घटना फैजाबाद की है। एक लड़की को पंचायत के निर्देश पर लगभग दो महीने दूसरे के घर जमानत के तौर पर रहना पडा। उसका कुसूर कुछ  भी नहीं था फिर भी वह लगातार बलात्कार की त्रासदी झेलती रही। दरअसल उसका भाई गांव की एक लड़की को भगा ले गया। इस बात पर पंचायत बैठी और फरमान सुना दिया गया कि जब तक भागे हुए प्रेमी-प्रेमिका घर लौट नहीं आते तब तक उक्त पे्रमी की बहन प्रेमिका के घर में जमानत के तौर पर रहेगी। इस घटना के सभी पहलुओं पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में महिलाओं की बदहाल स्थिति साफ नजर आती है। आज भी यहाॅ की महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल पाना दूर की कौड़ी हैं।

एक बड़ी जनसंख्या में महिला केवल हाड़ मांस के पुतले की तरह समझी जाती है जो चहारदीवारी के अंदर रहकर दिन भर खटराज निपटाये और रात में मर्द की शारीरिक भूख शांत करे यानि घर में उसकी उपयोगिता एक मशीन की तरह ही है। उसकी अपनी कोई इच्छाएं न हों, उसे कुछ भी चुनने, तय करने, निर्णय लेने और बोलने का भी अधिकार नहीं हैं। वह केवल घर के मर्द की सम्पत्ति है। ऐसी सम्पत्ति जिससे जुड़ी होती है घर की ‘इज्जत’। अगर महिला अपने मन से कुछ भी करना चाहे  तो घर की इज्जत पर आंच आती है। अब फैजाबाद की घटना को ही लीजिए उस लड़की को पता था कि उसे प्रेम करने की इजाजत नहीं है। फिर भी उसने लीक तोड़कर अपने प्रेम को परवान चढ़ाया लेकिन जीवन भर प्रेमी का साथ नहीं मिल पायेगा ये जान कर दोनो घर से भाग गये। दोनो घरों के सामंती मानसिकता के मर्दो के अहम को चोट लगी और पंचायत हुई पंचायत के फैसले में खामियाजा भुगता एक बेकसूर लड़की ने। घर की ‘इज्जत’ बचाने के लिए उसे दूसरे को सौंप दिया गया रौंदने के लिए।

सवाल ये उठता है कि एक लोकतांत्रिक देश में कब तक इस तरह के पंचायती फरमान चलते रहेंगे। घर की ‘इज्जत’ के नाम पर लड़कियों और महिलाओं की जान लेने की वैसे भी उत्तर प्रदेश में परम्परा रही है। इस मामले में पश्चिम उत्तर प्रदेश काफी आगे है। गैर जाति के युवक से प्रेम करने की सजा यहाॅ युवती को सरेआम कत्ल कर दी जाती है। कातिल कोई और नहीं लड़की के घर वाले ही होते है। लड़की ने कैसे अपने दिल की बात मान ली, ये उन्हें गवारा नहीं है। घर की ‘इज्जत’ पर दाग लगा देने वाली लड़की के साथ कई बार घर वाले ही सामूहिक बलात्कार करते है और फिर मौत के घाट उतार देते है। ये घटनाएं गांव के अंदर ही दफन हो जाती है। कुछ घटनाएं जरूर अखबारों की सुर्खिया बनती है लेकिन आज तक दोषियों को सजा मिलने का कोई मामला सामने नहीं आया।

पश्चिम उत्तर प्रदेश में ‘इज्जत’ के नाम पर महिलाओं को मौत देने के एक से डेढ़ दर्जन मामले हर वर्ष पुलिसिया डायरी में दर्ज होते हैं लेकिन वास्तविकता में इन घटनाओं की संख्या ज्यादा होती है। एक एनजीओ ने केवल मुजफ्फरनगर में ऐसी घटनाओं के आंकड़े इकठ्ठे किये तो वर्ष 2003 में 16, 2004 में 14, 2005 में 16, 2006 में 12, 2007 में 10 ओर 2008 में 14 घटनायें सामने आयी। हर वर्ष लगभग 18-20 लड़किया लापता हुूई। ये जीवित है या इज्जत की भेंट चढ़ गयी पता नहीं चला। औरत यानी मर्द की सम्पत्ति, वह जब चाहे इस सम्पत्ति का उपभोग करें, जैसे वह इसे रखे और मुसीबत आये तो आगे कर दे।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ

एक ‘मां’  और उसके मातृत्व की कीमत आप कितनी लगायेंगे, ये सवाल सुनने में अटपटा लगेगा लेकिन पिछले लगभग बीस दिनों से ये सवाल मेरे जेहन  मंे कौंध रहा है। इसका जवाब बताने के पहले मैं इस सवाल की कोख के बारे में आपको बताती हूँ  दरअसल पिछले दिनों हील फाउण्डेशन के द्वितीय राष्ट्रीय हेल्थ राइटर एण्ड कम्युनिकेटर कनवेंशन के दौरान मैं गोधरा के समीप स्थित दाहोद (गुजरात) की सांसद और स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा0 प्रभा ताबियाड से मिली। उनसे मिलकर और बात कर लग ही नही रहा था कि एक आदिवासी महिला के खाते  में इतनी सफलताएं दर्ज हैं और उन्हें गुमान तक नहीं। बात चली तो हम महिला होने के अनुभव बांटने लगे लेकिन उनके अनुभवों की पोटली जैसे-जैसे खुलती गयी मेरे शरीर के रोएं खड़े होते गये। अब तक मुझें यह भ्रम था कि हिन्दी पट्टी (उत्तर प्रदेश बिहार आदि) में ही स्त्री होने की सजा मिलती है लेकिन विकास की दौड़ में काफी आगे चल रहे गुजरात में भी स्त्री होने की सजा कम नहीं है। गोधरा से चालीस किलोमीटर दूर की एक घटना सुनकर मुझे कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों  ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी……….’ में घुला दर्द बहुत कम लगा। डा0 प्रभा बता रही थी और मेरी आंखों के सामने पूरी तस्वीर गड्डमड्ड हो रही थी। मात्र सत्रह बसंत देखने वाली एक आदिवासी बाला दर्द से तड़प रही थी और उसके नीचे बिछी चादर गंदगी से मैली है या खून से भीगी, यह पता लगाना मुश्किल था। उस गर्भवती महिला को तुरन्त खून चढ़ाने की जरूरत थी। जब उसके पति से खून देने को कहा गया तो उसने इनकार कर दिया। उसे डर था कि खून देने से उसे कमजोरी आ जायेगी। उसने पूछा कि क्या खून चढ़ाने से उसके बच जाने की गारन्टी है, उसे चालीस किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल तो नहीं ले जाना पड़ेगा। डा0 प्रभा ने कहा कि मैं पूरी कोशिश करूॅगी कि तुम्हारी पत्नी की जान बच जाये। फिर वह कुछ जोड़ने घटाने लगा और झटके से उठकर यह कहता हुआ जाने लगा कि अस्पताल ले जाने में पन्द्रह सौ रूपये खर्च हो जायेंगे इतने में तो दूसरी शादी कर लूंगा। ये मरती है तो मरने दो। डाक्टर ने जब उसे रोका कि इसके पेट में तुम्हारा बच्चा पल रहा है क्या तुम्हें उसकी जरा भी फिक्र नही है। मर्द ने बड़े गुरूर से कहा मैने अपना काम कर दिया बाकी इसकी किस्मत। डा0 प्रभा ने कहीं से खून की व्यवस्था कर उस महिला की जान बचाई। उनके पास ऐसी घटनाओं के इतने पन्ने हैं कि उन्हें इस ब्लाॅग में समेट पाना मुश्किल हैं लेकिन इन अनुभवों में जो दर्द और  बेबसी है उसे केवल इस पंक्ति से समझा जा सकता है कि यहाॅ के अधिकतर मर्दो के लिए उनकी बीवी एक यूज एण्ड थ्रो पेन की तरह है, उसकी तब तक उपयोगिता है जब तक उसमें स्याही है। बीवी की पूछ तब तक ही होती है जब तक वह हंसते-मुस्कराते सबकी सेवा टहल करती रहती है ओर उसके बीमार होते या बच्चा जनते समय जान जोखिम में पड़ते ही उसका मर्द पति उसे ‘थ्रो’ करने से गुरेज नहीं करता है। फिर नयी ‘पेन’ के साथ नयी जिन्दगी की शुरूआत, जिसमें थ्रिल है और मर्द होने का गर्व भी ।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ

दुनिया के लिए तो दूर, भारत या पाकिस्तान के लिए भी उनकी कोई अहमियत नहीं रह गई थी. लाखों करोड़ों लोगों की ही तरह जब वो पैदा हुए थे उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही वर्षों बाद वक़्त क्या करवट लेने वाला है.

और सचमुच समय का पहिया कुछ ऐसे अनपेक्षित अंदाज़ में घूमा कि जैसे इतिहास या वक़्त ही नहीं बल्कि पूरी ज़िंदगी ही काँप गई थी.

बहरहाल, शनिवार, 17 मार्च 2012 को दुनिया को अलविदा कहते समय इस व्यक्ति की ज़ुबान पर सारी वही कहानियाँ या घटनाएं थीं जो देश आज़ाद या विभाजन के समय थीं.

वक़्त उनके लिए जैसे थम गया था या मुड़कर फिर से उसी पड़ाव पर पहुँच गया था जब एक ही भारत हुआ करता था, यानी पाकिस्तान नहीं बना था.

मगर हक़ीक़त को कैसे झुठलाया जा सकता है. हालाँकि हक़ीक़त ये थी कि उनकी अंतिम घड़ियाँ नज़दीक आ पहुँची थीं लेकिन उनकी ज़ुबान पर यही पुकार थी कि उन्हें उसी घर की झलक दिखा दी जाए जहाँ उनका भरा पूरा ख़ानदान 1947 तक रहा करता था.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान की पैदाइश 1935 की थी. यानी 1947 में उनकी उम्र लगभग 12 साल थी जब इस अल्हड़ उम्र में उन्हें पहाड़ जैसे बोझ ने दबा लिया था.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान उर्फ़ नफ़ीस की कहानी भी लाखों करोड़ों हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों से अलग नहीं है जिन्होंने विभाजन होते देखा और ज़िंदगी भर ये दर्द उनके सीने से किसी गोह की तरह चिपटा रहा और मरते दम तक नहीं छूट सका.

क़रीब 77 वर्ष की ज़िंदगी जीने के बाद भी जब मौत नज़दीक आई तो जैसे वो टीस फिर से हरी हो गई और आख़िरी इच्छा रही कि काश, समय मुड़कर फिर से वहीं पहुँच जाए जैसाकि 1947 के उस ख़ास दिन से पहले हुआ करता था.

हालात चाहे सआदत हसन मंटो के टोबा टेक सिंह के हों, ए ट्रेन टू पाकिस्तान या पिंजर के, इस तरह की मुश्किल ज़िंदगियाँ जिसने जी हैं, दर्द, तकलीफ़ और खोने की टीस का अंदाज़ा और कोई नहीं लगा सकता.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान भी बग़ावत नगरी कहे जाने वाले मेरठ में अपने भरे पूरे परिवार के साथ रहते थे. परिवार में सबसे छोटे थे, तो ज़रा लाडले भी. परिवार के सभी सभी सदस्य ख़ासे पढ़े लिखे थे और अंग्रेज़ी सरकार के समय में ही नौकरी पेशा भी हो चुके थे.

ख़ासा बड़ा घर था इसलिए ठाठ बाट से रहने की आदत भी थी. मुश्ताक़ चूँकि किशोरावस्था में क़दम रख ही रहे थे, इसलिए दुनिया और ज़िंदगी की हक़ीक़तों से बेख़बर और ग़ाफ़िल भी थे. या यूँ कहिए कि वो उम्र नहीं थी ये सब सोचने की.

बहरहाल, अचानक बँटवारे का डंका बजा और जैसे सबकुछ बदल गया. मुश्ताक़ शहर में कहीं अपने दोस्तों के साथ अठखेलियाँ करने हुए निकले थे कि अचानक शहर में दंगे भड़क उठे और कर्फ़्यू लग गया. ऐसी अफ़रा-तफ़री मची कि जो जहाँ था, वहीं जान बचाने के लाले पड़ते दिखे.

हैवानियत का ऐसा खेल शुरू हुआ कि दोस्त दुश्मन में बदल गए, हालाँकि कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने दुश्मनी की चादर फेंककर दोस्ती का लिबास पहना तो इंसानियत ने राहत की साँस भी ली.

कुछ ऐसी ही चादरों ने मुश्ताक़ को इस दुनिया में अकेला होते हुए भी, अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. ख़ैर ऐसे माहौल में अपने घर पहुँचने का तो सवाल ही नहीं था इसलिए एक रिश्तेदार बुज़ुर्ग औरत के घर में पनाह लेना बेहतर समझा.

ये वो घर था जहाँ वो कभी-कभार सुस्ताने और बुज़ुर्ग ख़ातून का लाड-प्यार पाने की लालसा में आ जाया करते थे. इसलिए वो भी जैसे उनका दूसरा घर ही बन गया था. उन्हें क्या मालूम था कि नियति ने उनके लिए वो कुछ लिख दिया था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी की नहीं होगी.

ज़ाहिर सी बात है कि उस ज़माने में संपर्क के टेलीफ़ोन जैसे साधन तो थे नहीं, इसलिए बाज़ लोगों को तो ये भी पता नहीं चला कि वक़्त की उस बेरहम अंगड़ाई में कौन जीवित बचा या किसे दुनिया से ज़बरदस्ती रुख़सत कर दिया गया.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान के लिए उन बुज़ुर्ग़ रिश्तेदार के घर से निकलना जान जोखिम में डालना था, लेकिन कुछ हफ़्तों बाद जब हिम्मत करके निकले तो, जो हुआ उसे देखकर उनके होश उड़ गए.

मुश्ताक़ जब अपने घर से निकले थे उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था फिर कब और किस हालत में आना होगा. जब पहुँचे तो वो घर उनका नहीं बचा था. उस घर ने मुश्ताक़ से आँखें फेर ली थीं और पहचानने से इनकार कर दिया.

वो घर जहाँ मुश्ताक़ पैदा हुए, जहाँ उनके भरे पूरे ख़ानदान की आवाज़ें और ठहाके गूँजते थे, जिसने मुश्ताक़ को भी पैदा होते ही अपनी आग़ोश में जगह दी, लेकिन वक़्त ने फ़िज़ाँ में इतनी बेरहमी घोल दी थी, कि जो भी अपना था, पराया हो गया या पराया लगने लगा.

बहरहाल, उस घर में मुश्ताक़ को दाख़िल होने की इजाज़त नहीं मिली क्योंकि पूरा ख़ानदान रातों-रात खींची गई विभाजन रेखा के उस पार यानी पाकिस्तान चला गया था.

नियमों के अनुसार वो घर किसी और ख़ानदान को आबंटित कर दिया गया था और जैसा कि बाद में पता चला, मुश्ताक़ के ख़ानदान को पाकिस्तान के कराची में रिहायश मिल गई थी. लेकिन मुश्ताक़ के हिस्से में क्या आया?

ये बात और थी कि या तो मुश्ताक़ भी अपने पूरे ख़ानदान के साथ पाकिस्तान चले जाते या फिर उनका पूरा ख़ानदान यहीं रहता तो हालात कुछ और होते. ये बहस का मुद्दा नहीं है कि मुश्ताक़ का पूरा ख़ानदान पाकिस्तान जाकर अच्छा रहा या भारत में ही अच्छा रहता, मुद्दा ये है कि 12 साल का एक अपरिपक्व लड़का अगर पूरे ख़ानदान से बिछड़ जाए तो उसके दिमाग़ और दिल की कैफ़ियत समझने के लिए कुछ अलग समझदारी की ज़रूरत होगी.

अब मुश्ताक़ के सामने हिमालय से भी बड़ी चुनौती ये थी कि ज़िंदगी को कैसे जिया जाए, जिया भी जाए या नहीं. ये एक ऐसा फ़ैसला था जो किसी के लिए भी मुश्किल था. बल्कि सच कहा जाए तो ये चुनौती मुश्ताक़ के ही सामने नहीं बल्कि उन हज़ारों लोगों के सामने थी जिन्हें सदियों से बसी-बसाई ज़िंदगी को छोड़कर सीमा को लांघना पड़ा था.

12 साल के बच्चे को कौन सहारा देता, वो भी ऐसे माहौल में जहाँ ख़ुद का वजूद बनाए रखना हर किसी के लिए हर दिन की चुनौती थी. वजूद बनाए रखने की इस जद्दोजहद में मुश्ताक़ के सामने दो रास्ते थे, वैसे सच कहें तो एक ही रास्ता बचा था और वो ये कि शिक्षा को जारी रखना तो संभव ही नहीं था, इसलिए रोज़ी-रोटी चलाने के लिए जो भी काम मिला करना शुरू कर दिया.

शुरू में तो उन्हें भी यही उम्मीद थी कि एक दिन वो भी पाकिस्तान जाकर अपने ख़ानदान के साथ बस जाएंगे लेकिन वक़्त ने फिर करवट बदली और उनकी ये ख़्वाहिश पूरी ना हो सकी.

बताते थे कि वो जब भी पाकिस्तान जाते थे तो उनकी माँ तब तक दरवाज़े पर खड़ी होकर देखती रहती थीं जब तक वो उनकी आँखों से ओझल नहीं हो जाया करते थे.

और हर बार यही कसक दिल में रहती थी कि अब न जाने एक दूसरे को फिर देख सकेंगे या नहीं. जब तक माँ-बाप और भाई बहन रहे तो उन्होंने और उनके कुछ बच्चों ने ताल्लुक़ात रखे और आना जाना भी रहा, लेकिन ये सिलसिला ज़्यादा दिनों तक ना चल सका, ख़त भी आने बंद हो गए और फिर तो कभी-कभार टेलीफ़ोन से ही बात हो जाती थी, जो थोड़े समय बाद बंद हो गई.

1947 में जब मुश्ताक़ का सामना ज़िंदगी की कठोर हक़ीक़त से हुआ तो 12 साल की उम्र वैसे भी रूमानी ख़यालों में जीने की ही होती है और मुश्ताक़ हुसैन ख़ान भी उर्दू और फ़ारसी के शेर पढ़ने में दिलचस्पी रखते थे जिनमें कुछ फ़लसफ़ाना पुट भी होता था.

बाद में ये शेर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए लेकिन इसी दानिशमंदाना अंदाज़ ने उन्हें एक सच्चा और ईमानदार इंसान बनाया जिसने कभी भी लालच को अपने दिल में नहीं घुसने दिया.

हमेशा दूसरों की मदद की और ज़िंदगी भर हमेशा इस बात की ही भरसक कोशिश करते रहे कि अनजाने में भी किसी का रत्ती भर भी नुक़सान ना हो जाए. तालीम के बहुत बड़े हिमायती थे मुश्ताक़ हुसैन ख़ान.

ख़ुद तो हालात की सितमज़रीफ़ी की वजह से नहीं पढ़ सके मगर इकलौती बेटी को समाज के तमाम तानों और उलाहनों के बावजूद उच्च शिक्षा दिलाई. लेकिन मरते दम तक किसी का अहसान लेने का क़याल ही उनकी रूह को हिला देता था इसलिए बेटी-दामाद के इंग्लैंड आकर बसने के न्यौते को भी क़बूल नहीं किया.

यूँ तो बात बहुत लंबी हो जाएगी लेकिन असल बात ये है कि जब मुश्ताक़ हुसैन ख़ान की मौत की घड़ियाँ नज़दीक आईं तो वो एक बार फिर से 1947 के दिनों में वापिस चले गए लगते थे.

वो सारी वही बातें याद कर रहे थे जो 77 साल पहले पीछे छूट गई थीं. उन्हें पाकिस्तान में बसे और दुनिया छोड़ चुके सारे रिश्तेदार उसी शिद्दत से याद आए और वो घर भी जहाँ उनके सिर्फ़ 12 साल गुज़रे थे लेकिन वो 12 साल बाक़ी 65 साल से अलग थे.

ज़माना बहुत आगे बढ़ चुका है, अब तीसरी पीढ़ी परवान चढ़ चुकी है, नई उम्मीदों और मूल्यों के साथ. पुरानी पीढ़ी अपने मूल्यों के साथ भी पुरानी पड़ गई लगती है जहाँ ईमानदारी, भलमनसाहत, दूसरों का भला चाहने और करने की आदत को बेवकूफ़ी क़रार दे दिया गया है.

लेकिन मुश्ताक़ हुसैन ख़ान ने ना सिर्फ़ इन मूल्यों को कभी छोड़ा बल्कि अपनी पत्नी और औलाद को भी इन्हें ना छोड़ने की विरासत करके गए हैं.ये और बात है कि भारत पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व 65 साल पुरानी इस टीस को कभी समझ पाएगा जो मुश्ताक़ हुसैन ख़ान जैसे लाखों-करोड़ों लोगों की रही है जिनमें से ज़्यादातर तो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं और जो कुछ होंगे, वो भी ज़्यादा दिन इस दुनिया के सूरज की रौशनी नहीं देख सकेंगे.

लेकिन एक बड़ा सवाल सभी की आँखों में चमकता रहता है कि 1947 में जो कुछ हुआ क्या उससे इंसानियत का कुछ भला हुआ है. अगर वही एक मात्र समस्या का हल था तो इन 65 वर्षों में अनगिनत लोगों की जानें क्यों गई हैं और अब भी ये सिलसिला रुका नहीं है.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान जैसे बुज़ुर्गों की सूनी आँखों में आख़िरी हिचकी तक मौजूद रहे इन सवालों का जवाब किसी के पास हो तो मेहरबानी करके ज़रूर पेश कीजिएगा, बहुत मेहरबानी होगी.

महबूब ख़ान
लंदन से

कहते हैं कि सपनों की भी अपनी अलग ही दुनिया होती है. हकीकत में जिन चीज़ों को हम नहीं पा सकते सपनों में उन सबको सहजता से हासिल कर लेना नामुमकिन नहीं. यह बात भी कितनी सच है कि अगर सब कुछ असल ज़िंदगी में मिल ही जाता तो सपने भला आते ही क्यों!

मैंने भी कई तरह के सपने देखे हैं. मेरे सपने कभी मुझे लंदन- अमेरिका की सैर करा लाए तो कभी हसीनाओं के संग अठखेलियां करने के लिए समंदर किनारे भी छोड़ दिया. ये मरे सपने ही हैं जिनमें मुझे अपनी नौकरी में इतना बड़ा प्रोमोशन मिला कि मैं अपने बॉस का बॉस बन गया. सपनों की रंगीन दुनिया के सहारे ही मैं कभी लंबी सी कार में बैठकर फाइव स्टार होटल में डिनर करने गया तो कभी ठीक इसके उलट रेलवे स्टेशन के बाहर चरसियों के बीच रात गुज़ारी.

मैं दूसरों के सपनों के बारे में तो नहीं जानता पर अपने सपनों के बारे में ज़रूर कह सकता हूं कि मुझे कुछ इसी तरह के अजब-गजब सपने आते रहते हैं. शायद इसीलिए कभी व्याकुल हो जाता हूं कि कहीं मुझमें कोई ऐब तो नहीं जो इस तरह के सपने दिखाई देते हैं.

कभी- कभी सोचता हूं तो लगता है कि शायद मैं बहुत संवेदनशील हूं और जो कुछ भी गहराई से महसूस करता हूं, देखता हूं या फिर जो बातें मेरे दिल-दिमाग़ को छू जाती हैं वो सब किसी न किसी रूप में, कभी न कभी मेरे सपनों का हिस्सा बन जाती हैं.

हमारे देश में राजनीति और क्रिकेट का बहुत महत्व है. पता नहीं क्यों क्रिकेट कभी बहुत अपील नहीं किया परन्तु राजनीति और नेता मुझे अकसर झकझोरते रहते हैं.

राजनीति के प्रभाव और फैलाव का ही असर है कि कुछ दिन पहले मेरे सपने में एक नेताजी आए. उनके पास कोई सत्ता या राजनीतिक पद तो नहीं था पर राजनीति के गलियारों में उनका कद बहुत ऊंचा था. वो मंत्री तो नहीं थे पर लोगों को मंत्री बनवाने का रुतबा रखते थे.

नेताजी से मेरी मुलाकात दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई. हम दोनों को चेन्नई जाना था– मुझे दफ्तर के काम से और उन्हें भी किसी चुनावी सभा में भाग लेने के लिए. इत्तफाक की बात कि नेताजी के साथ कई टीम-टाम नहीं था और हम दोनों एयरपोर्ट पर अगल-बगल बैठकर फ्लाइट का इंतज़ार कर रहे थे. कुछ ही पलों में न जाने कैसे और क्यों हम एक दूसरे से खुल गए. बातों- बातों में नेताजी ने मेरे बारे में काफी पूछताछ कर डाली, मसलन मेरी नौकरी, तन्ख़्वाह, मेरी आकांक्षाएं, मेरा परिवार आदि. देश, समाज और राजनीति पर भी हमारी काफी बातचीत हुई. जान-पहचान और अपनापन कुछ इतना बढ़ गया कि हमने तय किया कि हम लोग चेन्नई में भी मौका निकालकर मुलाकात करेंगे.

मैं चेन्नई के एक होटल में ठहरा और वह एक सरकारी भवन में. दूसरे दिन सुबह ही नेताजी ने मुझे बुलावा लिया और कुछ ही देर में एक गाड़ी होटल के नीचे आ खड़ी हुई. सफेद रंग की रपारप टाटा सफारी, सीटों पर सफेद कवर और चारों ओर काले शीशे. कार में एक ड्राइवर, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक अर्दली. मेरा मन गदगद हो गया. इतनी शान से सड़क पर निकलूंगा यह तो मेरी कल्पना से भी परे था.

थोड़ी ही देर में मैं नेताजी के पास था. सोचा था वो सरकारी भवन में रुके हैं, सरकारी किस्म का ही होगा. पर यहां के ठाट-बाट तो मेरे होटल से कहीं अधिक थे. नेताजी एक बड़े से कमरे में कोई बैठक ले रहे थे सो मुझे एक दूसरे कमरे में आराम करने के लिए कहा गया. यह कमरा भी कम नहीं था. शानदार बेड और उसपर सफेद चादर-तकिया-तौलिया, बगल में पढ़ने की मेज़-कुर्सी और दूसरी तरफ बढ़िया सा सोफा सेट. फर्श पर साफ-सुथरा कालीन. सरकारी चमक-दमक मुझे भा गई.

करीब एक घंटे के बाद नेताजी आए और हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ. इस बार बातें राजनीति, शासन, समाज और आम आदमी से जुड़ी हुई थीं. थोड़ी ही देर में नेताजी ने कहा कि राजनीति में आओगे! एकाएक ऐसी बात सुनकर मैं सकपका गया और वह मेरी घबराहट भांप गए. बोले घबराओं नहीं मेरा हाथ तुम्हारे ऊपर रहेगा और तुमको हर जगह वीआईपी ट्रीटमेंट मिलेगा. मन तो ललचाया पर राजनीति मेरी पिछली सात पुश्तों में किसी ने नहीं की थी. उल्टे सभी लोग नेताओं का मज़ाक ही बनाते रहते हैं. तरह-तरह के सवाल मेरे मन में उठने लगे. नेताजी ने कहा घबराओँ मत और हां कर दो, ज़िंदगी संवर जाएगी और आने वाली पुश्तें भी निश्चिंत हो जाएंगी.

मैंने कहा हां तो कर दूं पर कामकाज कैसे करूंगा, मुझे तो इस विधा का दूर-दूर तक ज्ञान नहीं है. नेताजी ने कहा कि राजनिति ही तो वह विधा है जिसके लिए किसी विशेष ज्ञान, शिक्षा या योग्यता का होना ज़रूरी नहीं है. पढ़ाई की डिग्री है ही, एक सफल करियर का सपोर्ट भी है. बस तुम्हें मंत्री बनाने के लिए इतना काफी है.

वाह, सपनों में एक नेता ने मुझे मंत्री बनने का सपना दिखा दिया. अब तो मैं सचमुच सपने बुनने लगा. फिर भी मन में शंकाएं थीं. लग रहा था कि राह आसान नहीं है और अगर कहीं नैया डूबी तो राजनीति तो जाएगी ही करियर से भी हाथ धो बैठूंगा.

इसके बाद तो नेताजी ने एक लेक्चर ही पिला दिया. बोले डॉक्टर, इंजीनियर और बड़े-बड़े मैनेजरों को तुमने नेता बनते देखा होगा पर क्या कभी किसी नेता को वापस डॉक्टर, इंजीनियर या मैनजर बनते सुना है. उन्होंने कहा कि राजनिति नौकरी की तरह सुरक्षित तो नहीं है पर इसमें पैसे और शोहरत की कमी भी नहीं है. मीटिंग, कामकाज और चुनाव के कारण देशाटन करने का भरपूर मौका मिलता है. हवाई जहाज़ का खर्च, रहना-खाना, गाड़ी-बंगला तो देख ही रहे हो, ठसके में कोई कमी लग रही हो तो बताओ? और यह सब मेरे पास तब है जब मैं मंत्री तक नहीं हूं.

नेताजी ने कहा कि चुनावी सभा में लोगों का दिल जीतने के बजाय उनका ब्रेन वॉश करना ही तुम्हारा मकसद होगा. इसके लिए सच का झूठ और झूठ का सच भी कहना पड़े तो घबराना मत, ये सब तो बातें हैं—आज कह दीं, कल भूल गए. सफलता के लिए सिर्फ अपनी पार्टी और अपने काम का ही गुणगान करते रहो. साथ ही दूसरी पार्टी की बुराई और उसके नेता पर उंगली उठाने से मत चूकना, बस जीत पक्की समझो.

उन्होंने कहा कि आम आदमी बहुत मासूम होता है और उसकी भावनाएं कोमल. जहां जाओ वहां के लोगों के बारे में पहले से ही फीडबैक ले लो और मिलने पर उन्हीं की भाषा बोलो, उनकी समस्याओं के बारे में बातें करो और उनको आगे बढ़ने का सपना दिखाओ. बस जीत पक्की समझो.

रैलियों में भाग लेने से लेकर मंत्री बनने तक तुम छोटे-बड़े इतने इलाकों में घूम चुके होगे और इतने लोगों से उनकी इतनी समस्याएं सुन चुके होगे कि मंत्री बनने पर कुछ भी याद नहीं रहेगा. और मंत्री बनने के बाद इतने बड़-बड़े काम होते हैं कि गली-मोहल्लों की बातें पूरी करने का वक्त किसके पास है. मोटे-मोटे काम कर दो और उन्हें जताने में पीछे मत रहो. बस सफलता पक्की समझो.

हो सकता है कुछ लोग तुम्हें बेशर्म कहें या मौकापरस्त पर कामयाबी की कुछ तो कीमत चुकानी पड़ती है मेरे यार. उन्होंने कहा कि आखिर नौकरी में भी तो तुम कभी झूठ बोलते हो, अपने काम की तारीफ और दूसरे के काम की बुराई करते हो. इतना ही नहीं तरक्की पाने के लिए बॉस की चाटुकारिता भी करते हो. दिन-रात इसी में गुज़र जाते हैं कि नौकरी बनी रहे, बॉस खुश रहे, प्रोमोशन मिलता रहे और इन्क्रीमेंट अच्छा हो जाए.

नेता भी यह सब करते हैं. पर इसका फायदा बड़े लेवल पर होता है. रहने को बड़ा बंगला मिलता है, हवाई जहाज़ से देश-विदेश जाते हो, नौकर-चाकर, सेक्रेटरी और आगे-पीछे घूमते लोग. किसी का काम करना नहीं है, करने का आदेश दे देना है. काम हो गया तो वाह-वाही आपकी और अगर और नहीं हुआ तो विरोधियों की चाल. ऊपर से तुम्हारा हर काम समाजसेवा कहलाएगा और देशभक्त कहलाने का सम्मान जो मिलेगा वह अलग.

सत्ता बड़ी चीज़ है भैया, बस हर नेता को थोड़ा चमड़ी मोटी करनी ही पड़ती है. थोड़ी होशियारी से चलो और ज़रूरत से ज़्यादा लालच अगर न रखो तो लंबी पारी पक्की समझो.

नेताजी की बातें मुंगेरीलाल के सपनों से कम नहीं थीं और मैं इन्हें समझ भी रहा था. पर फिर भी मैने तय कर लिया कि अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ दूंगा और राजनीति के समंदर में कूद जाऊंगा. अगर मोती पाना है तो तालाब में नहीं, सागर में गोता तो लगाना ही होगा.

इतनी देर में घड़ी का अलार्म घनघना उठा. मेरी नींद खुल गई और सपना टूट गया. पलंग पर मैं अकेला पड़ा था और मेरे चारों तरफ थीं कोरी दीवारें. रात के अंधेरे में जिस नेता से मैं सपने में मिला था, दिन के उजाले में अब अपने सपनों के नेता को तलाशने की कोशिश कर रहा था.


कहते हैं मुनष्य योनि श्रेष्ठ होती है और बड़े भाग्य से इसमें जन्म मिलता है. ऐसा हो भी क्यों न–  आख़िर 84 करोड़ योनियों को पार करके हम मनुष्य रूप में धरती पर अवतरित होते हैं.

विकास कुदरत का नियम है. हर बच्चा शैशवकाल से निकल कर शनै: शनै: बड़ा होता है और विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए जीवन को अपनी तरह से बेहतर बनाने के प्रयास में जुट जाता है. एक पंक्ति  में कहा जाए तो यही जीवन का क्रम है.

कुछ ऐसा ही क्रम उस शहर का भी होता है जिसमें हमारा जन्म एक बालक के रूप में होता है, जिस शहर में हम चलना सीखते हैं, खेलते- कूदते हैं, पढ़ते-लिखते हैं और अपने जीवन को एक निश्चित दिशा देते हैं ताकि हम एक कामयाब मनुष्य बन सकें और अपने आसपास के लोगों में यश के भागीदार बन सकें.

मनुष्य और शहर का नाता अधिक समझाने की ज़रूरत नहीं है. जिस तरह एक मानव का विकास  होता है ठीक उसी तरह एक शहर का भी विकास होता है. हर शहर अपनी बाल्यावस्था से होते हुए, विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए अपना एक मुकाम बनाता है. वैसे तो हर शहर विकास की दौड़ दौड़ता है पर इनमें से कुछ इस दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं कि पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं. कुछ शहर तो इतने भाग्यशाली होते हैं कि उनके देश की पहचान भी उन्हीं से बन जाती है.

मनुष्य के विकास और शहर के विकास में थोड़ा फर्क़ भी होता. जहां मनुष्य का विकास काफी सीमा तक स्वत: होता है, शहर का विकास मानव बुद्धि और मानव शक्ति के बिना असंभव है.

मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ. पिता की आजीविका उन्हें दिल्ली शहर तो ले ही आई साथ में मुझे भी शैशवकाल से ही इसी शहर में ला पटका. शायद नियति की यही इच्छा थी. मैने कब दिल्ली शहर में होश संभाला और चलना सीखा कह नहीं सकता. इसके बाद तो मैं, और अब मेरा हो चुका दिल्ली शहर, दोनों ही विकास के क्रम में आगे बढ़ने लगे.

धीरे- धीरे मैं तो दिल्ली की भीड़ में कहीं खो गया लेकिन दिल्ली नहीं हारी और विकास को अपना हमसफर चुन जीवनपथ पर बढ़ती रही, बढ़ती रही. दिल्ली भाग्यशाली है कि भारत की सत्ता को अपने हाथ में ले चुके फिरंगी भी इसके विकास की बात निरंतर सोचते रहे. दिल्ली ही वह खुशकिस्मत शहर है जो इतिहास के हर दौर में विकास पथ पर अग्रसर रहा. शुरुआती दिनों से आज तक न जाने कितने लोगों ने दिल्ली पर शासन किया, इसके विकास को अपने कार्यक्षेत्र की एक उपलब्धि समझा और इस पर फक्र किया.

दिल्ली के विकास में भले ही मेरी भूमिका नगण्य हो फिर भी मैं कम किस्मत वाला नहीं हूं क्योंकि मैंने दिल्ली को विकास पथ पर चलते देखा है. यह बात दीगर है कि यह सब यूं ही नहीं आया और बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना भी पड़ा.

मुझे याद है दिल्ली अपने गोल-चक्करों के लिए जानी जाती थी लेकिन विकास के लिए इनकी कुर्बानी देनी पड़ी और ये रफू-चक्कर हो गए. दिल्ली जानी जाती थी अपनी चौड़ी और लंबी सड़कों के लिए. ये आज भी हैं पर अब ये सड़कें कम, भूल-भुलैया ज़्यादा हैं. दिल्ली जानी जाती थी अपने शानदार बंगलों के लिए पर अब आधुनिकिकरण का ज़माना है और इनकी जगह गगन-चुंबी इमारतें खड़ी हो गई हैं. कोई ताज्जुब नहीं आने वाले समय में दिल्लीवासी सूर्योदय और सूर्यास्त सिर्फ फिल्मों में देखा करेंगे.

दिल्ली जानी जाती थी अपने बाज़ारों के लिए. कनाट प्लेस लाटसाहबों का बाज़ार कहलाता था पर आधुनिकीकरण के युग में अब अपनी पहचान गंवा बैठा है. कुछ यही हाल यहां के प्रसिद्ध थोक बाज़ारों का भी है. वो मशहूर थे और आज भी हैं, मगर अफसोस, विकास अभी यहां से कोसों दूर है. अपने पिता की उंगली थामकर चांदनी चौक और उसकी गलियों को मैंने जिस हाल में देखा था, लगभग उसी हाल में मेरे बेटे ने मेरी उंगली थाम कर चांदनी चौक को देखा. अगर यही आलम रहा तो कोई ताज्जुब नहीं मेरा बेटा भी अपने पुत्र को ठीक वैसा ही चांदनी चौक दिखाएगा. ऐसा हुआ है यहां का विकास कि पुश्तें बीत गईं पर बदहाली वैसी की वैसी है.

दिल्ली के इन बाज़ारों में, यहां की गलियों में व्यापार तो करोड़ों का होता है पर इनकी बेहतरी के लिए क्या हुआ है यह तो सरकारी अमला ही जानता होगा. बहरहाल सच तो यह है कि इन इलाकों में आधुनिकीकीरण या विकास दिखाई तो ज़रा भी नहीं देता, फाइलों और नेताओं के भाषणों में इनका ज़िक्र अलबत्ता हुआ होगा.

खेलकूद में भी दिल्ली कभी पीछे नहीं रही. यह गौरव की बात है कि दिल्ली में एक नहीं कई-कई स्टेडियम बने हैं जहां अनेकों अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताएं और खेल आयोजन हुए हैं. सन 1982 के एशियाड खेल और अक्टूबर 2010 में संपन्न हुए कॉमनवेल्थ गेम्स किसे याद नहीं. दिल्ली के विकास का बहुत बड़ा श्रेय इन खेल आयोजनों को जाता है. यह बात दीगर है कि इन खेलों के आयोजक भी कम खिलाड़ी नहीं थे. इन्होंने दिल्ली का विकास और श्रृंगार कम, अपना और अपनों का भरपूर विकास ज़रूर किया.

पहले की दिल्ली की तुलना में आज की दिल्ली बहुत दूर आ गई है. आज यहां बड़ी-बड़ी इमारते हैं, बड़े- बड़े फ्लाईओवर हैं, बड़े-बड़े शापिंग माल हैं, चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं, सड़क के नीचे और सड़क के ऊपर दौड़ने वाली मेट्रो ट्रेन है, ढेर सारी कारें हैं, ढेर सारे दफ्तर, छोटे-बड़े उद्योग हैं, और सबको लुभाने वाली चमक-दमक भी है. पहले यह सब कुछ इतने बड़े पैमाने पर न था. एक चीज़ और जो पहले इतने बड़े पैमाने पर नहीं थी वह है अपराध. दिल्ली आगे ज़रूर बढ़ी लेकिन इसके साथ ही आधुनिक होते इस शहर में अपराध भी बढ़े. रंजिश, ईर्ष्या, संवेदनहीनता, छीना-झपटी, छुरेबाजी, चोरी-डकैती, वृद्धों का अपमान, औरतों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, बच्चों की असुरक्षा, तुनकमिजाज़ी, गुस्सा, बेसब्री, बेईमानी, झूठ-फरेब और न जाने क्या-क्या बढ़ा है दिल्ली में. आधुनिकीकरण की दौड़ में इंसानियत, प्रेम और सह्रदयता जैसी छोटी-छोटी बातें न जानें कहां छूट गई हैं.

मेरी दिल्ली विकास पथ पर है. इसके साथ-साथ मेरा भी विकास हुआ है और मैंने नए ज़माने की बहुत सी आधुनिक सुविधाओं के साथ जीना सीखा है. कभी- कभी मुझे गर्व होता है कि जिस शहर में मेरा तीन-चौथाई जीवन गुज़रा है वह दुनिया के किसी दूसरे बड़े शहर से कम नहीं. पर फिर भी अफसोस होता है कि इतना विकास और आधुनिकीकरण दिल्ली को वह मुकाम नहीं दिला पाया है जो न्यूयॉर्क ने अमेरिका को दिलाया, जो लंदन ने इंग्लैंड को दिलाया, जो टोक्यो ने जापान को दिलाया, जो शांघाई ने चीन को दिलाया, जो हांगकांग ने थाईलैंड को दिलाया, जो दुबई ने यूएई को दिलाया.

ऐसे में बहुत दुख और कोफ्त होता है. गुस्सा अपने नेताओं और सरकारी बाबुओं पर आता है जो बड़े- बड़े ओहदे पाने के लिए बड़ी- बड़ी बातें करते हैं, बड़े- बड़े वादे करते हैं, ढेर सारी उपलब्धियां गिनाते हैं, कभी न पूरी होने वाली योजनाएं बनाते हैं और मासूम जनता को हसीन सपने दिखाते हैं. सही मायनों में दिल्ली के अपराधी यही लोग हैं, नहीं तो आज सचमुच मेरी दिल्ली मेरी शान होती.

मेरे परिवार के लोग मुझसे काफी नाराज़ हैं. वजह है कि न तो मैं किसी को सिनेमा ले जा रहा हूं और न ही शॉपिंग के लिए बाज़ार.

पर इसमें नया क्या है. यह तो हर घर में होता है. नाराज़गी और समझौता तो ज़िंदगी के दो पहिए हैं जिन पर सवार होकर हम सफर करते हैं.

पर हमारे सफर में अड़चन यह है कि मैं घर में सबसे ज़्यादा बाहर घूमने और बाज़ार में खाने-पीने का शौक रखता हूं. अब मैं ही परिवार के लोगों को इसके लिए मना कर रहा हूं. यूं कहिए कि मैने अपने शौक को पिंजरे में कैद कर दिया है और इसके साथ ही परिवार के दूसरे लोगों की हसरतें और उम्मीदें भी इसी पिंजरे में कैद हो गई हैं.

घर में जब-जब बाहर जाने की बात उठती है तो हर बार मेरे मुंह से एक ही बात निकलती है कि अगर गए और बम फट गया तो?

पिछले कुछ सालों से देश के किसी न किसी शहर से बम फटने की ख़बरें लगातार आ रही हैं. बम मुंबई में फटता है, सहम जाते हैं दिल्लीवाले.

इसी महीने की शुरुआत में दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर ज़ोरदार बम फटा. इस धमाके से कोई अछूता नहीं रहा. इसकी चपेट में आए कई लोग अपनी जान गंवा बैठे और ढेरों अस्पताल में इलाज करवा रहे हैं. जो लोग दूर घरों में थे उनकी आत्मा मर गई और दिल घायल हो गए.

मैं भी शायद ऐसे ही चंद लोगों में हूं. बार-बार की आतंकी वारदातों ने मेरा दिल छलनी कर दिया है और मेरे उत्साह की हत्या. आज मेरा परिवार कहीं जाना चाहता है तो मैं उन्हें डरा देता हूं और उनके उत्साह के दमन का हर प्रयास करता हूं.

मेरे अंदर यह परिवर्तन पिछले कुछ सालों में ही आया है. इससे पहले मैं खुद को खुशनसीब समझता था कि मेरा जन्म आज़ाद भारत में हुआ है. मैं गर्व महसूस करता था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, इसका संविधान दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है और यहां नागरिकों को सम्मान का जीवन व्यतीत करने की हर तरह के अधिकार प्राप्त हैं.

लगातार हो रहे धमाकों ने मेरे विचारों की धज्जिया उड़ा कर रख दी हैं. आज मुझे दुख है कि मैं अपने ही देश में डर-डर कर जीने को मजबूर हूं.

मुझे इस बात का इल्म है कि मेरे देश में एक सक्षम सरकार है जिसके पास ताकत और पैसा दोनों हैं. देश में ज़बरदस्त कानून व्यवस्था है, प्रशासक हैं और वह सब कुछ है जो किसी भी देश के नागरिक के जीवन को सुखी और निडर बनाने के लिए काफी है. पर अफसोस सिर्फ इस बात का है कि इन सबका इस्तेमाल न तो ठीक तरह से हुआ और न ही हो रहा है. अगर ऐसा हो रहा होता तो निश्चित ही मेरा परिवार मुझसे नाराज़ न होता और हमारा जीवन का उत्साह पिंजरे में कैद न होता.

इसी व्यथित मन से मैने घर में कह दिया कि अगर कभी विदेश जाने का मौका लगा तो पासपोर्ट फाड़कर फेक दूंगा और कभी वापस नहीं आउंगा. सब सकते में आ गए क्योंकि मैं ही था जो कभी कहता था कि पड़ोसी की फूलों की सेज़ से अपने घर का टाट का बिछौनी बेहतर है. लेकिन क्या करूं अब घर का टाट ही जवाब दे रहा है और इसमें से सड़न-गलन की बू आने लगी है.

बार-बार सोचता हूं कि आखिर दूसरे देशों में ऐसा क्या है कि वहां लोग खुशियों भरी ज़िंदगी बिता रहे हैं, सबके चेहरों पर मुस्कुराहट बिखरी है और हर तरफ खुशहाली दिखलाई दे रही है. उन देशों में भी वही सरकार है, कानून है, प्रशासक और पुलिस हैं. सोचा तो लगा कि शायद उनके पास इन सबके साथ-साथ ईमानदारी और चरित्र भी है.

लगता है हमारे देश में ये दोनों ही कहीं गुम हो गए हैं. सोचता हूं बार-बार होने वाले धमाके कहीं हमारी बेईमानी और चरित्रहीनता का नतीजा तो नहीं हैं?

भारत में चल रही राजनीति की दिशा और दशा ने मुझे सबसे अधिक कष्ट दिया है.

मानता हूं हर समाज में असमाजिक तत्व होते हैं. कानून तोड़े जाते हैं, अपराध होते हैं और धमाके भी होते हैं. पर उनसे निपटने की तैयारी भी होती है और सबक देने के लिए सज़ा. हमारे देश में ही यह सब है पर इन सबके ऊपर है राजनीति.

धमकों के बाद टीवी खोलिए किसी भी न्यूज़ चैनल पर शासक दल के नेता सरकार की सतर्कता का बखान करते दिख जाएंगे, पुलिस और जांच अधिकारी उपलब्धियां गिना रहे होंगे और विपक्ष के नेता इन सबमें खामियां निकाल रहे होंगे. सच मानिये इस बीच एक धमाका और हो जाएगा.

नेताओं की राजनीति और सत्ता लोभ ने मुझ जैसे आम आदमी की ज़िंदगी को दूभर बन दिया है. मेरे जैसे न जाने कितने ही लोग हैं जो अपने ही देश और समाज में एक- दूसरे से डरते हैं, हर अजनबी से बचते हैं और किसी जानने वाले पर भी अविश्वास की भावना रखते हैं.

ऐसे समाज और देश में आज मेरा दिल रो रहा है. मेरी आतुर निगाहें उसको तलाश रही हैं जो मेरे आंसू पोंछ सके, मेरे अंदर बैठे डर को भगा सके, अपनों के प्रति मेरा विश्वास जगा सके और मेरे परिवार की मेरे लिए नाराज़गी दूर कर सके.

बहुत पुरानी कहावत है कि किसी भी चीज़ की अति बुरी होती है. ऐसा ही कुछ भ्रष्टाचार के साथ भी हुआ है. घूसखोरी, हेरा-फेरी इस कदर बढ़ गई कि दुर्बल दिखने वाले किन्तु इरादों के पक्के एक वृद्ध व्यक्ति (मैं अन्ना हज़ारे की बात कर रहा हूं) की एक पुकार पर पूरा देश एकजुट हो गया. लोग न सिर्फ सड़कों पर उतर आए बल्कि उन्होंने अपने रोष का खुलेआम जमकर इज़हार भी किया. इक्कीसवीं शती के भारत में ऐसा भी नज़ारा देखने को मिलेगा किसी ने ख्वाब में भी न सोचा होगा. लेकिन समय बदल गया है और ख्वाब हकीकत में बदल रहे हैं.

हमें अन्ना जी के जज़्बे और उनकी हिम्मत को सलाम करना चाहिए. उन्होंने देश में जागरूकता और एकता की ऐसी मिसाल रख दी कि देखने वाले देखते ही रह गए.

सच पूछिये तो भ्रष्टाचार नासूर बनकर लोगों का जीना मुश्किल कर रहा है. जो ‘कमाने’ की स्थिति में है वह निडरता से कमाए जा रहा है और जो रिश्वत दे रहा है उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं है और वह निरीह सा जी रहा है. वाकई इसे ही कलयुग कहते हैं– ‘चोर’ करे ऐश और ईमानदार करे मजूरी.

भ्रष्टाचार, घूसखोरी और हेरा-फेरी के सबसे ज़्यादा मामले सरकारी दफ्तरों में मिल जाएंगे. सरकारी काम हो, सरकारी धन हो, सरकारी कर्मचारी हों और हेरा-फेरी न हो! ऐसा हो ही नहीं सकता.

सरकारी कर्मचारी आपको रुपए की ताकत का अहसास पग-पग पर कराते रहते हैं. आपका मकान बन रहा है– नक्शा बनवाना, पास करवाना, बिजली-पानी के कनेक्शन से लेकर कई छोटे-बड़े काम हैं जो बिना ‘लेन-देन’ के संभव नहीं. गाड़ी का लाइसेंस, पासपोर्ट, रेल के सफर में टीटी से गोटी बैठाना, सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स अधिकारियों से ‘डीलिंग’, पुलिस से पाला, टेलीफोन और बिजली विभाग में काम करवाना, पुल या सड़क का निर्माण कार्य, सरकारी विभागों में टेंडर से लेकर खरीद फरोख्त (परचेज़)– न जाने कितने विभाग और कार्य हैं जहां सिर्फ दो ही चीज़ें काम आती हैं, एक पैरवी और दूसरी रिश्वत.

‘ऊपर की कमाई’ कर रहे हज़ारों-लाखों कर्मचारी भ्रष्ट हैं लेकिन आपको कितने ऐसे मिले हैं जिन्होंने इस सच्चाई को स्वीकारा. शिकायत सभी को है, लेकिन मजाल है कि किसी ने कहा हो कि उसके पास ‘ऊपर’ की भी आमदनी है. आश्चर्य है! मतलब ये कि बेईमानी भी करते जाएये और दंभ भरिये ईमानदारी का.

ऐसा नहीं है कि तमाम सरकारी विभागों और कार्यालयों में ही रुपया बोलता है. ज़रा लोगों के घरों पर भी बारीक नज़र डालिए, पता चल जाएगा रुपया दफ्तरों में ही नहीं घरों में भी बोलता है. सरकारी ज़मीन या मकान तो नियम से एक ही खरीदा जा सकता है, लेकिन प्राइवेट बिल्डरों के डिज़ाइनर फ्लैट चाहे जितने खरीदिये और चाहे जहां, कोई रोकटोक नहीं. यही वजह है कि ‘ऊपर की कमाई’ इन डिज़ाइनर घरों की खरीद में खूब खर्च होती है और यह निवेश भी साबित होती है. शायद यही वजह है कि महंगे डिज़ाइनर फ्लैटों की न ही तो मांग कम हो रही है और न ही कीमत. नतीजा ये कि ईमानदार आदमी के लिए सैलरी से रुपया बचाकर या फिर बैंक से कर्ज़ लेकर अपने लिए एक आशियाना बनाना एक सपना ही रह गया है.

‘नंबर दो की कमाई’ खर्च होती है होटलों में महंगा खाना खाने पर, महंगे और बड़ी ब्रांड के कपड़ों पर, हीरे और सोने के गहनों पर, पेट्रोल पर, हवाई यात्राओं पर, विदेश की सैर पर और बच्चों के पॉकेट मनी पर.

बेचारे रिश्वतखोर, कितना खर्च करें!

इस बात पर और भी ताज्जुब होता है कि रिश्वत लेने वाले और हेरा-फेरी करने वाले ज़्यादातर लोग पढ़े-लिखे हैं. कहते हैं शिक्षा से मूल्यों में सुधार होता है पर जो उदाहरण देखने को मिलते हैं वो एकदम इसके विपरीत हैं. वाह री शिक्षा प्रणाली– लोगों को डिग्रियां तो खूब मिलीं, पर शिक्षा धरी रह गई.

यह भी अचरज की बात है कि लगभग सभी लोग सरकारी नौकरी पाते वक्त समाज और देश सेवा का हवाला देते हैं. लेकिन बाद में क्या होता है हम सभी जानते हैं– खूब समाज और देश सेवा हो रही है.

सरकारी पुलों में 30-40 सालों में ही दरारें दिख जाती हैं, लेकिन ठेकेदारों और इंजीनियरों के घरों की दीवारें जीवन भर नहीं हिलतीं. सड़कों पर हर साल-दो साल में गड्ढे पड़ जाते हैं, लेकिन ठेकेदारों के घरों की फर्श सालों-साल चमकती रहती है. वन विभाग हर मॉनसून में लाखों रुपयों के पौधे लगवाता है जो कुछ महीनों में सूख भी जाते हैं लेकिन अधिकारियों के घरों के गमले सदा हरे-भरे रहते हैं.

इस सबमें दोष हमारी प्रणाली का भी है. अफसोस इतना है कि प्रणाली की खामियों का सबसे ज़्यादा फायदा भी वही उठा रहे हैं जिन्होंने इसे बनाया है.

वैसे तो भ्रष्टाचार, अनाचार और दुराचार सदा से ही हर देश और समाज का हिस्सा रहे हैं. कुछ पश्चिमी देशों में उन जगहों पर रिश्वत और घूस नहीं ली जाती जहां आम आदमी से जुड़े काम होते हैं. लेकिन हमारे देश में उलटा है. पब्लिक डीलिंग से जुड़े विभागों में जमकर रिश्वत चलती है क्योंकि यहीं पर कमाई की गुंजाइश सबसे ज़्यादा होती है. लोगों का काम फंसेगा तो पैसा देंगे ही. जन सुविधाओं से जुड़े विभाग ही तो ‘आमदनी’ का सबसे बढ़िया ज़रिया होते हैं, हमारे यहां के लोग इसे बखूबी जानते हैं.

भ्रष्टाचार बढ़ाने में उदारीकरण और बाज़ारवाद ने आग में घी का काम किया है. बाज़ार में एक से बढ़कर एक सामान आ गया है जिससे नई-नई ज़रूरतें भी पैदा हो गई हैं. जब ज़रूरतें पैदा हो गई हैं तो उन्हें पूरा करने के लिए पैसा पैदा करना भी ज़रूरी है. सो, प्रणाली में खामियां ढूंढी गईं और लोगों की ज़रूरतों का फायदा उठाया गया.

जब पैसा आने लगा और ज़रूरतें पूरी होने लगीं तो अरमान बढ़ने लगे. अब अरमानों पर कहां लगाम लगती है, वह तो होते ही हैं उड़ने के लिए. तो अब उड़ाने के लिए रुपया ‘कमाया’ जाने लगा.

मजमून साफ है कि बढ़ते अरमानों ने भ्रष्टाचार, हेरा-फेरी, सफेद झूठ और चरित्रहीनता को जन्म दिया है.

सच पूछिये तो सरकार की साख गिराने में सरकार से जुड़े लोग ही सिर्फ ज़िम्मेदार हैं– अब चाहे वो मंत्री हों या फिर अधिकारी. दोषी सभी हैं. कुछ अपवादों को नकारा नहीं जा सकता लेकिन हम सभी जानते हैं कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता ही है.

कहा जाता है कि देश में दो भारत बसता है. यह बात ‘आरक्षण’ में भी नज़र आई.

और कांग्रेस महासचिव एवं सांसद राहुल गांधी के लोकसभा में दिए गए बयान ने इस सच्चाई को पुख्ता कर दिया कि देश में दो भारत बसता है.

एक इंडिया और दूसरा भारत.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ये दोनों एक साथ हैं, अब मान लें एक अन्ना के साथ है. तो दूसरा समय-समय पर किसी न किसी का खिलौना बनाया जाता है.

मुझे याद आ रहा है कि पिछले साल शायद यही अगस्त माह था जब हिसार में राहुल गांधी ने कहा खा कि भारत में दो देश बसते हैं.

एक भारत गरीबों का है तो दूसरा अमीरों का. एक अनपढ़ तो दूसरा पढ़ा-लिखा है.

एक भारत के पास कुछ भी नहीं है, दूसरा धनाढ्य.

‘मेरा उद्देश्य और निशाना है, दोनों की दूरियां मिटाना’

मेरी हरसंभव कोशिश है कि एक को आर्थिक स्तर पर ऊपर उठाया जाए.

क्या बुरा लगा, जो हो-हल्ला मच गया. घर घेरने की नौबत आ गई. जमीनी हकीकत की बात तो है ही.

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ तो सभी हैं. हां. संसद की सर्वोच्चता पर किसी भी प्रकार की आंच- लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

लोकपाल विधेयक पर सधी चुप्पी तोड़ते लोकसभा में राहुल गांधी ने सही कहा. ‘इरादे कितने ही नेक क्यों न हो, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर नहीं करना चाहिए.’

राहुल ने माना कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया लंबी और परेशान करने वाली होती है लेकिन,यहां विचार कानून में बदले जाते हैं.

अच्छा सुझाव, क्यों न लोकपाल को भारतीय निर्वाचन आयोग की तरह, संसद को जवाबदेह संवैधानिक ईकाई जैसा बना दिया जाए.

मैं भी समझता हूं कि समय आ गया है कि जब हम इस विचार पर गंभीरता से मंथन करें.

हम सब जानते हैं कि भ्रष्टाचार चारों ओर है. यह हर स्तर पर मौजूद है.

गरीबों पर इसका सबसे अधिक बोझ है और हर भारतीय इससे निजात पाना चाहता है.

भ्रष्‍टाचार हटाने के लिए कोई आसान समाधान नहीं है. इसके लिए कई कानून की जरुरत होगी.

राहुल गांधी के बयान को पहले न समझते हुए टीम अन्ना हजारे घेरो का नारा दिया. बाद में कहा, ‘माउंट एवरेस्ट चढ़ने से पहले आपको छोटी चोटियों पर चढ़ना पड़ता है.’

लेकिन राहुल गांधी के बयान दूसरे भारत के लिए था. देश की 80 फीसद आबादी गांव में निवास करती है. और यह भी सत्य है कि वह अक्सर छली जाती है और छली जाती रहेगी.

वह आज भी संचार क्रांति से कोसों दूर है. हां, वह भ्रष्‍टाचार रुपी दानव से जकड़ी हुई है.

अन्ना हजारे जिस सिविल समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वह महानगरीय मध्यम वर्ग की श्रेणी में आता है. यह भी सत्य है.

राहुल गांधी ने बयान देने में जरुर देरी की. मजबूरी भी थी. मां बीमार है. आप तो दूसरे भारत पर अध्ययन काफी दिनों से कर रहे हैं.

समय रहते सोचने की जरुरत है. वरना जाग उठा युवा भारत कोई अनहोनी कर बैठेगा. राजनीति में तो भ्रष्टाचार पूरी तरह फैल ही चुका है.

समय आ गया है राजनीति समझने की. राजनीति करने की नहीं.

सिर्फ लोकपाल से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होने वाला.

…’सरकारी’ लोकपाल विधेयक पर जनलोकपाल हावी होता जा रहा है.

अन्ना हजारे का अनशन सरकार को चारों खाने चित्त कर चुका है.

हजारे और उनके देश-दुनिया के समर्थकों को भी यह संदेश देना था कि सरकार किसी की बपौती नहीं है.

लेकिन एक बात जरुर है कि अन्ना के अनशन को आज के युवा ने हल्के में लिया. बेशक, अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ा

आंदोलन नए मोड़ पर पहुंच गया है. दबाव बढ़ाने के लिए सांसदों, मंत्रियों के आवासों के सामने धरना-प्रदर्शन ने आग में घी जैसा रहा.

बहुत से लोग काम से छुट्टी लेकर अन्‍ना हजारे के अनशन में हिस्‍सा लेने के लिए पहुंचे…और कुछ टाइम पास रहे. अब अनशन स्‍थल पर

पहुंचना कम हो रहा है. रामलीला मैदान के अनशन को दैवी कोप बारिश ने भी धो डाला.

गांधी जी के जुनून को अन्‍ना के अनशन ने तो ताजा कर दिया, किन्तु वह स्थान लेने में असफल रहा. बापू के 21 दिन के अनशन की

बराबरी किसी कीमत पर कोई व्यक्ति नहीं कर सकता. वैसे भी किसी की तुलना नहीं हो सकती. वह भी महात्मा से.

देशवासियों खासकर आज के युवाओं के लिए अन्‍ना हजारे का अनशन चुनौती बनकर उभरा है. घर की चहारदिवारी से निकलकर धूप-छांव

को झेलें. अनशन के दौरान हजारों लोग बीमार हो गए. गंदगी-बीमारी फैलने के खतरे से लोग यहां जाने से बच रहे हैं.

शायद ये शहरी युवा पहली बार किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर घर से निकले हों. हाईजीन यानी बीमारी के डर से सफाई का ख़ास ध्यान रखने

वाले युवाओं को सोचना होगा कि देश की 70 फ़ीसदी आबादी इसी हाल में जी रही है और उनकी प्रतिरोधक क्षमता इन शहरियों से कहीं

ज़्यादा है.

जिन युवाओं की उम्र अभी 20 से 35 साल के बीच होगी उनके लिए ये पहला जनआंदोलन है. शायद अब वो सीखें और आगे भी

राष्ट्रहित और जनहित के मुद्दों पर चहारदिवारी से बाहर निकलें. हमें इन्हीं में से भविष्य का अन्ना ढूंढना होगा बल्कि यूँ कहें कि हर युवा

को मन से अन्ना बनना होगा.

सरकार को भी अह समझना चाहिए कि अन्ना का आंदोलन अब आगे बढ़ चुका है. भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अब सारा देश शामिल

हो चुका है. सरकार चाह कर भी इससे मुंह नहीं छिपा सकती है.

अन्ना समर्थकों में भी अन्ना के स्वास्थ को लेकर चिंता हो रही है. वह भी कोई सर्वमान्य हल की ओर देख रहे हैं.

अर्थात सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

यह सत्य है कि सरकार संवैधानिक मान्यताओं से जुड़ी है और अन्‍ना हजारे भ्रष्टाचार,जनलोकपाल के जरिए देश की आवाज बन गए हैं.

सरकार से जुड़े लोग भी अपनी कुर्सी बचाने की खातिर इस आंदोलन को समर्थन करने के लिए विवश हैं. सरकार को चाहिए कि इस आंदोलन में भूखे बैठे अन्ना हजारे के जीवन रक्षा के लिए कदम उठाए.

आने वाले लोकपाल कैसा होगा, यह तो समय बताएगा.

बेशक भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जानी चाहिये. हर भारतवासी इसका समर्थन भी करता आया है और करता रहेगा.

लोकपाल विधेयक में वे सुझाव शामिल करने चाहिये जो समाजसेवी अन्ना हजारे एवं अन्य की ओर से रखे गए हैं, लेकिन निर्वाचित प्रतिनिधि कानून बनाने से पहले समाज के उन लोगों से पूछे, जिन्हें समाज ने कभी नहीं चुना.

हां,अन्ना हजारे और उनके साथियों की ओर से लोकपाल विधेयक की कमियों के बारे में कही गयी बातें पूरी तरह से न्यायोचित भी हैं, लेकिन कानून को अपने हाथ में तो नहीं लिया जा सकता है.

16 अगस्त से सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे को अनशन पर जाने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है. महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता और व्यापारी हेमंत पाटिल की याचिका में कहा गया है कि उनकी ‘मांगें असंवैधानिक हैं और विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है.

अपनी असंवैधानिक मांगों को मानने के लिए हड़ताल पर जाने की धमकी देना और इस बारे में घोषणा करना विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप के समान है.

भारत में लोकतंत्र सर्वोच्च है.विश्व में इस लोकतंत्र की दाद दी जाती है. लोकपाल विधेयक के बहाने लोकतंत्र व संसद को चुनौती देना असंवैधानिक है. हमें अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों पर विश्‍वास क्यों नहीं है. यदि विश्‍वास नहीं है तो हमने उन्हें चुना ही क्यों? हजारे की यह जिद उचित नहीं कही जा सकती.

भारत में लोकपाल की स्थापना सम्बन्धी विधेयक की शुरुआत 1966 से हुई है. यह बिल लोकसभा में आठ बार पेश किया जा चुका है किन्तु अभी तक यह पारित नहीं हो सका. इसीलिए 72 वर्षीय गाँधीवादी नेता अन्ना हजारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा.

अब एक सर्वे में केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के संसदीय निर्वाचन क्षेत्र चांदनी चौक के 85 फीसद मतदाता हजारे पक्ष के जनलोकपाल विधेयक के पक्ष में हैं और 82 फीसद मतदाता चाहते हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए. इसी तरह नागपुर, वर्धा और अमरावती में भी किया गया जहां क्रमश: 81, 95, 95.04 फीसद लोग अन्ना के जनलोकपाल के पक्ष में हैं.

क्या यह सर्वे लोकतंत्र प्रणाली में न्यायोचित है. लोकपाल के मुद्दे पर अपने आंदोलन को तेज करने के लिए हज़ारे ने 22 सदस्यीय कोर समिति का भी गठन कर दिया है.

अन्ना और सिविल सोसायटी के लोगों को यह समझना होगा कि हम देश में समानान्तर सरकार नहीं चला सकते. लोकपाल का मुद्दा तो ठीक है पर अगर उसे ही सभी अधिकार दे दिए गए तो भला सरकार का देश में क्या काम.

अब सवाल उठता है कि विपक्ष को विश्वास में लिए बगैर बालू पर मीनार कैसे बन पाएगी. अच्छा होता कि इस समिति में विपक्ष की भी भागीदारी रहती तो वह गिरफ्त में रहता और अनाप-शनाप बयानबाजी से बचता. संवैधानिक तौर पर देखें तो सरकार का दाहिना हाथ विपक्ष ही होता है. लेकिन विपक्ष को पूरे मुद्दे से अलग करके क्या लोकपाल विधेयक लागू हो पाएगा? अगर नहीं तो विपक्ष को शामिल करने से क्यों कतरा रही है सरकार. इतना ही नहीं, अन्ना और उनकी टीम भी विपक्ष की भूमिका की मांग से दूर क्यों है?

अब ऐसा लगने लगा है कि जनलोकपाल विधेयक भी महिला आरक्षण विधेयक की राह पर जा रहा है.

अन्ना ने लोकपाल के मुद्दे पर जन सर्वेक्षण का रास्ता चुना है. क्या इसी तरह से देश में क्रांति लाना चाहती है उनकी टीम. इतिहास गवाह है कि क्रांति के लिए लाखों लोगों ने खून की आहुति दे दी. लेकिन भारत वर्ष में भले ही लोग लोकपाल के बारे में बात कर रहे हों, लेकिन एक भी व्यक्ति सड़क पर नहीं उतरा है. और इस पर जन सर्वेक्षण कराना तो मानो चुनाव आयोग को चुनौती देना है क्योंकि वोटिंग से मामला यह करना उसी का कार्यक्षेत्र है.

देखना दिलचस्प होगा कि अन्ना अपने मिशन में कितना कामयाब हो पाते हैं और सरकार उनको पटकनी देकर अपनी तरह का लोकपाल विधेयक कब तक ला पाती है?