दूसरी गृहणी को मैगी ने अपना दिवाना बना दिया था. क्योंकि पारंपरिक नाश्तों का स्थान अब मैगी ले चुकी थी. हालांकि इन सबका खामियाजा हमारे शरीर को नुकसान उठाकर चुकाना पड़ रहा है.

लेकिन इन सब जुमलों के दिन अब लद गए. क्योंकि विवादों में आई मैगी नुडल्स की बिक्री पर फिलहाल पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया गया है. खाने-पीने की निर्माण प्रक्रिया पर नजर रखने वाले भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण ने मैगी नूडल्स के सभी 9 तरह के उत्पादों के आयात निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है.
ज्ञात हो कि यह प्रतिबंध विभिन्न राज्यों से आयी शिकायत और फिर इसकी जांच रिपोर्ट के बाद लगाया गया.

अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई कंपनी किसी उत्पाद की बिक्री अपने मानकों के हिसाब से कर रही है तो क्या यह सही है ?  क्या सरकार के पास इसकी जांच का कोई हिसाब-किताब नहीं रहता ?

इसी तरह बहुत सारे उत्पाद ऐसे हैं जिनमें खामियों की शिकायत आने के बाद ही सरकार हरकत में आती है. ऐसा क्यों ? क्या यह देश के नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं है ?

लेकिन चलो देर से सही पर सरकार ने इस पर सही फैसला तो लिया. सरकार के इस फैसले से उपभोक्ताओं को ही नहीं दुकानदारों को भी नुकसान नहीं होगा. क्योंकि मैगी कंपनी को अपने उत्पाद वापस लेने पडेंगे.

यह तो बात हुई सिर्फ एक उत्पाद की खामियों की. लेकिन उन सभी हानिकारक उत्पादों का जिम्मेदार कौन होगा जो आज भी सरकार की नाक के नीचे धड़ल्ले से बिक रहे हैं.

हमारे देश में बिक रहे कुछ विदेशी कोलड्रिंक्स बहुत ही हानिकारक बताए जा रहे हैं. जो लोगों के स्वास्थ्य को सीधा प्रभावित कर रहे हैं. सुनने में तो यह भी आया है कि किसान कई कोलड्रिंक्स को अपने फसल में कीटनाशकों के छिड़काव की जगह प्रयोग करते हैं. क्या वे प्रतिबंधित नहीं होने चाहिए?

बाजार में बिक रही हरी सब्जियों और अनाज में तो मिलावट की बात लाइलाज हो चुकी है. क्या यह सभी चीजें सरकार के शिकंजे से बाहर हैं?

इन सभी बाजारू चीजों को अगर दरकिनार कर दें तो साधारणतया पीने वाला पानी कितना प्रदूषित है यह बात किसी से छुपी नहीं. फिर भी लोग पीने के लिए मजबूर हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अगर सिर्फ भारत की बात की जाए तो करीब 80 फीसदी लोग दूषित पानी पीते हैं.

मोदी सरकार का आजकाल नारा है कि रेल बढ़ेगी, देश बढ़ेगा. उन्हीं ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर सबसे दूषित पानी पीने को मिलता है.

देश की किसी राजनीतिक पार्टी की सालाना बैठक हो या सरकारी सेमिनार, नेताओं और बडे-बडे नौकरशाहों के लिए पीने के लिए विसलरी की बॉटल आती हैं. आखिर वही पानी वह क्यों नहीं पीते जिसकी व्यवस्था उन्होंने आम जनता के लिए की है?

एक दिन का वाकया है मेरे घर अक्वागार्ड कंपनी का एक सेल्समैन आया. उसने कहा सर अपने घर में अक्वागार्ड लगवा लीजिए. क्योंकि सरकारी सप्लाई का पानी भी बहुत दूषित आता है. बाद में उसने मेरे घर का एक गिलास पानी लेकर मशीन से टेस्ट कर दिखाया जो कि करीब 70 फीसदी पानी दूषित निकला.

कहने का मतलब है क्या इन सबकी जिम्मेदार भी कोई प्राइवेट कंपनी है? सरकार इस पर क्यों नहीं ध्यान देती?

प्रधानमंत्री मोदी के स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा जब सभी नागरिकों को कम से कम पीने का स्वच्छ पानी मिल सकेगा.

इसके अलावा देश में अनाजों और सब्जियों में मिलावटखोरों पर तुरंत नकेल कसने की जरूरत है.

रही बात ठडे पेय पदार्थों की. जो भी सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते उनपर भी तत्काल प्रतिबंध लगना चाहिए. इससे लोग फिजूलखर्ची से तो बचेंगे ही साथ ही अपने पारंपरिक पेय पदार्थों को पुनर्जीवित करेंगे. तभी जाकर मैगी नूडल्स पर लगा प्रतिबंध कारगर साबित होगा.

हमने धर्म तो अलग कर लिए चलो आओ आज, सूरज….पानी….पेड़…प्रकृति को भी अलग कर लें. हिस्से कर दें इनके भी कुछ नाम भी रख दें जैसे धर्म के नाम रखें हैं. एक मुस्लिम सूरज एक हिंदू सूरज…कैसा लगेगा. प्रकृति के लिए भी बना दें कुछ नियम कानून हमारे कहने से हमारे धर्म के लोगों पर बरसें..सुकूंन दें. ऐसा संभव है क्या..किससे लड़ना चाहते हैं किसका विभाजन करना चाहते हैं जो कि इस सृष्टि का निर्माता है. प्रकृति का किसी भी धर्म से क्या लेना देना हो सकता है..योग किसी भी धर्म से कैसे जुड़ा हो सकता है …समझ से परे हैं.

योग पर विवाद तो सही में हैरान कर देने वाली बात है कुछ कट्टरपंथियों द्वारा ये पैदा किया गया ये विवाद सच में नादानी ही है वरना सृष्टि के अनवरत विकास क्रम में सूर्य की समान रूप से निर्विवाद भागीदारी बनी हुई है. हम इसी सृष्टि का अंश है. कोई भी धर्म इस सच से मुंह नहीं मोड़ सकता है.

धर्म का अर्थ है धारण करना…धर्म का अर्थ है सेवा या परोपकार करना. धर्म एक आचरण है जिसे हम समझे बिना विवाद करने पर आमादा रहते हैं. कुछ कट्टरपंथी लोग इसलिए सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहते क्योंकी सूर्य के साथ भगवान शब्द जुड़ा है. अगर बात ऐसी ही है तो नमाज के समय मुसलमानों के सामने दीवार होती है तो इसका मतलब क्या वह दीवार से सामने सिर झुका रहे हैं और सूर्य की किरणों में ही तो हमारी सांसें बसती है इस सत्य से हम मुंह कैसे मोड़ सकते हैं.

योग में सूर्य नमस्कार को शामिल करने पर कई मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताने के बाद तो सरकार ने योग दिवस पर आसनों की लिस्ट में सूर्य नमस्कार को नहीं रखा है लेकिन क्या ये वाकई में सही है. अब कुछ नहीं बचा तो योग का भी राजनीतिकरण शर्मनाक बात है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान कहा था कि योग जीवनशैली को बदलकर और मस्तिष्क की चेतना जगाकर हमारे जीवन में शांति पहुंचा सकता है. जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है. आपको बता दें जलवायु की वजह से भी लोगों में गुस्सा देखा जा रहा है और जिस तेजी से दुनिया में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसका एक कारण जलवायु में हो रहा बदलाव भी है. शायद इसीलिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में से 171 देशों ने योग दिवस को मान्यता दी है.

योग शब्द का अर्थ है जोड़ना वह चाहे किसी भी धर्म जाति अथवा संप्रदाय के लोग हों- योग का प्रयोग शारीरिक रूप से स्वस्थ्य और मानसिक रूप से सकारात्मक सोच विकसित करता है.

योग की क्रिया सूर्य नमस्कार क्योंकि धर्म नहीं स्वास्थ्य लाभ से जुड़ी क्रिया है, लिहाजा इसे नकारना अपने ही स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना है. हमें इस नादानी से बचना चाहिए.

भारतीय देवी-देवताओं का सम्मान विश्व स्तर पर किया जाता रहा है. यही कारण है कि लोकप्रिय चित्रकार एमएफ हुसैन की देवी-देवताओं पर बनाई गई पेंटिंग्स को लेकर काफी विवाद हुआ था.

राम गोपाल वर्मा के भगवान गणेश का अपमान करने वाले ट्वीट पर भी खूब हो-हल्ला हुआ था. अब ताजा मामला चीन से जुड़ा हुआ है.

भारत में मेड इन चाइना की गणेश जी और लक्ष्मी जी की मूर्तियां मिल जायेंगी. लेकिन चीन से आने वाली भगवान गणेश की मूर्तियों की आंखें छोटी से छोटी होती जा रही हैं.

सभी धर्म का सम्मान करना हम भारतीयों की विशेषता है. फिर हमारे धर्म का सम्मान क्यों नहीं?

रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने मेक इन इंडिया की वकालत करते हुए कहा था कि उन्हें कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के दौरान अक्सर देवी-देवताओं की मूर्तियां तोहफे में मिलती हैं, विशेष तौर पर भगवान गणेश की. एक दिन मैंने उसे पलटकर देखा तो पाया कि यह मेड इन चाइना है.

अगर देवी-देवताओं की मूर्तियां धीरे-धीरे बदलती हैं तब इस पर आश्चर्य नहीं करें. इसलिए हमें इसी दीपावली से ही तोहफों से हमारे अपने देवी देवताओं के संदर्भ में मेक इन इंडिया की शुरुआत करनी होगी.

पर्रिकर ने कहा-मैं इस बारे में गंभीरता से विचार कर रहा हूं.

चीन में बनाई जा रही गणेश की मूर्तियों की लगातार छोटी होती जा रही आंखों के पीछे छुपी गंभीरता और चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इसकी गहरी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी.

कहने को हमारा व्यापारिक रिश्ता साठ अरब डॉलर की सीमा छूने वाला है, लेकिन हकीकत में पूरा संतुलन चीन के पक्ष में झुका हुआ है. कीमत कम होने से आकर्षण होता ही है. चीनी सामानों से हमारे देश पटा पड़ा है. आखिर कब से शुरु होगा मेक इन इंडिया.

सीमा विवाद पर चीन की दागदार मंशा लगातार सामने आ रही है. चीन धमकी दे रहा है कि दक्षिण चीन सागर में पांव रखा तो खैर नहीं. जबकि भारत वहां वियतनाम के बुलावे पर उसकी जलसीमा में पेट्रोलियम की खोज में लगा है.

पेंटिंग्स और ट्वीट की तरह ही भगवान की मूर्तियों के बनाने में गलती अक्षम्य है. बाजार में किसी भी वस्तु को उतारने से पहले उसकी गुणवत्ता को देखना सरकार का काम है.

मेक इन इंडिया की वकालत अपनी जगह ठीक है किन्तु इसे भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है. रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के साथ ही देश के राजनेता और माननीयों को इसे गंभीरता से लेना चाहिये.

मेरी आप सबसे यही अपील है कि सरकार जो भी करें लेकिन हमारा प्रयास यह हो कि आने वाले दिनों में भारतीयता को बढ़ावा मिले और खासकर पूजा-अर्चना में स्वदेशी सामानों का प्रयोग किया जाये.

साथ ही सरकार को भी हमारे धर्म और आस्था का सम्मान करना चाहिए और दूसरे देशों से भारतीय देवी-देवताओं पर बनी वस्तुओं को लेकर हमारे देश में आने पर प्रतिबंध लगना चाहिये.

बात हमारे बचपन की है स्कूलों में गर्मी की छुटिटयां शुरू होते ही हम लोग मां से एक ही रट लगाए रहते थे कि नानी के यहां कब चलेंगे.

मेरी नानी का घर मेरे गांव से ज्यादा दूरी पर ना होकर बमुश्किल 25 किलोमीटर की दूरी पर है. अपने गांव से 10 किलोमीटर की दूरी तांगे से तय करने के पश्चात् तकरीबन इतनी ही दूरी ट्रेन से यात्रा करते थे.

हम लोगों का ट्रेन का सफर जहां समाप्त होता था वहां स्टेशन पर ही नाना अपनी बैलगाडी भिजवा देते थे. बैलगाडी का सफर शुरू होते ही शुरू हो जाती थी हम लोगों की पिकनिक ग्रामीण इलाके का सुनसान कच्चा रास्ता होता था.

रास्ते के दोनों ओर छायादार वृक्ष थोडी-2 दूर पर रास्ता किसी घने बगीचों के अंदर से होकर गुजरता था. बगीचे में ठंडी छांव के साथ ताजे मीठे फल भी खाने को मिलते थे. क्योंकि बगीचे इतने ज्यादा होते थे कि कोई भी अपना बगीचा बचाने भी नहीं बैठता था.

बैलगाड़ी हांकने वाला बैलगाड़ी रोककर हम लोगों को आम, जामुन, खजूर जैसे फल तोडकर खाने के लिए देता था. कहने का मतलब हम लोग भूल जाते थे कि मई, जून की तमतमाती दोपहरी में रास्ता तय कर रहे हैं. कहीं से भी गर्मी का अहसास ही नहीं होता था.

वहीं अगर उस दौर की तुलना आज से करें तो परिस्थितियों में अंतर जमीन आसमान का मिलेगा. आज ना तो वह गांव के बगीचे रहे, ना तो गांव के ताल तलैयों में पानी.

शहरों का तो पूछना ही क्या है. लम्बी चौड़ी उम्र से भी लम्बी और ना खत्म होने वाली सडकें मुंह बाए ऐसी चलती जाती हैं जिन पर छायादार वृक्ष तो क्या एक पौधा तक नजर नहीं आता.

आज देश में जितने नए हाईवे बन रहे हैं उनके किनारे कहीं भी पथिक के लिए छाया का ध्यान नहीं रखा गया है. शहरी रिहायशी इलाकों में यदा-कदा जहां कहीं भी पुराने तालाब, पोखरे आदि हैं भी, वह धीरे-2 भूमाफियाओं का शिकार होते जा रहे हैं, और वहां कालोनियां बसती जा रही हैं.

शायद इसी का नतीजा है कि आज पूरा देश ग्लोबल वार्मिंग की मार झेल रहा है. पूरे देश में वृक्षों की कटान अनवरत जारी है. वृक्षों की कटान में सरकारी अमला भी पीछे नहीं है.

पूरे देश में जारी भीषण गर्मी से मरने वालों की संख्या 1400 पार कर गयी है. केंद्र सरकार और राज्य सरकारें सिर्फ अगले चुनाव की तैयारी में लगी रहती हैं.

ठंडक के महीनों में तो रैन बसेरों का इंतजाम सरकार की ओर से किया जाता है. वहीं गर्मी के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किया जाता. कुल मिलाकर इस समय पूरे देश में गर्मी से त्राहि माम्-त्राहि माम् की स्थित बनी हुई है.

खैर सरकारों का रवैया छोडिये, लोगों को अपनी इस परेशानी का खुद ख्याल रखना होगा. केंद्र और राज्य सरकारों को क्या दोष देना, उनका लापरवाह रवैये का अपना इतिहास रहा है.

इस मौसम में सबसे ज्यादा खतरा हीट सट्रोक का होता है. यानि गर्मी के कारण तेज बुखार आ जाना. गर्मी में अधिक देर तक रहने से शरीर अपने आप को ठंडा रखने की क्षमता खो देता है.

इसलिए हमें इस मौसम में धूप में सुरक्षित चीजों के इस्तेमाल के साथ खान-पान का विशेष ध्यान रखना होगा. थोड़ी-2 देर पर पानी पीते रहना चाहिए. इस मौसम में तली-भुनी चीजों से बचना चाहिए.

इसके अलावा और बहुत सारी जरूरी बाते हैं जो हमें हमारी आने वाली पीढियों के लिए ध्यान रखना होगा. क्योंकि उसकी चिंता भी हमें ही करनी है.

पानी की अधिक बर्बादी ना करें. छोटे-2 जलाशयों में पानी एकत्र करने में मदद करें. प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल बंद करें. क्योंकि इससे भी ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढता जा रहा है.

अपने आसपास छायादार वृक्ष लगाएं. ना हो तो पास के पार्क में ही कम से कम एक पौधा लगाएं और उसे खुद ही पानी दें.

अपने घरों में ज्यादा से ज्यादा गमलों में पौधों को लगाएं जिससे हमें कम से कम अच्छी आक्सीजन तो मिलती रहे और हमें गर्मी का अहसास कम हो.

‘दो मिनट रुक सकते हैं, सिर के बल रह सकते हैं क्योंकि….’

ऐसा शायद ही हो कि आपको इसके आगे की लाइनें न याद हों. चलिए नहीं याद तो हम आपको याद दिला देते हैं, ‘दो मिनट रुक सकते हैं, सिर के बल रह सकते हैं क्योंकि.. बड़ी गजब की भूख लगी, मैगी चाहिए मुझे अभी.’

जी हां, बचपन में तो खाना खाने के बाद भी भूख लग जाती थी और वह भूख मैगी के लिए होती थी. हॉस्टल के कितने ही दिन मैगी के भरोसे गुजरे.

मुझे लगता है आज बहुत कम लोग होंगे जिन्हें मैगी पसंद न हो. शायद ही कोई घर हो जहां मैगी ने अपना जगह न बनाई हो और आज से नहीं सालों साल से लोग मैगी के लोग दीवाने रहे हैं.

कहीं न कहीं लोग बड़े ब्रांड पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि खुला सामान लेने से अच्छा है अच्छे ब्रांड का पैक्ड सामान लेने में भलाई है. हम अच्छी गुणवत्ता के लिए अच्छे पैसे भी देने को तैयार रहते हैं. यही कारण है कि ब्रांड पर आंखमूंद कर भरोसा कर लेते हैं. लेकिन मैगी की गुणवत्ता पर सवाल उठे तो खाने की और चीजें भी शक के घेरे में आ गईं.

ऐसी कितनी ही चीजें हैं जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में खुद भी खाते हैं और अपने बच्चे और परिवार को भी खिलाते हैं. हम सेहत से समझौता न करने के बदले ज्यादा पैसे देते हैं लेकिन बदले में हमें क्या मिल रहा है?

मैगी की गुणवत्ता पर यूपी में सवालिया निशान लगा. फिर तो ये सिलसिला पूरे देश में चल पड़ा. मैगी को बाय-बाय कहने का वक्त भी आ गया. लेकिन सिर्फ मैगी ही क्यों? क्या बाजार में मिल रही खाने-पीने की बाकी चीजें सुरक्षित हैं? कहीं हम ज्यादा पैसे देकर भी सेहत से समझौता तो नहीं कर रहे? ये नामी कम्पनियां हमारे साथ धोखा कर रही हैं? ऐसे ही जाने कितने सवाल हैं जो हर किसी के मन में उठ रहे हैं.

लेकिन एक सवाल यह भी है कि आज हमारी जिंदगी इन्हीं बाजार की चीजों पर निर्भर है. हम तो आंख बंद करके इन चीजों को इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं. क्योंकि हमारे पास इसके अलावा विकल्प ही क्या बचता है?

मैगी पहला मामला नहीं है. पहले भी खाने-पीने की दूसरी चीजों में हानिकारक तत्व मिलना, कभी खाने की चीजों में मिलावट, कभी कीड़े मिलना जैसी बातें सामने आती रही हैं.

मुझे समझ नहीं आता कि ये कंपनियां जब भारत में पांव पसार रही होती हैं. लोगों की जुबान पर चढ़ रही होती हैं तब इन चीजों की जांच क्यों नहीं की जाती. उस वक्त ये खाद्य सुरक्षा विभाग कहां सोया रहता है. जाने कितने वक्त से हमारे साथ ये धोखा हो रहा था? लेकिन हमारी जान इतनी सस्ती है कि कंपनियां अपना खेल, खेल रही थीं और सरकार सो रही थी.

अब मैगी का एड करने वाले सितारों पर भी केस दर्ज हो गया है उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही जा रही है. फिर तो ये कार्रवाई उन विभागों पर भी होनी चाहिए जिन्होंने अपना काम सही तरीके से नहीं किया. असली सजा के हकदार तो वही हैं.

मैगी का मामला सामने आने के बाद अब मै जब भी खाने का कोई सामान खरीद रही होती हूं तो दो मिनट रुकती हूं, सोचती हूं… फिर सामान खरीदना ही पड़ता है क्योंकि… हमारे पास विकल्प ही क्या है?

गर्मी का मौसम है तो ज़ाहिर सी बात है गर्मी होगी ही और होनी भी चाहिए क्योंकि कहा भी जाता है कि मौसम को मोटे तौर पर जाड़ा गर्मी बरसात के खानों में बांटा गया है और हर मौसम का अपना मज़ा और नुक्सान दोनों ही हैं.

गर्मी के मौसम में गर्मी की मार से यूं तो सभी बेहाल हैं क्या आम और क्या खास सभी पर गर्मी की तपिश भारी पड़ रही है.

ये दीगर बात है कि उच्च तबके को इसकी तपिश का एहसास कम होता है या यूं कहे कि कम वास्ता पड़ता है तो ग़लत ना होगा, उच्च तबके के पास एसी घर हैं एसी ऑफिस हैं और एसी कारें हैं और तमाम साधन हैं तो वो तो गर्मी से मात खाने से रहे.

अब बात करते हैं इससे नीचे के तबके के लिए जिनके लिए मौसम शायद ही कभी रूमानी होता है और कभी वो भी मौसम के मिज़ाज से कदमताल करते चहकते हों.

भीषण गर्मी हो या जाड़ा तेज़ बारिश हो या आंधी तमाम ऐसे लोग हैं जिनको काम के लिए अपनी रोजी रोटी की तलाश में घर से बाहर निकलना ज़रुरी ही नहीं बल्कि मज़बूरी भी है आखिर अपना और अपने परिवार का पेट जो पालना है.

ऐसे तमाम लोगों के लिए भीषण गर्मी और लू का प्रकोप इस साल बेहद जानलेवा साबित हो रहा है.

मेरे कहने का तात्पर्य ये नहीं है कि इस साल गर्मी और लू कोई अनूठे अंदाज़ में आई है बल्कि ये है कि इस साल मई का महीना जाते जाते ही पूरे देश से गर्मी और लू के चलते जो मौत के आंकड़े सामने आ रहे हैं वो खासे डराने वाले हैं.

सूत्रों के मुताबिक इस साल अबतक ये आंकड़ा करीब 2000 को पार कर चुका है.गर्मी का सबसे ज्यादा असर दक्षिणी राज्यों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में है.

सबसे ज्यादा मौतें भी यहीं हुईं हैं, मरने वालों में ज्यादातर मजदूर शामिल हैं. गर्मी और लू से मौत के मामले उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम पंगाल में भी सामने आए हैं.

कहीं पारा 44 तो कहीं 46 और 47 तो कहीं 48 को भी छू रहा है.डाक्टरों के मुताबिक हीटस्ट्रोक या लू लगने का अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो पीड़ित व्यक्ति की मौत हो सकती है और गर्मी और लू से मरने वाले ज्यादातर लोगों की मौत का यही कारण बताया जा रहा है.

मरने वालों में अधिकतर ग़रीब और दिहाड़ी मज़दूर हैं, जिन्हें काम की तलाश में अक्सर खुले में खडा रहना पड़ता है.

पारे का तीखापन बढ़ता ही जा रहा है और गर्मी से जूझने के तमाम उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं और मौतों का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है.

गर्मी और लू पहले भी पड़ती थी लेकिन तब मौतों की संख्या इतनी ज़्यादा नहीं होती थी तब शायद प्रकृति के साथ इतना खिलवाड़ करने की लोगों की प्रवृति नहीं थी और प्रकृति भी हमें कई आपदाओं से महफूज़ रखती थी.

लेकिन ज्यों ज्यों हम विकास की अंधी दौड़ में शामिल होते गए और वनों को साफ करने की मुहिम में अंधाधुंध जुटे हुए हैं.

नए पेड़ तो बहुत थोड़ी तादात में लग रहे हैं और शहरों से पेड़ साफ होते जा रहें हैं.

थोड़ा फ्लैशबैक में जाते हैं हम सभी ने अपने बचपन में पेड़ों के नीचे कितने खेल खेले और गर्मियों के मौसम में भी पेड़ों की छांवों में गर्मी की छुट्टियां मजे से बिताईं हैं.

तब लोगों के पेड़ों की घनी छांव से लोगों को बड़ा आसरा होता था और उसकी छांव में वो गर्मी को मात देते रहते थे.

लेकिन समय बदला और हम आधुनिक होते गए और छांव देने वाले पेड़ हमें चुभने लगे तो क्यों ना उन्हें साफ कर दिया जाए इसी सबमें लोग जुटे हैं.

अब प्रकृति के साथ खिलवाड़ करेंगे तो प्रकृति तो अपनी रौद्र रुप दिखाएगी ही, इसी का परिणाम है कि भीषण गर्मी और लू से इस साल मौतों की तादात खासी बढ़ी है.

प्रकृति मूक रहकर भी हमें कई संकेत देती है और इसको अभी भी ना समझे तो आने वाले समय में और भी बढ़ी तबाही के लिए तैयार रहना होगा.

मोदी सरकार ने तमाम वादों की फेहरिस्त में 25 मई को एक वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया.

अपनी सरकार के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने के मौके पर मथुरा में आयोजित ’जनकल्याण सभा’ में पीएम मोदी ने अपनी उपलब्धियों को गिनाने के साथ ही कांग्रेस पर जमकर हमला बोला. इसके बाद कांग्रेस का तिलमिलाना स्वाभाविक था.

हालांकि कांग्रेस ने भी मोदी सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है. दोनों सरकारों की लडाई का विषय है देश की बहुसंख्यक गरीब जनता.हालांकि यह बात अलग है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के घोटालों से ऊबकर ही जनता ने सत्ता परिवर्तन किया था.

लेकिन अब यहां देखना यह है कि जिन वादों के साथ मौजूदा सरकार सत्ता में आयी थी उस पर उसने कितना काम किया. वह भी ऐसे मौके पर जब वह अपना एक वर्ष पूरा कर चुकी है.

मोदी ने एक वर्ष पूरा होने के पश्चात जनता के नाम एक पत्र लिखा. उन्होंने लिखा कि प्रमुख फैसले लेने के समय हमेशा वंचित, गरीब, मजदूर और किसान उनकी आंखों के सामने रहते हैं.

जनधन योजना में हर परिवार का बैंक खाता और प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना एवं अटल पेंषन योजना इत्यादि. लेकिन इन साभी योजनाओं का क्या मतलब है जब देश की आधी आबादी से ज्यादा भूखे पेट ही सोते हों.

देश में कितने गरीब हैं यह विषय हमेशा से विवादों भरा रहा है. लेकिन फिर भी पिछली यूपीए सरकार ने गरीबी का जो मानक तय किया था उसके मुताबिक सामाजिक, आर्थिक व जातिगत जनगणना का काम 2011 में शुरू किया था क्योंकि इसके पूरा नहीं होने से सबसे महत्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा कानून में अडचनें आ रही थी.

देश के साढे छह सौ जिलों में से बमुश्किल अभी तक सवा सौ जिलों में ही जनगणना का काम पूरा हो पाया है. इसमें से भी गरीबी से बुरी तरह से प्रभावित यूपी और बिहार में यह काम ना के बराबर ही हरे पाया है. जिछली सरकार के कामकाज की रफ्तार का खामियाजा तो उसने पिछले लोकसभा चुनाव में ही चख लिया था.

वहीं अब अगर मौजूदा सरकार की बात करें तो हर बात पर गरीबों के नाम का दम भरने वाले मोदी ने इस कार्य को तेजी से क्यों नहीं बढाया हालांकि इसके लिए सिर्फ केंद्र सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. कयोंकि जनगणना का काम सबसे पहले राज्यों का है, केंद्र तो बाद में योजना क्रियान्वित करेगा.

दोषी इसलिए भी ठहराया जा सकता है क्योंकि मेक इन इंडिया कार्यक्रम शुरू करने के बाद मोदी ने टीम इंडिया का एलान किया था.मतलब किसी भी योजना का कार्यान्वयन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सलाह और सहयोग के साथ हो. इस सबके बावजूद भी टीम इंडिया अभी तक यह तय नहीं कर पायी है कि देश में गरीब कितने हैं.

मौजूदा समय में तो केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-2 ढपली पीटकर स्वयं का गुणगान कर रही हैं. और इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं कि मोदी की टीम इंडिया मस्त और जनता पस्त.

किसी परिवार में कितने लोग भूखे सो रहे हैं जाने बगैर मुखिया परिवार कैसे चलाएगा. मौजूदा सरकार की उपरोक्त सभी योजनाएं तभी कारगर साबित होंगी जब देश के हर गरीब के पेट में दोनों वक्त भोजन का निवाला जाएगा.

एक औरत अपने तीन बच्चों को लेकर मेट्रो में चढ़ी जिसमें दो बेटियां और एक बेटा था. इन्हें बैठने के लिए दो सीट ही मिल पाई बच्चा बड़ा परेशान था बैठने के लिए, मां ने कहा बेटा दीदी को बैठने दो, बेटा गुस्से में बोला मां तुम दोनों दीदी को अपने साथ लेकर ही क्यों आई…क्या जरूरत थी इन्हें लाने की.. मां मायूस, अब कैसे बताती बेटा तुम्हें दुनिया में लाने के चक्कर में ये दोनों आ गई.

वरना हमारा देश कितना भी विकास की ओर अग्रसर हो जाए लोग तो बेटियां पैदा करने के लिए मुझे ही दोषी ठहराएंगे. कारण वही पुराने घिसे पिट्टे बेटा बुढ़ापे में कौन साथ देगा और फिर समाज के रस्मों रिवाज का निपटारा भी तो वही करेगा. चुपके से एक बात और बता दूं बेटा पैदा करने से समाज और खुद मां भी गर्व महसूस करती है. रिश्तेदारों के बीच थोड़ी चाल और वाणी में दम आ जाता है. महसूस किया है मैंने.

सच बताऊं तो बेटा पैदा करने की उम्मीद का शहर और गांव से कोई लेना देना नहीं होता. ये बस एक सोच है एक घिसा हुआ सा टॉपिक. बहुत आर्टिकल लिखे गए…कंधे उचका के बहुत भाषण कहे गए बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता लेकिन ऐसा नहीं है हमारा समाज अभी भी इतना मार्डन नहीं हो पाया है कि इस सोच और सच के साथ चल सके. एक आईएएस…आईपीएस…डॉक्टर के बेटे की मां से पूछिए कितनी खुश होगी, बेटा वो भी इस ओहदे पर….शादी में लड़की के साथ दहेज लाने का क्राइटेरिया फिक्स है, मोल भाव में ज़रा सा भी कम में बात नहीं बनेगी ये अलग बात है कि चाहे लड़के ने पढ़ाई के दौरान कितनी बार पढ़ा हो कि दहेज लेना देना अपराध है. बेटे-बेटी में कोई अंतर नहीं लेकिन क्या फर्क पड़ता है जब बात खुद पर आती है तो समाज के साथ तो आपको चलना ही होगा. यही बेटी पैदा होती तो बाप की झुकी हुई कमर साफ नज़र आ जाती.

अगर आप बेटे के सुख से वंचित है और बेटा पैदा करके समाज में प्रतिष्ठा पाने का शौक है तो चिंता मत कीजिए इसके लिए आप दवाई भी ले सकती हैं शर्तिया बेटा पैदा होगा. ऐसे गंभीर मामलों में जरा सी भी चूक नहीं होनी चाहिए..

मेरी बातों से जरा सा भी ये निष्कर्ष नहीं निकालइएगा कि मां खुद भी ऐसा चाहती है. नहीं, समाज…आस पास के लोग…परिवार के लोग..ऐसा सोचने पर मजबूर कर देते हैं. लेकिन वक्त मिले तो आप भी जरा सोचना, एक बच्चे की मुस्कान ज्यादा प्यारी होती है या उसका बेटा या बेटी होना.

दहेज…पढ़ाई..खर्च…इज्जत…बेटी के साथ आखिर क्यों इतने भारी भरकम शब्द रख दिए जाते हैं. खैर, मैं तो बस इतना ही कहना चाहूंगी कि मैं भी दो बेटियों की मां हूं….मेरी जिंदगी की रौनक और गर्व हैं मेरी दो बेटियां, मैं खुश हूं और अपनी बेटियों को खुश रखने का सामर्थ्य रखती हूं, आपकी हेय दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा…माफ कीजिएगा.