लीजिए चुनावी पिच तैयार हो चुकी है खिलाड़ी मैदान में उतर गए हैं बैट, पैड और विकेट सब तैयार बस इंतजार है तो अंपायर रुपी निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव तारीखों के ऐलान का..

जी हाँ चुनावी तिथि लेकिन ये भी औपचारिकता मात्र ही प्रतीत होती है क्योंकि मैच तो शायद कब का शुरु हो चुका है. जिस तरह से बिहार में रैलियों का दौर चल रहा है, नेताओं द्वारा एक-दूसरे पर शब्दों के तीखे बाण चलाए जा रहे है, नये-नये नारे सुनने को मिल रहे है इससे लगता नहीं कि चुनावी तिथि का एलान होना अभी बाकी है.

हाँ ये बात अलग है कि चुनाव तारीखों से पहले इस समय इन रैलियों में जो पैसा बहाया जा रहा है उस खर्च का आंकलन करने वाला कोई नहीं है. तो मेरा सुझाव है कि इलेक्शन कमीशन को शीघ्र ही चुनावी तिथियों की घोषणा कर देनी चाहिए जिससे कि इन रैलियों में होने वाले खर्च का हिसाब हो सकें.

31 अगस्त को पटना में जिस तरह से महागठबंधन ने स्वाभिमान रैली कर अपनी एकजुटता, धन एवं जनशक्ति का प्रदर्शन किया उससे साफ जाहिर होता है कि राजनैतिक दल चुनावी तिथियों की घोषणा होने से पहले ही व्यापक प्रचार-प्रसार कर लेना चाहते है ताकि निर्वाचन आयोग को दिए जाने वाले किसी भी तरह के हिसाब-किताब से बचा जा सके.

और तो और इस समय ये नेता रुपी खिलाड़ी एक-दूसरे को जितने मर्जी बाउंसर मारें कोई पुछने वाला नहीं चाहे लालू जी प्रधानमंत्री पर राम और गंगा को धोखा देने का आरोप लगाए या मोदी जी बिहार के डीएनए के बारे में बोले. नेता भी सोचते होंगे मुआ ये इलेक्शन जो न कराए सो थोड़ा है.

खैर पता नहीं इन नेताओं से देश को अभी और क्या-क्या सुनने को मिलने वाला है जरा चुनाव की तारीख तो तय हो जाने दीजिए फिर देखिए और कितने और कैसे चलते हैं आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर.

जैसे जैसे चुनावी पारा चढ़ेगा त्यों-त्यों नेताओं के तल्ख़ होते तेवर दिखेंगे. निर्वाचन आयोग की भी सख्ती देखने को मिलेगी.

इस बीच जनता भी टकटकी लगाए ये सारा खेल देख रही है मन ही मन सोच रही ये नेता जितनी मर्जी चिल्ल-पो करें अंतिम फैसला तो उसे ही करना है.

क्योंकि यही अधिकार तो लोकतंत्र ने उसे दे रखा है ये दीगर बात है कि चुनाव बाद उनके चुने नेताओं से मिलने में उन्हें नाकों चने चबाने पड़ते हैं खैर फिलहाल तो तेल देखिए और तेल की धार….

जकल जहां चार यार मिलते हैं तो प्याज पर आंसू बहाने लगते हैं. महिलाओं का तो बुरा हाल है.

एक तरफ दाल खाने से बाहर हो गई थी तो दूसरी तरफ प्याज का साथ भी हाथ से छूटता जा रहा है. गरीबों का खाना कहे जाने वाले प्याज और दाल के दाम आसमान पर है. रसोई से मानो प्याज गायब हो गया है. महंगाई से जनता परेशान है.

देश की सवा सौ करोड़ जनता अच्छे दिन के इंतजार में रोज-रोज नई-नई बुरी खबरें सुनने को मिल रही हैं.

देश के कई हिस्सों में प्याज की कीमत 80 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है. इससे लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती नजर आ रही है. तेजी से बढ़ते प्याज के दामों की वजह से यह लोगों की पहुंच से दूर हो गया है.

कब आएंगे ‘अच्छे दिन’. महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है.

दिल्ली वाले प्याज के आंसू रोने को मजबूर हैं. शीला सरकार को कोस कर आम आदमी पार्टी की सरकार बनी. प्याज की बढ़ती कीमतों के बाद केजरीवाल सरकार 40 रुपये किलो प्याज बेच रही है. सत्ता में आने के बावजूद प्याज पर नई सरकार पुरानी नीति पर ही चल रही है.

बताते हैं कि महाराष्ट्र के नासिक से प्याज की आवक काफी घट गई है. बाजार में प्याज की कमी की वजह से जमाखोरों की चांदी हो गई है और वे इसका मनमाना दाम वसूल रहे हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि पिछले दिनों हुई बारिश और कम आवक के कारण आने वाले कुछ दिनों में प्याज की कीमतें 80 से 90 रुपए प्रति किलो पर पहुंच सकती हैं.

50-80 रुपए किलो प्याज की मार से रो रहे भारतीयों के लिए खुशी की खबर भी है, क्योंकि अफगानिस्तान और मिस्र का प्याज मंडियों में आना शुरू हो गया है. क्या अफगानी प्याज रो रही जनता के आंसू पोंछने में सफल हो पायेगी?

अटारी बार्डर के रास्ते अफगानिस्तान के प्याज की आमद शुरू हो गई है. हर रोज एक से दो ट्रक अफगानी प्याज आना शुरू हो गया है. पाकिस्तान ने तो पहले ही भारत को प्याज का निर्यात व आयात बंदकर रखा है.

तुअर दाल थोक भाव भी 135 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गए हैं. फुटकर बाजार में यह 150 रुपए के करीब बिक रही है. अन्य दालों के दाम भी कम नहीं है और यह भी आम आदमी के बजट से बाहर है.

विपक्ष ने भी महंगाई को लेकर ढिढ़ोरा पीटना शुरु कर दिया है. राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद कहते हैं कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा, एक पैसा मिला नहीं, दाल-प्याज सब महंगा हो गया है.

प्याज की कीमतों का यह संकट हमारे सामने कोई पहली बार नहीं आया है. इसके कारण सरकार तक बदल गई है.

इसके बारे में केंद्र और राज्य सरकार को गंभीरता से सोचने और इस संकट से उबरने की जरुरत है. नहीं तो आमजन माफ नहीं करेगा. सरकार को इस बारे में कड़े कदम उठाना चाहिए. जो कालाबाजारी व जमाखोर हैं उन पर कार्रवाई होनी चाहिये.

बीते 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाए इसका प्रस्ताव मौजूदा मोदी सरकार ने कुछ महीने पहले संयुक्त राष्ट्र में रखा था. इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था ने इसे सर्वसम्मति से पारित भी कर दिया था. इसे यमन को छोडकर दुनिया के 192 देशों ने मनाया.

भारत के इस प्रस्ताव के संयुक्त राष्ट्र में 47 मुस्लिम देश समर्थन के साथ सह प्रायोजक भी बने. अगर सभी देशों की बात की जाय जिसमें से 177 देश सह प्रायोजक बने. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी योग के प्रति जागरुकता की बात कही जा रही है.

पाकिस्तान में कई जगहों पर लोग योग करते देखे गए. पाकिस्तान में एक व्यक्ति ने तो यहां तक दावा किया है कि आयुर्वेद के जनक पतंजलि पाकिस्तान के रहने वाले थे.

वहीं अब अगर सिर्फ भारत की बात की जाए तो दुनिया को योग सिखाने चले गुरू देश को अपने ही देश में विरोध झेलना पड़ा.

दारुल उलूम के कुछ उलेमाओं ने योग को शरीयत के खिलाफ माना है. दारुल उलूम के मोहतरिफ मौलाना अबुल कासिम नोमानी बरारसी ने इसे शरीयत के खिलाफ बताया. इन उलेमा के मुताबिक इससे देवी. देवताओं का नाम आता है और मंत्रों का जाप होता है इसलिए इस्लाम में इसे हराम माना जाता है.

वहीं अगर सत्तापक्ष की बात की जाए तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इसे किसी धर्म, सम्प्रदाय से जोड़ना गलत है. उन्होंने कहा इसपर एक बुकलेट भी जारी की गयी जिसे पढ़कर लोग गलतफहमी दूर कर सकते हैं.

अब अगर पूरे शीर्षक के आशय की बात करें तो यह है कि आखिर देश के ये उलेमा इसका इतना कड़ाई से विरोध क्यों कर रहे हैं? ये उलेमा इसके खिलाफ फतवे की बात कर रहे हैं. जबकि दुनिया के 47 मुस्लिम देश इसका समर्थन कर रहे हैं.

अब अगर फतवों की बात की जाए तो ऐसे-ऐसे फतवे जारी किए गए हैं जिनपर मुस्लिम समुदाय भी अवाक रह जाता है. अब फतवों की डिटेल में हम नहीं जाना चाहते क्योंकि उन फतवों को मुस्लिम समुदाय ने भी कभी नहीं स्वीकारा.

दारुल उलूम के उलेमा के योग के खिलाफ जारी फतवे पर केंद्रीय राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा ऐसे फतवे बाजार में बिकते हैं जो चाहे खरीद ले. उन्होंने कहा जो लोग योग का विरोध करते हैं वे मानसिक अपंग हैं जिसका इलाज भी योग ही है. नकवी ने कहा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के बजाय क्या रोग दिवस मनाया जाना चाहिए.

इन उलेमा को अगर योग से ही परहेज है राष्ट्रीयता से नहीं तो जब कश्मीर में अलगाववादी पाकिस्तानी झंडे लहराते हैं तो उस पर कोई फतवा क्यों नहीं जारी किया.

अब अगर धर्मों पर जाते हैं तो जिन धर्मों को मानने की बात हम सभी करते हैं उनके अनुयायियों ने हमेशा यही माना है कि ईश्वर एक है. अब अगर ईश्वर एक है तो उसकी आराधना, पूजा, नमाज, अरदास की पद्धति अलग-अलग हो सकती है लेकिन किसी पद्धति को करना हराम नहीं माना जाना चाहिए. क्योंकि सभी किसी ना किसी रूप में उसी एक मालिक को ही याद करते हैं.

मालूम हो कि यह वही देश है जहां रसखान पैदा हुए. ज्ञात हो कि कवि रसखान मुस्लिम समुदाय से थे लेकिन उनकी कृष्ण भक्ति को कौन नहीं जानता? आज भी पूरे देश में लोग रसखान की भक्ति को नहीं भूले हैं.

वैसे भी योग एक शारीरिक प्रक्रिया है कोई जरूरी नहीं है कि उसके साथ मंत्रों का उच्चारण किया जाए.

पीएम मोदी ने शपथ लेते ही सबका साथ, सबका विकास की बात की थी. ऐसे में किसी विशेष समुदाय को योग के माध्यम से सबके साथ चलने से कौन रोक सकता है. शरीर में जब कोई रोग आता है तो वह धर्म, सम्प्रदाय पूछकर नहीं आता. क्योंकि सभी के शरीर को उस मालिक ने हांड-मांस से एक जैसा ही बनाया है. योग के अपने साइंटिफिक फायदे भी हैं. योग से व्यक्ति दवाइयों से दूर रहता है. इसे किसी एक धर्म से जोड़ना गलत है.

सुबह अगर सैर के लिए निकलेंगे तो सभी धर्मों के लोग मिलेंगे. जिनमें से बहुत से लोग योग करते नजर आएंगे. इन सभी को किसी फतवे से बांधना सही नहीं है. विश्व के जिन 47 देशों ने योग दिवस को मनाने और सह प्रायोजक बनने की बात की है क्या वे शरीयत का पालन नहीं करते?

ऐसा नहीं है. उन्हें शायद इसके फायदे का अहसास हो चुका है तो फिर ये कुछ उलेमा शरीयत के किन नियमों की बात कर रहे हैं जिसके बारे में 47 मुस्लिम देशों को जानकारी नहीं है.

कुछ वो रहे खिंचे खिंचे

कुछ हम रहें तने तने

इसी कशमकश में मानसून सत्र धुल गया.

जी हां कुछ ऐसा ही हुआ मानसून सत्र का हाल विपक्ष और सरकार दोनों अपनी जिद पर अड़े रहे.

विपक्ष लगातार शिवराज सिंह चौहान, वंसुधरा राजे और सुषमा स्वराज के इस्तीफे की मांग को लेकर अड़ा रहा तो उधर सरकार ने भी विपक्ष को दो टूक कह दिया कोई इस्तीफा नहीं सिर्फ चर्चा.

कांग्रेस भी कहां कम थी साफ कर दिया इस्तीफा नहीं तो चर्चा नहीं.

संसद में नारेबाजी, हंगामा और परस्पर पक्ष और विपक्ष का एक दूसरे पर तीखे प्रहार करना क्या यहीं हमारे सांसदों का एकमात्र कार्य रह गया है.

जिस जनता के खून पसीने की कमाई से ये संसद चलती है उसे जनता के हितों से कोई लेना देना नहीं सिर्फ हंगामा और  हंगामा..

चुनाव के समय इस भोली भाली जनता से कितने वायदे किए थे आपके हित में ये बिल पास कर देंगे वो बिल पास कर देंगे पब्लिक अब पूछ रही है क्या हुआ तेरा वादा..

कॉमन आदमी देख रहा था कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल कैसे इस्तीफे की अपनी मांग को लेकर एक जिद्दी बच्चें की तरह अडे थे। जनता के मुद्दों से उन्हें कोई लेना देना नहीं था बस अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में मशगूल थे.

यहीं अगर इन सांसदों की वेतन वृर्द्धि का मसला होता तो देखते कांग्रेस के सहयोग से ऐसे झटपट सब कुछ पास हो जाता कोई शोर शराबा नहीं होता.

ऐसा कहा जा रहा है कि आजादी के बाद से ये संसद का सबसे खराब मानसून सत्र रहा, करोड़ों खर्च हो गए लोकसभा के मानसून सत्र में लेकिन सिर्फ 16 बैठकें हुईं वो भी अवरोध के चलते सिर्फ कुछ घंटों में खत्म हो गई.

किसी प्रकार को कोई ठोस बिल न पास हो सका. सरकार अब जीएसटी विधेयक पारित कराने के लिए अलग से संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है.

यही हाल राज्यसभा का भी रहा यहां तो मात्र 11 घंटे ही काम हूआ, सारा समय ललित मोदी मामला, व्यापम घोटाला और वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के हंगामे की बलि चढ़ गया.

हंगामे के चलते सत्र के अंत में दिया जाने वाला सभापति का पारंपरिक संबोधन तक नहीं हो सका.

धन्य हो ललित मोदी विदेश में बैठे बैठे यहां हंगामा बरपाए हुए हो फिजूल की पब्लिसिटी बटोर रहे हो पहले बीसीसीआई ने चमकाए रखा अब हमारे सांसद चमकाए हुए है.

आपकी बदौलत संसद में हंगामा नये नये नारे सुनने को मिले सारे का सारा मानसून सत्र चीखने चिल्लाने में बीत गया.

वाह रे मेरे सांसद जो एक दूसरे पर यह आरोप लगा रहे थे कि यदि आपने अपने कार्यकाल में कुछ गलत किया तो क्या हमें गलत करने का हक नहीं है.

अगर आपने अपने समय में अपराधियों को भागने दिया तो क्या हमें उनकी सहायता करने का भी हक नहीं है.

ये तो कोई बात नहीं हूई इतना तो हक हमारा भी बनता है, देश का प्रत्येक नागरिक संसद का ये हंगामा टकटकी लगाए देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था कि आने दो मेरी बारी यानि चुनाव फिर लूंगा हिसाब कि कैसे शोर शराबे में मेरे मेहनत की खून पसीने की कमाई आपने हंगामें की भेंट चढ़ा दिए.

मांगने आओगे ना वोट तब शोले का गब्बर बनकर मैं भी पूछूंगा क्या सोचा था पब्लिक शाबासी देगी.

इति सिद्धम मानसून सत्र..

रोजमर्रा सीजफायर का उल्लंघन के बीच पाकिस्तान से संबंध सुधारने की पहल कितनी खतरनाक हो सकती है. गुरदासपुर के आतंकी हमले से भारत को सीख लेनी चाहिए.

खुफिया रिपोर्टों अनुसार स्वतंत्रता दिवस से पहले लश्करे तैयबा जैसे आतंकी गिरोह हर सूरत में भारत को निशाना बनाने की ताक में हैं. इनके इस दुस्साहसी मंसूबों के पीछे पाकिस्तान की चाल और समर्थन माना जा रहा है.

अगर पाकिस्तान की नवाज सरकार अपनी सेना पर अंकुश रखने में नाकाम है तो ऐसी सरकार से की गई वार्ता और समझौतों का मूल्य क्या होगा?

एक तरफ पाक सरकार भारत और विश्व समुदाय के समक्ष शांति का राग अलापती रहती है और दूसरी तरफ वहां की सेना अपने पिट्ठू आतंकी गिरोहों के जरिए भारत को लहूलुहान करने के फिराक में लगी रहती है.

देखना है कि दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की प्रस्तावित बैठक होती है या नहीं और होती है तो इससे क्या निकलता है.

केंद्र सरकार के सूत्रों की माने तो पंजाब के गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले के बारे में पाकिस्तान को कोई जानकारी नहीं थी. हमले के घटनास्थल से मिले सबूतों के मुताबिक 17 दिन पहले इस हमले की योजना बनाई गई थी.

एक दिन पहले ही भारत की ओर से इस हमले पर करारा जवाब देने की चेतावनी दी गई थी.

भारत-पाक सीमा से 18 किमी भीतर किए गए इस हमले में 7 लोगों की मौत हुई थी. गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि पब्लिक बस और फिर पुलिस स्टेशन गोलियां चलाने वाले हमलावर पाकिस्तान से आए थे.

इसके तुरंत बाद ही भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि आने वाले दिनों में शीर्ष पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ होने वाली बातचीत रद्द नहीं की जाएगी.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, ‘सरकार की कूटनीतिक रणनीति के तहत पाकिस्तान से वार्ता जारी रहेगी.’

पाकिस्तान की सरकार ने भी गुरदासपुर में हुए हमले की निंदा की थी. दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की दिल्ली में आतंकवाद से निपटने को लेकर चर्चा होनी है. कुछ हफ्ते पहले दोनों देशों के पीएम ने रूस के ऊफा में मुलाकात की थी.

जरूरत है कि पाकिस्तान की ही तरह भारत भी कुटिलता दिखाये और वार्ता की मेज पर उसकी पोल खोलने के साथ आतंकी मंसूबों को निर्ममता से कुचले.

इस रणनीति की अपनी हदें हैं कि सीमापार आतंकी घुसपैठ करने के लिए जुटे रहें और हम सिर्फ इस फिराक में रहें कि कैसे उन्हें रोका जाए.

अच्छे दिन आने वाले है! हमारे प्रधानमंत्री का ये नारा शायद आम आदमी समझ नहीं पाया.
भोला है न बहुत, जल्दी सपने देखने लगता है. सोचा रातों रात अमीर हो जाएगा. महंगाई न के बराबर हो जाएगी. अच्छे पकवान खाने को मिलेंगे. नौकरियां आसानी से मिल जाएगी और ऐसे न जाने कितने ही सपने ये भोला आदमी देखने लगा.
मासूम है बेचारा! नहीं जानता था कि समस्या उनकी नहीं भाजपा की खत्म हो गई. जो भाजपाई कब से केंद्र में सत्ता काबिज करने को लालालित थी आखिरकार वो सत्ता पाने में कामयाब हो गई.
प्रधानमंत्री तो भाजपा के अच्छे दिनों की आने की बात कर रहे थे बस जनता से तो केवल बुलवा रहे थे, अच्छे दिन आने वाले है. जनता जज्बाती हैं जज्बात में बह गई और कांग्रेस अपना जनाधार खो गई.
खैर और भी कई कारण है कांग्रेस के सत्ता खोने के. महंगाई, भ्रष्टाचार और न जाने क्या-क्या.
ऐसा नहीं कि भाजपा वालों ने जनता के लिए सपने नहीं देखे थे. देखे थे कि कैसे आम आदमी का बैंक में अकाउंट खुलवा दें. कम से कम आम आदमी पैसा तो जमा करना सीख जाएगा.
बैंक में चाहे उसे रोजगार मिले या न मिले, अगर किस्मत से उसने कुछ पैसा जमा भी कर दिया तो काम तो व्यापारियों के ही आएंगे.
आखिरकार अगला चुनाव भी तो लड़ना हो तब यहीं तो पूंजीपति ही काम आने वाले है न. आम आदमी तो यहीं चाहता था रोटी-कपड़ा और मकान मिल जाएं तो अपना जहान बन जाएं. जिंदगी में कुछ राहत आ जाए तो जीने की चाहत बढ जाएं.
लेकिन शायद ऐसा कुछ न हुआ. आज भी गरीब तंगी में गुजर बसर कर रहा है दो जून की रोटी के लिए लड रहा है.
काम करने वालों का वेतन बढे या न बढे,हमारे सांसदों को तो वेतन बढ़ रहा है न. याद आ जाता है वो गाना ये गाड़ी तो यू ही चलेगी, शायद हमारे नेताओं ने भी सोच ही लिया है ये इंडिया तो यू ही चलेगा जो ज्यादा सोचेगा वो हाथ मलेगा.
भाजपा हो या कांग्रेस मिलकर ऐश करेंगे. लोंगों के जज्बात यू हीं कैश करेंगे.
आम आदमी पूरा महीना काम करके सैलेरी पाता है फिर सोच में पड़ जाता है कि इस सैलेरी से कैसे मैनेज करूं. घर का बजट बच्चों की फीस, पानी-बिजली का बिल, घर का राशन और न जाने क्या-क्या बेचारा इसी सोच में आधा हो जाता है.
प्रधानमंत्री जी प्लीज आम आदमी की इस चिन्ता को साझा कीजिये. कुछ दिन तो भारत में इनके साथ गुजारिए.
आम आदमी को 2जी, 3जी, कोल घोटाला समझ नहीं आता. उसे तो अपने घर में हर महीने बजट में पड़ा घाटा समझ आता है. प्लीज उसके इस घाटे को समझ लीजिये तो शायद उसका जीवन आसान हो जाए.
आम आदमी को बड़ी-बड़ी योजनाएं नहीं, वायदे नहीं- सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान मुहैया करवा दीजिये तो शायद अगले पांच साल नहीं वो आपको 50 साल कुर्सी पर आसीन रखेगा. वरना तो आप जानते है ये जो पब्लिक है सब जानती है. इसी जनता ने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया और भाजपा को ताज पहना दिया.

बच्चों स्कूल के लिए तैयार हो जाओ तुम्हारा नाश्ता तैयार है. अजी चिंता क्यों करते हो खाना नहीं तैयार है तो मैगी तो दो मिनट में बन जाएगी.

एक तरह से लगभग हर दूसरी गृहणी को मैगी ने अपना दिवाना बना दिया था. क्योंकि पारंपरिक नाश्तों का स्थान अब मैगी ले चुकी थी. हालांकि इन सबका खामियाजा हमारे शरीर को नुकसान उठाकर चुकाना पड़ रहा है.

लेकिन इन सब जुमलों के दिन अब लद गए. क्योंकि विवादों में आई मैगी नुडल्स की बिक्री पर फिलहाल पूरे देश में प्रतिबंध लगा दिया गया है. खाने-पीने की निर्माण प्रक्रिया पर नजर रखने वाले भारतीय खाद्य संरक्षा और मानक प्राधिकरण ने मैगी नूडल्स के सभी 9 तरह के उत्पादों के आयात निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है.
ज्ञात हो कि यह प्रतिबंध विभिन्न राज्यों से आयी शिकायत और फिर इसकी जांच रिपोर्ट के बाद लगाया गया.

अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई कंपनी किसी उत्पाद की बिक्री अपने मानकों के हिसाब से कर रही है तो क्या यह सही है ?  क्या सरकार के पास इसकी जांच का कोई हिसाब-किताब नहीं रहता ?

इसी तरह बहुत सारे उत्पाद ऐसे हैं जिनमें खामियों की शिकायत आने के बाद ही सरकार हरकत में आती है. ऐसा क्यों ? क्या यह देश के नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ नहीं है ?

लेकिन चलो देर से सही पर सरकार ने इस पर सही फैसला तो लिया. सरकार के इस फैसले से उपभोक्ताओं को ही नहीं दुकानदारों को भी नुकसान नहीं होगा. क्योंकि मैगी कंपनी को अपने उत्पाद वापस लेने पडेंगे.

यह तो बात हुई सिर्फ एक उत्पाद की खामियों की. लेकिन उन सभी हानिकारक उत्पादों का जिम्मेदार कौन होगा जो आज भी सरकार की नाक के नीचे धड़ल्ले से बिक रहे हैं.

हमारे देश में बिक रहे कुछ विदेशी कोलड्रिंक्स बहुत ही हानिकारक बताए जा रहे हैं. जो लोगों के स्वास्थ्य को सीधा प्रभावित कर रहे हैं. सुनने में तो यह भी आया है कि किसान कई कोलड्रिंक्स को अपने फसल में कीटनाशकों के छिड़काव की जगह प्रयोग करते हैं. क्या वे प्रतिबंधित नहीं होने चाहिए?

बाजार में बिक रही हरी सब्जियों और अनाज में तो मिलावट की बात लाइलाज हो चुकी है. क्या यह सभी चीजें सरकार के शिकंजे से बाहर हैं?

इन सभी बाजारू चीजों को अगर दरकिनार कर दें तो साधारणतया पीने वाला पानी कितना प्रदूषित है यह बात किसी से छुपी नहीं. फिर भी लोग पीने के लिए मजबूर हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अगर सिर्फ भारत की बात की जाए तो करीब 80 फीसदी लोग दूषित पानी पीते हैं.

मोदी सरकार का आजकाल नारा है कि रेल बढ़ेगी, देश बढ़ेगा. उन्हीं ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर सबसे दूषित पानी पीने को मिलता है.

देश की किसी राजनीतिक पार्टी की सालाना बैठक हो या सरकारी सेमिनार, नेताओं और बडे-बडे नौकरशाहों के लिए पीने के लिए विसलरी की बॉटल आती हैं. आखिर वही पानी वह क्यों नहीं पीते जिसकी व्यवस्था उन्होंने आम जनता के लिए की है?

एक दिन का वाकया है मेरे घर अक्वागार्ड कंपनी का एक सेल्समैन आया. उसने कहा सर अपने घर में अक्वागार्ड लगवा लीजिए. क्योंकि सरकारी सप्लाई का पानी भी बहुत दूषित आता है. बाद में उसने मेरे घर का एक गिलास पानी लेकर मशीन से टेस्ट कर दिखाया जो कि करीब 70 फीसदी पानी दूषित निकला.

कहने का मतलब है क्या इन सबकी जिम्मेदार भी कोई प्राइवेट कंपनी है? सरकार इस पर क्यों नहीं ध्यान देती?

प्रधानमंत्री मोदी के स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा जब सभी नागरिकों को कम से कम पीने का स्वच्छ पानी मिल सकेगा.

इसके अलावा देश में अनाजों और सब्जियों में मिलावटखोरों पर तुरंत नकेल कसने की जरूरत है.

रही बात ठडे पेय पदार्थों की. जो भी सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते उनपर भी तत्काल प्रतिबंध लगना चाहिए. इससे लोग फिजूलखर्ची से तो बचेंगे ही साथ ही अपने पारंपरिक पेय पदार्थों को पुनर्जीवित करेंगे. तभी जाकर मैगी नूडल्स पर लगा प्रतिबंध कारगर साबित होगा.

हमने धर्म तो अलग कर लिए चलो आओ आज, सूरज….पानी….पेड़…प्रकृति को भी अलग कर लें. हिस्से कर दें इनके भी कुछ नाम भी रख दें जैसे धर्म के नाम रखें हैं. एक मुस्लिम सूरज एक हिंदू सूरज…कैसा लगेगा. प्रकृति के लिए भी बना दें कुछ नियम कानून हमारे कहने से हमारे धर्म के लोगों पर बरसें..सुकूंन दें. ऐसा संभव है क्या..किससे लड़ना चाहते हैं किसका विभाजन करना चाहते हैं जो कि इस सृष्टि का निर्माता है. प्रकृति का किसी भी धर्म से क्या लेना देना हो सकता है..योग किसी भी धर्म से कैसे जुड़ा हो सकता है …समझ से परे हैं.

योग पर विवाद तो सही में हैरान कर देने वाली बात है कुछ कट्टरपंथियों द्वारा ये पैदा किया गया ये विवाद सच में नादानी ही है वरना सृष्टि के अनवरत विकास क्रम में सूर्य की समान रूप से निर्विवाद भागीदारी बनी हुई है. हम इसी सृष्टि का अंश है. कोई भी धर्म इस सच से मुंह नहीं मोड़ सकता है.

धर्म का अर्थ है धारण करना…धर्म का अर्थ है सेवा या परोपकार करना. धर्म एक आचरण है जिसे हम समझे बिना विवाद करने पर आमादा रहते हैं. कुछ कट्टरपंथी लोग इसलिए सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहते क्योंकी सूर्य के साथ भगवान शब्द जुड़ा है. अगर बात ऐसी ही है तो नमाज के समय मुसलमानों के सामने दीवार होती है तो इसका मतलब क्या वह दीवार से सामने सिर झुका रहे हैं और सूर्य की किरणों में ही तो हमारी सांसें बसती है इस सत्य से हम मुंह कैसे मोड़ सकते हैं.

योग में सूर्य नमस्कार को शामिल करने पर कई मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताने के बाद तो सरकार ने योग दिवस पर आसनों की लिस्ट में सूर्य नमस्कार को नहीं रखा है लेकिन क्या ये वाकई में सही है. अब कुछ नहीं बचा तो योग का भी राजनीतिकरण शर्मनाक बात है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान कहा था कि योग जीवनशैली को बदलकर और मस्तिष्क की चेतना जगाकर हमारे जीवन में शांति पहुंचा सकता है. जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की मदद कर सकता है. आपको बता दें जलवायु की वजह से भी लोगों में गुस्सा देखा जा रहा है और जिस तेजी से दुनिया में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है, उसका एक कारण जलवायु में हो रहा बदलाव भी है. शायद इसीलिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में से 171 देशों ने योग दिवस को मान्यता दी है.

योग शब्द का अर्थ है जोड़ना वह चाहे किसी भी धर्म जाति अथवा संप्रदाय के लोग हों- योग का प्रयोग शारीरिक रूप से स्वस्थ्य और मानसिक रूप से सकारात्मक सोच विकसित करता है.

योग की क्रिया सूर्य नमस्कार क्योंकि धर्म नहीं स्वास्थ्य लाभ से जुड़ी क्रिया है, लिहाजा इसे नकारना अपने ही स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना है. हमें इस नादानी से बचना चाहिए.

भारतीय देवी-देवताओं का सम्मान विश्व स्तर पर किया जाता रहा है. यही कारण है कि लोकप्रिय चित्रकार एमएफ हुसैन की देवी-देवताओं पर बनाई गई पेंटिंग्स को लेकर काफी विवाद हुआ था.

राम गोपाल वर्मा के भगवान गणेश का अपमान करने वाले ट्वीट पर भी खूब हो-हल्ला हुआ था. अब ताजा मामला चीन से जुड़ा हुआ है.

भारत में मेड इन चाइना की गणेश जी और लक्ष्मी जी की मूर्तियां मिल जायेंगी. लेकिन चीन से आने वाली भगवान गणेश की मूर्तियों की आंखें छोटी से छोटी होती जा रही हैं.

सभी धर्म का सम्मान करना हम भारतीयों की विशेषता है. फिर हमारे धर्म का सम्मान क्यों नहीं?

रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने मेक इन इंडिया की वकालत करते हुए कहा था कि उन्हें कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के दौरान अक्सर देवी-देवताओं की मूर्तियां तोहफे में मिलती हैं, विशेष तौर पर भगवान गणेश की. एक दिन मैंने उसे पलटकर देखा तो पाया कि यह मेड इन चाइना है.

अगर देवी-देवताओं की मूर्तियां धीरे-धीरे बदलती हैं तब इस पर आश्चर्य नहीं करें. इसलिए हमें इसी दीपावली से ही तोहफों से हमारे अपने देवी देवताओं के संदर्भ में मेक इन इंडिया की शुरुआत करनी होगी.

पर्रिकर ने कहा-मैं इस बारे में गंभीरता से विचार कर रहा हूं.

चीन में बनाई जा रही गणेश की मूर्तियों की लगातार छोटी होती जा रही आंखों के पीछे छुपी गंभीरता और चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इसकी गहरी कीमत हमें चुकानी पड़ेगी.

कहने को हमारा व्यापारिक रिश्ता साठ अरब डॉलर की सीमा छूने वाला है, लेकिन हकीकत में पूरा संतुलन चीन के पक्ष में झुका हुआ है. कीमत कम होने से आकर्षण होता ही है. चीनी सामानों से हमारे देश पटा पड़ा है. आखिर कब से शुरु होगा मेक इन इंडिया.

सीमा विवाद पर चीन की दागदार मंशा लगातार सामने आ रही है. चीन धमकी दे रहा है कि दक्षिण चीन सागर में पांव रखा तो खैर नहीं. जबकि भारत वहां वियतनाम के बुलावे पर उसकी जलसीमा में पेट्रोलियम की खोज में लगा है.

पेंटिंग्स और ट्वीट की तरह ही भगवान की मूर्तियों के बनाने में गलती अक्षम्य है. बाजार में किसी भी वस्तु को उतारने से पहले उसकी गुणवत्ता को देखना सरकार का काम है.

मेक इन इंडिया की वकालत अपनी जगह ठीक है किन्तु इसे भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है. रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के साथ ही देश के राजनेता और माननीयों को इसे गंभीरता से लेना चाहिये.

मेरी आप सबसे यही अपील है कि सरकार जो भी करें लेकिन हमारा प्रयास यह हो कि आने वाले दिनों में भारतीयता को बढ़ावा मिले और खासकर पूजा-अर्चना में स्वदेशी सामानों का प्रयोग किया जाये.

साथ ही सरकार को भी हमारे धर्म और आस्था का सम्मान करना चाहिए और दूसरे देशों से भारतीय देवी-देवताओं पर बनी वस्तुओं को लेकर हमारे देश में आने पर प्रतिबंध लगना चाहिये.

बात हमारे बचपन की है स्कूलों में गर्मी की छुटिटयां शुरू होते ही हम लोग मां से एक ही रट लगाए रहते थे कि नानी के यहां कब चलेंगे.

मेरी नानी का घर मेरे गांव से ज्यादा दूरी पर ना होकर बमुश्किल 25 किलोमीटर की दूरी पर है. अपने गांव से 10 किलोमीटर की दूरी तांगे से तय करने के पश्चात् तकरीबन इतनी ही दूरी ट्रेन से यात्रा करते थे.

हम लोगों का ट्रेन का सफर जहां समाप्त होता था वहां स्टेशन पर ही नाना अपनी बैलगाडी भिजवा देते थे. बैलगाडी का सफर शुरू होते ही शुरू हो जाती थी हम लोगों की पिकनिक ग्रामीण इलाके का सुनसान कच्चा रास्ता होता था.

रास्ते के दोनों ओर छायादार वृक्ष थोडी-2 दूर पर रास्ता किसी घने बगीचों के अंदर से होकर गुजरता था. बगीचे में ठंडी छांव के साथ ताजे मीठे फल भी खाने को मिलते थे. क्योंकि बगीचे इतने ज्यादा होते थे कि कोई भी अपना बगीचा बचाने भी नहीं बैठता था.

बैलगाड़ी हांकने वाला बैलगाड़ी रोककर हम लोगों को आम, जामुन, खजूर जैसे फल तोडकर खाने के लिए देता था. कहने का मतलब हम लोग भूल जाते थे कि मई, जून की तमतमाती दोपहरी में रास्ता तय कर रहे हैं. कहीं से भी गर्मी का अहसास ही नहीं होता था.

वहीं अगर उस दौर की तुलना आज से करें तो परिस्थितियों में अंतर जमीन आसमान का मिलेगा. आज ना तो वह गांव के बगीचे रहे, ना तो गांव के ताल तलैयों में पानी.

शहरों का तो पूछना ही क्या है. लम्बी चौड़ी उम्र से भी लम्बी और ना खत्म होने वाली सडकें मुंह बाए ऐसी चलती जाती हैं जिन पर छायादार वृक्ष तो क्या एक पौधा तक नजर नहीं आता.

आज देश में जितने नए हाईवे बन रहे हैं उनके किनारे कहीं भी पथिक के लिए छाया का ध्यान नहीं रखा गया है. शहरी रिहायशी इलाकों में यदा-कदा जहां कहीं भी पुराने तालाब, पोखरे आदि हैं भी, वह धीरे-2 भूमाफियाओं का शिकार होते जा रहे हैं, और वहां कालोनियां बसती जा रही हैं.

शायद इसी का नतीजा है कि आज पूरा देश ग्लोबल वार्मिंग की मार झेल रहा है. पूरे देश में वृक्षों की कटान अनवरत जारी है. वृक्षों की कटान में सरकारी अमला भी पीछे नहीं है.

पूरे देश में जारी भीषण गर्मी से मरने वालों की संख्या 1400 पार कर गयी है. केंद्र सरकार और राज्य सरकारें सिर्फ अगले चुनाव की तैयारी में लगी रहती हैं.

ठंडक के महीनों में तो रैन बसेरों का इंतजाम सरकार की ओर से किया जाता है. वहीं गर्मी के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किया जाता. कुल मिलाकर इस समय पूरे देश में गर्मी से त्राहि माम्-त्राहि माम् की स्थित बनी हुई है.

खैर सरकारों का रवैया छोडिये, लोगों को अपनी इस परेशानी का खुद ख्याल रखना होगा. केंद्र और राज्य सरकारों को क्या दोष देना, उनका लापरवाह रवैये का अपना इतिहास रहा है.

इस मौसम में सबसे ज्यादा खतरा हीट सट्रोक का होता है. यानि गर्मी के कारण तेज बुखार आ जाना. गर्मी में अधिक देर तक रहने से शरीर अपने आप को ठंडा रखने की क्षमता खो देता है.

इसलिए हमें इस मौसम में धूप में सुरक्षित चीजों के इस्तेमाल के साथ खान-पान का विशेष ध्यान रखना होगा. थोड़ी-2 देर पर पानी पीते रहना चाहिए. इस मौसम में तली-भुनी चीजों से बचना चाहिए.

इसके अलावा और बहुत सारी जरूरी बाते हैं जो हमें हमारी आने वाली पीढियों के लिए ध्यान रखना होगा. क्योंकि उसकी चिंता भी हमें ही करनी है.

पानी की अधिक बर्बादी ना करें. छोटे-2 जलाशयों में पानी एकत्र करने में मदद करें. प्लास्टिक थैलियों का इस्तेमाल बंद करें. क्योंकि इससे भी ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढता जा रहा है.

अपने आसपास छायादार वृक्ष लगाएं. ना हो तो पास के पार्क में ही कम से कम एक पौधा लगाएं और उसे खुद ही पानी दें.

अपने घरों में ज्यादा से ज्यादा गमलों में पौधों को लगाएं जिससे हमें कम से कम अच्छी आक्सीजन तो मिलती रहे और हमें गर्मी का अहसास कम हो.