एक बार फिर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत का रहस्य गहरा गया है. यूपी के फैजाबाद जिला प्रशासन ट्रेजरी में बंद उनके सामानों को बाहर निकाला जा रहा है. इन दिनों फैजाबाद ट्रेजरी में बंद उनका बक्सा खोला जा रहा है.

इनमें से कुछ ऐसी चीजें मिली हैं जिसके आधार पर वहां के लोग एक बार फिर यह दावा कर रहे हैं कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. गुमनामी बाबा से जुड़ी वस्तुओं के पिटारे से मिली टाइप राइटर और दूसरी कई चीजों ने उनके रहस्य को कई गुना बढ़ा दिया है.

जापानी क्राकरी का सेट भी बक्से निकला है. निकले सामानों से यह साबित होता है कि शायद गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. बक्से से बहुत सारी किताबें भी मिली हैं जो नेताजी से जुडी हुई दिख रही हैं. दावा किया जा रहा है कि यह वो किताबें हैं जब भारत हिन्द फौज की स्थापना हुई थी और वे जर्मनी में रह रहे थे.

दरअसल लोगों का मानना है कि गुमनामी बाबा वास्तव नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे, जो वेश बदलकर गुमनामी बाबा के रूप में रह रहे थे. सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ा विवाद नया नहीं है.

नेताजी की मौत की जांच के लिए गठित मुखर्जी आयोग ने भी गुमनामी बाबा के सुभाष चंद्र बोस होने का संकेत दिया था. बाबा के अनुयायी भी दावा करते हैं कि वे सुभाष चंद्र बोस थे. उनका कहना है कि बाबा अपने छिपने के लिए परिस्थतियों को जिम्मेदार ठहराते थे.

उन्होंने कहा था कि उनके सामने आने से भारत को विश्व शक्तियों से प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है. कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर ग‌ठित मुखर्जी आयोग ने विमान हादसे में नेताजी के मौत को खारिज कर दिया था.

ऐसे में एक बार फिर ये सवाल उठने लगा है कि क्या फैजाबाद के गुमनामी बाबा उर्फ भगवान जी सुभाष चंद्र बोस थे? क्या नेता जी की मौत 18 अगस्त, 1945 में विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी.

लोगों का मानना है कि गुमनामी बाबा वास्तव नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे, जो वेश बदलकर गुमनामी बाबा के रूप में रह रहे थे. नेताजी को पहले से जानने वाले कुछ लोग- जैसे उनके कुछ रिश्तेदार, कुछ शुभचिन्तक, कुछ स्वतंत्रता सेनानी, कुछ आजाद हिन्द फौज के अधिकारी उनसे गुप-चुप रूप से मिलते रहते थे.

खासकर, 23 जनवरी और दुर्गापूजा के दिन मिलने-जुलने वालों की तादाद बढ़ जाती थी. पहचान खुलने के भय से 1983 में, 86 वर्ष की अवस्था में वे अयोध्या आ जाते हैं. गुमनामी बाबा से मिलने के लिए कोलकाता से नेताजी के फैमिली मेंबर, दोस्त और रिश्तेदार अक्सर आते रहते रहते थे.

उससे लगता है कि गुमनामी बाबा कोई सामान्य शख्स नहीं थे. 1986 में नेताजी की भतीजी ललिता बोस ने कोर्ट में अर्जी दी थी कि अगर गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस हैं, तो उनकी संपत्ति से उन्हें हिस्सा दिया जाए.

बाबा की चीज़ों को संभालना और उन्हें सुरक्षित रखना भी सरकार का फर्ज है. 1975 से ही उनके भक्त बने डॉ. आर.पी. मिश्रा ‘रामभवन’ में उनके लिए दो कमरे किराये पर लेते हैं. यहाँ भगवानजी एकान्त में रहते हैं, पर्दे के पीछे से ही लोगों से बातचीत करते हैं और रात के अन्धेरे में ही उन्हें जानने वाले उनसे मिलने आते हैं.

नेताजी के ज्यादातर भक्त आज ‘दशनामी सन्यासी’ उर्फ ‘भगवान जी’ उर्फ ‘गुमनामी बाबा’ को ही नेताजी मानते हैं. 16 सितम्बर 1985 को गुमनामी बाबा का देहान्त होता है. बहरहाल दो दिन बीत जाने पर जब कलकत्ता से कोई नहीं आया तब आनन-फानन में चुपके से गुमनामी बाबा का दाह संस्कार एक ऐसी जगह में कर दिया गया जहां बताया जाता है की राम ने जल समाधि ली थी.

‘गुप्तार घाट’ में वैसे इससे पहले कभी भी किसी का दाह-संस्कार नहीं हुआ था. गुमनामी बाबा के पास से जो सामान बरामद हुआ उसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार की तस्वीरें आदि के अलावा सबसे ज्यादा चिट्ठियां मिलीं जो कलकत्ता से लोग लिखते थे.

इनमें आजाद हिन्द फौज की गुप्तचर शाखा के प्रमुख पवित्र मोहन रॉय, लीला रॉय और समर गुहा जैसे लोग शामिल थे. लगभग सभी पत्रों में उन्हें भगवनजी कह कर संबोधित किया गया था और कई में तो ये भी लिखा था कि ‘हम सभी आपके आज्ञाकारी शिष्यों की तरह उस धर्म का पालन कर रहे हैं जो आपने कहा है’.
गुमनामी बाबा के बक्से और झोले से मिले सामानों की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी होगी, फिर उनकी इन्वेंट्रीजा रहा है. उसके बाद टेक्नोलॉजी कमेटी इन सामानों को टेस्ट करेगी. फिर इन्हें अयोध्या में बने इंटरनेशनल रामकथा म्यूजियम में रखा जाएगा.

यह पूरी कवायद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के आदेश के तहत की जा रही है. गौर हो कि सरकारी दस्तावेज के मुताबिक नेताजी की मृत्यु हवाई दुर्घटना में हुई थी हालांकि इस बात के अभी तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी 23 जनवरी को उनसे जुड़े सभी दस्तावेज को सार्वजानिक कर दिया था. इसके बाद खबर जोर पकड़ती है कि है कि गुमनामी बाबा नेताजी थे.

गुमनामी बाबा के सामान को अदालत के आदेश पर मार्च’ 86 से सितम्बर’ 87 के बीच उनके सामान को 24 ट्रंकों में सील किया गया.

उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना; नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता और पत्र-व्यवहार; बात-चीत में उनका जर्मनी आदि देशों का जिक्र करना; इत्यादि जो बातें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के समर्थन में जाती हैं, गुमनामी बाबा के सामान को प्रशासन नीलाम करने जा रहा था.

लालिता बोस, एम.ए. हलीम और विश्वबन्धु तिवारी कोर्ट गये, तब जाकर अदालत के आदेश पर मार्च’ 86 से सितम्बर’ 87 के बीच उनके सामान को 24 ट्रंकों में सील किया गया. 26 नवम्बर 2001 को इन ट्रंकों के सील मुखर्जी आयोग के सामने खोले जाते हैं और इनमें बन्द 2,600 से भी अधिक चीजों की जाँच की जाती है.

पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के अलावे इन चीजों में नामी-गिरामी लोगों- जैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के “गुरूजी”, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल के पत्र, नेताजी से जुड़े समाचारों-लेखों के कतरन, रोलेक्स और ओमेगा की दो कलाई-घड़ियाँ (कहते हैं कि ऐसी ही घड़ियाँ वे पहनते थे), जर्मन दूरबीन, इंगलिश टाईपराइटर, पारिवारिक छायाचित्र, हाथी दाँत का स्मोकिंग पाईप (टूटा हुआ) इत्यादी हैं.

यहाँ तक कि नेताजी के बड़े भाई सुरेश बोस को खोसला आयोग द्वारा भेजे गये सम्मन की मूल प्रति भी है. कारण हैं: उनकी कद-काठी, बोल-चाल इत्यादि नेताजी जैसा होना; कम-से-कम चार मौकों पर उनका यह स्वीकारना कि वे नेताजी हैं;

उनके सामान में नेताजी के पारिवारिक तस्वीरों का पाया जाना नेताजी के करीबी रहे लोगों से उनकी घनिष्ठता और पत्र-व्यवहार बात-चीत में उनका जर्मनी आदि देशों का जिक्र करना; इत्यादि

. he said alaways u give me blood & I give u freedom जो बातें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के समर्थन में जाती हैं .

सरकारी दस्तावेज के मुताबिक नेताजी की मृत्यु हवाई दुर्घटना में हुई थी हालांकि इस बात के अभी तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी 23 जनवरी को उनसे जुड़े सभी दस्तावेज को सार्वजानिक कर दिया था.

होली का त्योहार या यूं कहें रंगों और उमंगो का त्योहार फागुन की शुरूआत के साथ ही मन में उल्लास, हंसी-ठिठोली की बयार बहने लगती है. चंचल मन एक बार फिर से बचपन में लौट जाने को मचलने लगता है.

होली के हुड़दंग की बचपन की यादें अमिट होती हैं. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है मन बचपन की यादों में डूबता जाता है और होली की यादों से मैं खुश हो लेता हूं. ज़माना कितना बदल गया है- रंगों के डर से लोग अब घरों से ही नहीं निकलते. दलीलें तमाम, मुझे कल दफ्तर में मीटिंग अटेंड करनी है, मैं होली को पसंद ही नहीं करती, मेरी स्किन सेंसिटिव है और न जाने क्या-क्या.

ऐसे में मुझे याद आता है उत्तर प्रदेश का छोटा सा शहर अयोध्या. इसी शहर में मैं पैदा हुआ और मेरी शुरुआती परवरिश हुई. मुझे याद आता है कितना उत्साह होता था हमारे मन में, कितना इंतज़ार करते थे हम रंगों के इस त्यौहार का. मुझे याद आता है कैसे पूरा परिवार मिलकर सारी रात गुजिया बनाया करता था.

इसके अलावा और भी कितने ही व्यंजन बनते थे. लेकिन ये सब अब अतीत की बातें हैं जिनकी सिर्फ कल्पना मात्र ही की जा सकती है. अब ये सब कहां होता है. कहां इकट्ठा होता है पूरा परिवार और कौन जागता है रात भर.

मुझे ही देखिये ना अब मैं दिल्ली आ गया हूं. मैने चाहा कि बचपन की परंपरा को जारी रखूं, लिहाज़ा बहुत हिम्मत जुटाकर अपनी पत्नी से कहा चलो मिलकर रात भर गुजिया बनाते हैं– होली करीब है. इतना कहना था कि साहब मत पूछिये. फौरन जवाब मिला रात भर जगाकर गुजिया बनवा लो या फिर नौकरी ही करवा लो.

लेकिन मेरे मुरझाए चेहरे को देखकर श्रीमती जी को जाने क्या सूझी, फौरन 500 का नोट मेरी हथेली पर रख दिया और कहा बाज़ार में तो सब कुछ रेडीमेड मिलता ही है, कल ले आना. मैने भी सोचा बात तो श्रीमती जी ठीक ही कह रही हैं. भइया दिल्ली में रह रहे हैं दो बच्चे हैं काम तो नौकरी ही चला रही है. सो घर की गुजिया तो भूलनी ही पडेगी.

लेकिन मन है कि मानता नहीं बचपन के दिन भी क्या दिन थे याद आता है अयोध्या नगरी के बाबा और साधु जो तुकमलंगा, ईसबगोल की भूसी जो रंग में घोल कर होली खेलने निकली टोलियों के ऊपर डाल देते थे. मम्मी-पापा पहले से सावधान कर देते थे बेटा बदन पर कड़वा तेल मल लो नहीं तो रंग नहीं छूटेगा.

मुझे याद आता है मैं दो-दो पैंट पहनकर होली खेलने निकलता था ताकि कपड़े फटें भी तो मैं किसी तरह अपनी इज़ज़्त बचा ले जाऊं. मुझे याद आती है वो होली कैसे जानवरों के लिये बनी चरही में पानी भरकर रंग घोल दिया जाता था. शायद ही कोई ऐसा होता जिसे उसमें डुबोया न जाता हो.

और अगर पड़ोस की भाभी आ जाएं तो फिर क्या, होली का रंग और सुर्ख हो जाता था. जैसे- जैसे दिन बढ़ता कपड़ा फाड़ होली की शुरूआत होती जाती थी.

शाम ढलते ही पिताजी के साथ मैं नये कपड़े पहन उनके दवाखाने (पिताजी डॉक्टर थे) जाता था जहां परिचितों का होली मिलन होता था. और देर शाम पिताजी हम सबको अयोध्या के राजा साहब के यहां होली मिलाने ले जाते थे.

समय धीरे-धीरे बीतता गया और मैं बालक से युवा हो गया. अब होली खेलने का अंदाज़ भी थोड़ा बदल गया था. याद करके हंसी आती है जब मैंने होली के मौके पर ही पहली बार सोमरस पी ली थी सोमरस तो समझ ही गये होंगे.

पर इसकी एक ख़ास वजह भी थी. उन दिनों दो-तीन लोग मुझे बहुत परेशान करते थे. मुझे कुछ ‘हितैषियों’ ने सलाह दे डाली कि अगर थोड़ा पी कर परेशान करने वालों को चंद गालियां बक दोगे तो कोई बुरा भी न मानेगा और तम्हारा काम भी बन जाएगा.

बस फिर क्या था, मुझे बात रास आ गई. सोमरस के दो घूंट हलक के नीचे क्या गए गालियां एकाएक ही बाहर आने लगीं. लेकिन बाद में न जाने किस ‘दोस्त’ ने बात घर तक पहुंचा दी और फिर क्या हुआ, लिखने की ज़रूरत नहीं समझता.समझ गये होंगे (वैसे में अब सोमरस का सेवन अब नहीं करता) लेकिन अब समय बदल गया.

अब मैं खुद पिता हूं. होली के आते ही मन करता है मेरे बच्चे भी कुछ उसी तरह होली खेलें जैसे मेरे बचपन में होती थी.

लेकिन जो बच्चे कबूतरखाने समान अपार्टमेंट संस्कृति में जन्में और पले हैं उन्हें भला उन्मुक्त मन की क्या समझ. उन्हें चाहिये इंपोर्टेड पिचकारी क्योंकि पड़ोस के बच्चों के पास वैसी ही है. स्टेट्स सिंबल का भी मामला जो ठहरा.

मिठाई भी चाहिये जनाब, पर घर की बनी नहीं. वो ले जाते हैं शहर की नामचीन दुकान पर और पैक होकर घर आ जाते हैं चंद डिब्बे बस लीजिये हो गई होली.

बहरहाल, इस आधुनिकता के बीच एक छोटी सी परंपरा जारी रखने में मुझे ज़रूर सफलता मिली है.

मेरी पत्नी रात सोते समय ही हम सबके चेहरों पर हल्के रंग से कुछ कलाकारी कर देती है. और इस तरह घर से ही शुरू हो जाती है सुबह उठकर रंग खेलने की परंपरा. परंपराएं तो होती ही हैं निभाने के लिये सो निभाए जा रहा हूं.

आप सबको होली की ढेर सारी शुभकामनाएं.

हरियाणा सुलग रहा है और क्यों सुलग रहा है ये किसी से छिपा नहीं है जाट आंदोलन ने विकास के पथ पर तेजी से बढ़ते इस राज्य की रफ्तार को ही नहीं थामा बल्कि ये ऐसे घाव पीछे छोड़ गया है जिसकी भरपाई तो दूर इसकी टीस भी जल्दी नहीं जाने वाली.

बचपन से लेकर विधार्थी जीवन हरियाणा के रोहतक शहर में गुजरा था. जब वहां फैली आरक्षण आंदोलन की आग की खबर कानों में पड़ी तो मन में प्रबल इच्छा हुई अपने शहर जाने जाऊं. सो रेलवे पूछताछ को फोन कर पूछा तो पता चला कि रेल चलनी अभी शुरू नहीं हुई.

आरक्षण के दौरान रेल पटरियों को नुकसान पहुंचाया गया, सड़क परिवहन शुरू हुआ लेकिन बहुत कम बसों का ही आवागमन हो रहा था. कारण बस डिपो में खड़ी ज्यादातर बसों को आग लगा दी गई थी.

जो कुछ बची थी उन्हें ही सड़कों पर उतार दिया गया था. मैं भी जैसे तैसे बस पकड़ अपने शहर पहुंच गया. फिर शहर को करीब से देखने के लिए मैं कदमों से रास्ता मापने लगा.

जहां-तहां जले हुए वाहन, शॉपिंग मॉल को देखकर मन सिहर उठा. यूं लग रहा था जैसे आरक्षण आंदोलन ने शहर को श्मशान में तब्दील कर दिया हो.

शहर का भयावह माहौल डरावना था.  किस तरह आरक्षण के नाम पर शहर में तांडव मचाया गया. जिस किसी पीडित से बात कि तो उसकी आँखें भर आई. बरसों की मेहनत से बनाया काम धंधा चौपट हो गई. दुकानों को आग दी गई.

“हम बेरोजगार हो गए. अपने घरों में कैद हो गए. हमें समुदाय में बांट दिया गया, एक तरफ जाट समुदाय के लोग तो दूसरी तरफ सैनी एवं पंजाबी. हमें एक-दूसरे का दुश्मन बना दिया गया.” ये कहना है वहां के तमाम पीड़ितों को जिन्होंने इस व्यथा को इन दिनों भोगा है.

ये सब नेताओं के आपसी शब्द-बाण का नतीजा है जिस कारण राज्य में आगजनी और करोड़ों का नुक्सान हुआ. यही नहीं पड़ोसी राज्यों को भी इसका असर झेलना पड़ा. इस आंदोलन के चलते दिल्लीवासियों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पडा.

लोगों का नेताओं के खिलाफ गुस्से का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री खट्टर की जनसभा में उन्हें काले झंडे दिखाए गए. उन्हें बोलने तक नहीं दिया गया. नतीजतन उन्हें जनसभा बीच में ही छोड़ जाना पड़ा.

लोगों का आरोप था कि भाजपा सरकार ने आंदोलनकारियों के सामने घुटने टेक दिए और उन्हें पूरी मनमानी करने दी जिसके चलते राज्य को भारी जानमाल का नुकसान हुआ.

लोगों ने बातचीत में सरकार के खिलाफ गहरा रोष व्यक्त किया और दावा किया कि अगली बार राज्य में भाजपा सरकार का सफाया तय है.

यकीनन आंदोलन के दौरान हुईं कथित ज्यादतियां सरकार की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़ी करती है और इसे शायद सरकार के मुआवजे का मरहम भी नहीं भर पाएगा.

संजय अरोरा

अयोध्या अवध का भगवात धाम….सरयू नदी के तट पर बसी अयोध्या भारतवर्ष की प्राचीन सात पुरियों में एक है. वाल्मीकि रामायण के अनुसार, अयोध्यापुरी को मनु ने बसाया था.

अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि के संदर्भ में जानी जाती है जबकि स्कंदपुराण कहता है कि यह नगरी विष्णु के सुदर्शन चक्र पर बसी है.

कुछ मतों के अनुसार, अयोध्या श्रीरामचंद्र के धनुष के अग्रभाग पर स्थित है. कथा है कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम पृथ्वी पर लीला समाप्ति के बाद समस्त अयोध्यावासियों को निज धाम ले गए. अयोध्या वीरान हो गई.

बाद में श्रीराम के पुत्र कुश ने इसे फिर से बसाया. कहते हैं कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण पटरानी रुक्मिणी के साथ अयोध्या आए थे. उनके नाम पर बना कुंड आज भी ‘रुक्मिणी कुंड’ के नाम से जाना जाता है.

कलियुग में अयोध्या के पुनरोद्धार का श्रेय उज्जायिनी के राजा विक्रमादित्य को जाता है. एक बार उनके मन में इच्छा उठी कि हम सूर्यवंशी है, भगवान राम के जन्मस्थान का पता लगाना चाहिए.

और एक दिन प्रात:काल सरयू नदी के किनारे उन्होंने देखा कि श्यामवर्ण का एक पुरुष काले रंग के घोड़े पर सवार होकर आया और उसने सरयू में डुबकी लगा दी. जब वह घुड़सवार सरयू से बाहर आया, तो वह गौरवर्ण तथा उसका घोड़ा सफेद रंग का दिखा.

उन्होंने घुड़सवार से उसका परिचय पूछा, तो वह अश्वारोही बोला, ‘मैं तीर्थराज प्रयाग हूं. पापियों के पाप धोते-धोते कलुषित हो जाता हूं. सरयू और अयोध्यापुरी के प्रताप से मैं पापों से मुक्त होकर वास्तविक स्वरूप में आ जाता हूं.’

प्रयागराज ने उन्हे रामजन्मभूमि की खोज के लिए काशी जाने का परामर्श दिया. काशी पहुंचकर विक्रमादित्य अन्न-जल त्यागकर विश्वनाथ मंदिर के द्वार पर बैठ गए. विक्रमादित्य का संकल्प देखकर बाबा विश्वनाथ ब्राह्मण के वेश में आकर बोले- ‘राजा! तुम यह गऊ और पोथी लेकर अयोध्या जाओ, जहां गऊ के थन से स्वत: दूध गिरेगा, उसे ही श्रीरामचंद्र की जन्मभूमि समझना.

इसके बाद इस पोथी के आधार पर अयोध्या के प्राचीन स्थलों का पुनरोद्धार करना.’ कहते हैं भगवान शंकर ने भी अयोध्या की पांच कोस की परिक्रमा की थी .शीतला माता का मंदिर कालिका कुंड,छोटी छावनी ,बड़ी छावनी,गुप्तारघाट लक्षमण किला,कनक भवन, हुमानगढ़ी,जानकी महल ,नागेश्वर नाथ ,राजद्दार,सहित हजारों मंदिर लोगों की आस्था के केंद्र हैं,.

मुस्लिम भाइयों की आस्था केंद्र अलगड़ी मस्जिद,नौगजी में स्थित बाबा की मजार ,मणिपर्वतके पास बनी मजार सभी धर्मों के लोगों के लियो आस्था केंद्र है.

इसी तरह जैन एंव सिखधर्मों के लिये भी अपने तीर्थकरों की वजह से आस्था के केंद्र है .कहते हैं ब्रहमकुंड पर ऐतिहासिक गुरूद्धारे में ब्रह्माजी ने ने दर्शन दिये थे .
आपको जानकार हैरानी होगी अयोध्या स्थित एक सदियों पुराना मंदिर जिसकी देखरेख एक मुसलमान भाई करते थे .

साथ ही इतिहासकारों का कहना है कि नवाब सफदरजंग द्धारा निर्वाणी अखाड़े के मंहत अभयराम दास को हनुमान गढ़ी बनवाने के लिये जमीन दी …खाकी अखाड़ा भी नवाब भाजाउद्दौला दी गई जमीन पर बना है.

छोटी देवकाली जिन्हें अयोध्या का इष्टदेव भी कहा जाता है लोगों की आस्था का केंद्र है.यहां अयोध्या के राजा रहे राजा दर्शन जी का बनवाया सूर्य मंदिर हैं .अयोध्या में बना अयोध्या के राजा का महल भी अपनी बेजोड़ बनाई कलाकारी का नमूना पेश करता है .

शिव संहिता में अयोध्या को साकेत,कोसला ,अवध ब्रह्मपुरी और अपराजिता कहा गया संस्कृति ग्रंथों में अयोध्या को विनिता भी कहा है .आर्य संस्कृति का का भी सबसे बड़ा केंद्र अयोध्या रहा है.

सरयू नदी की धारा अयोध्या में ढ़ाल बनकर सदियों से बहती रही. गोस्वामी तुलसी दास नें अपनी रामायण में सरयू के महत्व को विस्तार पूर्वक दर्शाया है.

कहते हैं अयोध्या ना जाने कितनी बार उजड़ी और बसी. प्राचीन काल से ही सरयू तट पर बसी अयोध्या संस्कृति का अंग रही है मर्यादा पुरूषोत्तम राम की ये जन्म स्थली वैष्णव, जैन एंव बौदध् धर्म के तीर्थयात्रियों के लिये आस्था के केंद्र रही. दौ दशक पहले तक शांत वातावरण को अपने में समेटे अयोध्या नगरी लोगों के लिय मोक्ष का रास्ता थी.

5 कोस में बसी ये छोटी सी नगरी अयोध्या में सभी धर्मों के लोगों को अपने दामने में समेटे प्रभु श्री राम के सानिध्य में रखकर मन को सुख शांति और समृद्धि प्रदान करती थी .तीन दशक पहले तक 30 हजार की आवादी वाली अयोध्या आज तीस हजार की सीमा पार कर एक करोड़ के की आबादी के करीब पहुंचने वाली है.

कुछ सत्ता पिपासा में लिप्त कुछ लोगों (नेताओं) को शांत अयोध्या नही भाई,भंग कर दी शांति .फैला दिया धर्म जाति का जहर ,उन्माद की इस आंधी में ना जाने कितने लोग मारे गये,कुछ लापता हो गये जिसका असर पूरे देश में हुआ…फिर भी इन को कोई अफसोस नहीं होता …दर्द तो उसको हो रहा जिनके बच्चे इन दंगो में मारे गये . कितनी औरतें विधवा हो गईं … पर क्या फर्क पड़ता है इन नेताओं को क्योकि मरने वालों में उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं होता.

अयोध्या का हाल बेहाल है ..विकास के नाम गली गली में लगे पत्थर ये तो बताते है कि कोई शिलान्यास हुआ पर पैसा बंदर बाट हो गया. एक अनुमान के अनुसार अयोध्या लगभग 5000 मंदिर हैं.

“रामलला हम आयेंगे मंदिर जरूर बनायेंगे” का नारा देकर अयोध्या की जनता को झांसा देकर सत्ता पर काबिज हो गये .दिन महीने साल गुजरते गये और रामलला आज कई वर्षों से अस्थाई टेंट में विराजमान इन नेताओं की बाट जो रहे हैं जिन्होंने उनके सिर की छत भी छीन ली …पर वादा करने वाले नेता जिनके पास छोटे से मकान होते थे , आज लग्जरी गाड़ियों के मालिक हैं कई कई फार्म हाउस हैं .

अयोध्या की जनता बहुत ही सीधी है सभी लोग आपसी भाई चारे से रहते हैं. सरकार बदली तो सांसद बदले ,विधायक बदले . फिर लोगों में आस लगी कि शायद ये सरकार अयोध्या का विकास कर…

लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात सिद्ध हुये . बहुत सालों पहले कांग्रेस के शासन काल में रेलवे पुल का निर्माण कराया था . राम लला के नाम सत्ता पर काबिज नेता शायद ही आज अयोध्या आकर रामलला के दर्शन करते हों …

वहीं हाल रामकोट मोहल्ला के लगभग 200 मंदिरों में भगवान अंदर बंद हैं वर्षों से उन्होंने धूप नहीं देखी होगी, इनका भोग नही लगता है. झाड़ी झाकाड़ से पट चुके मंदिर भी सरकार ने अपने कब्जे में ले लिये हैं संगीनों के साये में रह रहे भगवान को भी अगर खतरा है तो वो इंसान ही है … रामलला की सुरक्षा में सलाना 500 करोड़ रूपये खर्च होते हैं.

जब से कथित बाबरी मस्जिद ढ़ाई गई तब से अयोध्या भी बदल गई. दंगों में कई परिवार बर्बाद हुये कई बच्चे अनाथ हुये कई पत्नियां विधवा हो गईं .इसान के जीवन की सबसे बड़ी चीज होता है सूकून मन की शांति ,वातावरण पर अशांति फैलाने वाले उन्मादियों को इन्सानियत से क्या लेना देना. क्योंकि नाम शोहरत ,सत्ता की भूख ऐसी होती हो खून करने में गुरेज नहीं करती क्या दंगो में मारे जाने वाले एलियन थे ?

सत्ता की चाहत इन्हैं इस तरह भ्रमित कर देती है वे भूल जाते हैं कि ये जिसे मार रहे हैं उसका भी खून लाल है ,वो भी उन्हीं की तरह का इंसान है …… अयोध्या की जनता अब काफी सहमी रहती है कि कब क्या हो जाये … अयोध्या का आम आदमी छोटा मोटा व्यवसाय करके अपना परिवार का पेट पालता है …मजदूरी करता है .

वषों पहले बनाई गई राम की पैड़ी आज काई और बदबूदार पानी से भरी रहती है.कोई बड़ी फैक्टरी भी यहां नहीं है.एक अस्पताल है जिसमें रखी गई मशीनें अक्सर खराब ही रहती हैं.

अयोध्या को ढ़ाल बनाकर सत्ता तक का रास्ता तय करने वाले नेताओं को अयोध्या विकास करना होगा ..सौन्दर्यकरण के नाम जिस तरीके से पैसा पानी में बहाया जाता और फिर भी वहीं की वहीं समस्या अटकी रहती है…

कभी सोचा है कि ये जो कुछ कर रहे हैं वो आने वाली पीढ़ियां इनसे पूछेगी…नेता भी नहीं जाहते कि इस मामले का हल निकले इच्छा शक्ति का अभाव उन्हें नहीं करने देता …. आप को आश्चर्य होगा हिन्दू संगठन हो या मुस्लिम आज सिर्फ एकसूत्री कार्यक्रम में जुटे हैं बस पैसा और शोहरत कमाओ. अयोध्या सहित देश विदेश में भी मंदिर मस्जिद के नाम पर कई दुकाने खुल गईं. एसी में रहने वाले ये कथित मंदिर के निर्माण के लिये शायद ही कभी मंदिर या मस्जिद जाते हों …….

भले अयोध्या में एक रेलवे पुल विकास के नाम कांग्रेस वर्षों पहले बनवाया था. अयोध्या में रहने वाले लोगों में भाई चारा था पर उन्मादियों द्धारा फैलाई गई कट्टु जहर की हवा कहीं ना कहीं दोनों के नजरिये में है.

बीस वर्षों में शांत अयोध्या माहौल बदल चुका है आम आदमी समझ चुका है ना मस्जिद बनेगी ना ही मंदिर और ना ही कोईहल निकल पायेगा . क्योंकि नेताओं की राजनिति का एक मुद्दा खत्म हो जायेगा.

आने वाली जनरेशन काफी बुद्धिमान है …ऐसा नहीं है वो ईश्वर को वो नहीं मानती पर कर्म की उसके जीवन की प्रेरणा और ईश्वर है . वो कर्म को ही अपना भगवान मानता है.

आज तक अयोध्या के दर्द को किसी भी नेता को समझने की कोई कोशिश नहीं की चुनाव आता वोट मांगने दरवाजे पहुंच जायेंगे वोट जरूर दीजियेगा अबकी आपका ध्यान रखेंगे जीतते ही गायब..तो ये है सत्ता का नशा.

आपको अयोध्या रात हो या दिन पुलिस के कमांडो के बूटों की आवाज ही सुनाई देगी हर इंसान डरा डरा रहता है …. उधर विवादित ढ़ांचे के स्थान पर बने अस्थाई टेंट में विराजमान रामलला भी इन नेताओं की करनी पर आश्चर्य कर रहे होंगे कितना स्वार्थी हो चुका है ….

और उधर सत्ता के मद में चूर नेता गण शायद अब रामलला को कम याद कर पाते हैं . पर राम तो दयालु हैं …हो सकता है आने वाले समय में अयोध्या बदले क्योंकि यहां की जनता अब एक जुट हो गई है .. जिसका नतीजा पिछले लोकसभा चुनाव में देखने को मिला पर नेता तो नेता ही होता हे अगर फितरत बदले तो ही विकास संभव है .

ग्रेजुएट होकर लोग भीख मांग रहे हैं .लोगौ को पेट भरने के लिये अनाज नहीं मिल पा रहा .. अमीर अमीर होता जा रहा …..और गरीब नमक की रोटी खाकर सो जा रहा है.
रामजन्मभूमि परिसर की सुरक्षा पर 500 करोड़ रूपये सालाना खर्च होने वाले पैसे से अयोध्या का विकास हो सकता था .यहां हिन्दू मुस्लिम सिख छोटा मोटा व्यापर कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं …..

राम की जीवन गाथा इनके जीवन दर्शन की प्रेरणा रही है . जीवन एक बार मिलता है, आज का युवा समझदार है क्या अच्छा है क्या बुरा जानने लगा है ईश्वर को एक ऐसी शक्ति के रूप में पूजता है जो उसको प्रेरणा देती है और विकास के मार्ग पर बढ़ने का मार्ग दिखाती है.

धर्म की दुकान खोलकर राम रहीम, धर्म, जाति के आधार पर उन्माद फैलाने वालों सावधान हो जाये आप लोगों का मैनिफेस्टो पूरा हो चुका है. ऐसे कार्यों को समाज के लिये कीजिये की जो आपको अनंत काल तक याद रखे.

भारतीय जनमानस में राम की गहरी पैठ है इसमें संदेह नहीं और राम या कृष्‍ण जैसे विषय न तो लेखबद्ध किये जा सकते है न उन्‍हें शब्‍दों या वाक्‍यों की सीमा तले ही बांधा जा सकता है , उन्‍हें बहुआयामी और सार्वत्रिक ही रहने दिया जाये इसी में देश का और इस धरा का भला है.

अयोध्या के हिन्दू मुस्लिम लोगों ने मिलकर बैठक भी की हम इन मसलों को खुद सुलझा लेंगे पर धर्म की दुकान चलाने वाले तैयार ही नहीं हुये. खैर वक्त का पहिया घूम रहा है मुझे विश्वास है कि आने वाले सामय में अयोध्या हो या पूरा देश संकीर्ण मानसिकता तो छोड़कर एक नई मिसाल कायम करेगा जहां हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई आपसी प्यार भाई चारे से रहेंगे….

संकीर्ण मानसिकता से उबर कर एक मिसाल कायम करेंगे…. और अयोध्या के लोग भी चैन से एक बार अपने शहर विकास में लग जायेंगे…. अय़ोध्या के दर्द को शायद इन नेताओं ने नहीं समझाआस्था के नाम पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को अपने पैरों रौंदने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

आज अयोध्या नेताओं की सत्ता की सीढ़ी बनकर रह गई … आज भी धर्म के नाम पर धन लूटने वाले लगे हैं पर स्थानीय दुकानदार के अंदर डर समा चुका है पर क्या कर अगर वो अपना व्यापार नहीं करेगा तो शाम उसके घर का चूल्हा भी शायद ना जल पाये.

स्थानीय सासंदो विधायकों को भी चाहिये जिन अयोध्या के लोगों ने उनको संसद या विधानसभा तक पहुंचाया है उनके दर्द को जाने और अयोध्या को सिर्फ एक बेजान नगर ना समझे …प्रभु के चरणों में अपना जीवन व्यतीत कर रहे उन लोगों की नगरी जिनमें जान है….जो एक आम इंसान है…..जो खुद को अपने वजूद को अयोध्या के रूप में देख रहा है.

सांसद हों या विधायक अयोध्या के दर्द को समझे …….उसके एहसास को जाने …….यहां के लोगों के बीच में जायें उनकी समस्याओं को दलगत राजनीति से उपर उठकर सुने. नये रोजगार के साधनों को लाये ……

धार्मिक तनावों और सांम्प्रदायिक एकता से दूर आज यहां की सड़कें मंदिर भी सहमे सहमे से होने का एहसास कराते हैं ….पर फिर भी पावन सरयू ना जाने कितनों के पापों को अपने में समेटे अविरल बह रही है …….उम्मीद है यहां के रहने वाले लोगों को का देर से ही सही समय तो बदलेगा ……..

लीजिए जनता ने अपना फैसला सुना दिया महागठबंधन को ताज, तो एनडीए को अपने दिल का राज बता दिया.

जी हां, शायद पब्लिक अंदर ही अंदर कुढ़ रही थी और नेताओं के भाषणों को बहूत ध्यान से सुन रही थी, उन्हें इन भाषणों में कहीं से भी विकास की बू नहीं आई.तो जनता ने भी अपना नतीजा सब नेताओं के सामने ला दिया, विकास का ढ़िंढोरा पीटने वालों का ढ़ोल पीट दिया.

शायद इस चुनाव की हार के जिम्मेवार खुद भाजपा के ही कुछ नेता रहे जिनके भाषणों में चर्चा थी तो सिर्फ बीफ, धार्मिक असहिष्णुता, जात-पात ओर न जानें क्या क्या.

विकास शब्द तो जैसे गौण ही हो गया था, कुछेक नेताओं ने तो जोश में होश ही खो डाला ऐसे बयान दे डालें कि बाद में माफी मांगनी पड़ी, लेकिन हाय रे चुनाव फिर भी हार ही गए.

आरएसएस प्रमुख का आरक्षण संबंधी बयान, शाहरूख के असल जिंदगी में बोले संवाद के बाद कैलाश विजयवर्गीय का उनके मन को पाकिस्तान में बताने वाला बयान देना फिर माफी मांगना, योगी आदित्यनाथ का आग उगलने वाला बयान शाहरुख खान और हाफिज सईद में कोई अंतर न होना.

फिर केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू का शाहरूख को शानदार बताकर आग को ठंडा करना इन सब बयानों से जनता कहीं न कहीं भाजपा से नाराज हुई और उसने अपनी नाराजगी चुनावी नतीजों से साबित भी कर दी.

विपक्ष को यकीनन इन सब बयानों का बड़ा फायदा मिला खासकर कांग्रेस को जो बिहार में अपनी जमीन तलाश रही थी लालू तो मानो इस शानदार जीत से लालमलाल हो गए, खूब रंग उड़ाया, नीतीश के सुशासन को लोगों ने एक और मौका दिया.

महागठबंधन की इस शानदार जीत ने भाजपा को चेता दिया कि अभी राज्यों में केंद्र सरकार के खिलाफ भारी रोष है देखना होगा कि क्या आगामी आने वाले चुनावों में भाजपा लोगों के इस गुस्से को शांत कर पाती है की नहीं?

कई बार ऐसा होता है कि किसी फिल्म को ‘ए’ सर्टिफिकेट दे दिया जाता है लेकिन वह फिल्म अच्छी होती है. सिर्फ एक-दो एडल्ट सीन या हिंसक दृश्य के कारण ‘ए’ होने पर आप उसे देखने से वंचित रह जाते हैं.

यूट्यूब पर आप जब उसे देखना चाहते हैं तो आपसे ऐज वेरिफिकेशन मांगा जाता है. लेकिन आप लॉगिन करके उस फिल्म को नहीं देखना चाहते हैं. आप अपनी पहचान जाहिर नहीं करना चाहते. तो फिर फिल्म देखें कैसे?

हम यहां आपको बताते हैं वो तरीका जिससे आप बिना लॉगिन किए यूट्यूब पर +18 सर्टिफिकेट वाली फिल्म या वीडियो देख सकते हैं.

इससे लिए आपको कुछ ट्रिक्स अपनाने होंगे. यूट्यूब पर हर वीडियो का अपना एक यूआरएल या वेब एड्रेस होता है. जैसे कि अगर आपको यूट्यूब पर कोई फिल्म देखनी है तो आपको एड्रेस बार में यह यूआरएल दिखेगा. जैसे

http:/ww.youtube.com/watch?v=ZFC7

अब आपको इस URL में से watch? को हटाना है.

इसके बाद आपको यह करना है कि watch? के बाद जो v= है उसमें से = को हटाकर / लगा दीजिए. यानी v= की जगह v/ लिख दीजिए.

इसके बाद इंटर / PLAY दबाइए और फिल्म का मजा लीजिए.

तो अब से जब कभी भी बिना लॉगिन किए वीडियो देखनी हो Watch को Delete कीजिए और इसके बाद आने वाले = को हटाकर / लगा दीजिए. आपका काम बन जाएगा.

कई बार ऐसा होता है कि फिल्म ऑफिशयल ना होने के कारण नहीं चल पाता. परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है. इसी तरीके से दूसरे वीडियो को ओपन कर देखिए.

-हितेंद्र गुप्ता

आप सोच रहे होंगे कि कैसे बेतुके बोल और कैसी लगाम, ज़रा गौर फरमायें बीजेपी लीडरान के खुले और विवादास्पद बयानों पर..

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, विधायक संगीत सोम, सांसद साक्षी महाराज, केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा के हाल ही में दिए बयानों का आंकलन कीजिए और फिर अंदाज़ा लगाइए कि ये विवादित बोल एक साथ अलग अलग सुरों में क्यों सामने आ रहे हैं.

वो भी तब जब खुद पीएम मोदी सार्वजनिक मंच से ये कह चुके हैं कि ऐसे विवादित बयानों पर तुरंत रोक लगे और जनता ऐसे बयानों को गंभीरता से ना ले.

नोएडा के दादरी में 28 सितंबर को गोमांस खाने की अफवाह के बाद अखलाक की पीट पीटकर हत्या कर दी गई थी और अखलाक का छोटा बेटा दानिश भीड के हमले में गंभीर रुप से घायल हुआ. इस परिवार पर बीफ पकाने की आशंका लेकर हमला किया गया था.

इस घटना के बाद नेताओं की ओर से कई विवादित बयान दिए जिसके बाद राजनीति काफी गर्म हो गयी. भाजपा नेता गोमांस को लेकर ऊटपटांग बयान देते आ रहे हैं, जो वारदात को उचित ठहराते प्रतीत होते हैं.

बीफ मुद्दे पर एक कदम और आगे जाकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एक अखबार को दिए एक इंटरव्यू में  कहा कि मुस्लिमों को अगर इस देश में रहना है तो उन्हें बीफ खाना छोड़ना ही पड़ेगा.

बाद में खट्टर ने जब अपने बयान से इनकार किया तो ने खट्टर के उस बयान की ऑडियो क्लिप जारी कर दी है, इस पर फिर से मनोहर लाल खट्टर को सफाई देना पड़ी.

लेकिन मुख्यमंत्री मनोहर खट्टर के बीफ बयान को लेकर बीजेपी एक बार फिर से निशाने पर आ गई है.

इससे पहले केंद्रीय मंत्री और गौतम बुद्ध नगर के सांसद महेश शर्मा ने दादरी में अखलाक की हत्या को दुर्घटना बताया था.

बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने कहा- हमारी मां का कोई अपमान करेगा तो हम मर जाएंगे. सहन नहीं करेंगे, हम मर जाएंगे-मार देंगे. हमारी भारत माता की तरफ कोई ऊंगली उठाता है तो हमारे लोग शहीद होते हैं. सामने वाले को मारते भी हैं.

जैसे शरीर को जन्म देने वाली मां है, वैसे ही हमारी भारत माता है, वैसे ही हमारी गो-माता हैं. गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए और उसके हत्यारों को फांसी देनी चाहिए.

विधायक संगीत सोम ने दादरी पहुंचकर आरोप लगाया था कि पुलिस निर्दोष लोगों को फंसा रही है और मुजफ्फरनगर जैसी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी थी.

उन्होंने कहा कि बिसहड़ा में भी गोकशी के बाद हिंसा हुई, यूपी सरकार गाय काटने वालों को हवाई जहाज में बैठाकर लखनऊ ले जाती है और 50 लाख रुपए भी देती है.

ऐसा नहीं है कि विवादित बोल में बीजेपी के नेता ही आगे हैं बल्कि एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन औवेसी भी दादरी कांड पर अपने बयानों से मीडिया की सुर्खियां बटोर चुके हैं.

ऐसा नहीं है कि इन विवादित बयानों का दायरा भी सीमित हो नहीं ये तो बिहार विधानसभा चुनावों में भी अपना असर दिखा रहे हैं चाहे वो लालू के विवादित बयान हो या बीजेपी के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह के बिगड़े बोल हों, वहीं इनपर जम्मू कश्मीर असेंबली में भी मारतोड़ हो चुकी है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और चाहें कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी सभी दादरी मुद्दे पर अपने बयानों से अपनी अपनी नेतागिरी चमकाने में लगे हैं.

यूपी के शहरी विकास मंत्री आजम खान ने कहा कि प्रधानमंत्री जी अपने कार्यकर्ताओं को रोकिए. आज़म खान ने कहा कि कमज़ोर और अकेले मुसलमान को इस तरह मार देना सबसे बड़ी नपुंसकता और कायरता है.

वहीं दादरी के गांव में गोमांस खाने की अफवाह के चलते पीट पीट कर मारे गए अखलाक का संदर्भ देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के एक लेख में कहा गया है कि वेद में गौ हत्या करने वालों को मौत की सजा देने की बात कही गई है.

हालांकि आरएसएस ने उन खबरों को ‘निराधार’ बताया, जिनमें कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में गोमांस खाने के अफवाह के चलते अखलाक नाम के शख्स की पीट-पीट कर हत्या का उसने समर्थन किया है.

आरएसएस ने हालांकि यह कहकर इससे खुद को अलग कर लिया कि पांचजन्य उसका मुखपत्र नहीं है.

कहा जा रहा है कि दादरी कांड, गोहत्या और बीफ पर भाजपा नेताओं के विवादित बयानों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद नाराज हैं.

बिहार चुनाव में इन विवादित बयानों से नुकसान के मिल रहे संकेतों के बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर, सांसद साक्षी महाराज, मुजफ्फरनगर के सरधना से विधायक संगीत सोम, सांसद संजीव बालियान और केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा को तलब कर इनको कसा है.

लेकिन इतिहास गवाह है कि चंद फायरब्रांड नेताओं की राजनीति तो सिर्फ और सिर्फ बिगड़े बोलों के दम पर ही चलती आई है और चलती रहेगी भले ही उन्हें हाईकमान से फटकार मिलती रहे.

दरअसल ये विवादित बोल इनकी मजबूरी भी हैं क्योंकि ऐसा करके उनकी राजनीति की दुकान भी बखूबी और बढ़िया से चलती रहती है साथ ही मीडिया की सुर्खियां भी खासी मिलती रहती है जिसकी तलाश में नेता हमेशा से ही रहते आए हैं.

वो थ्री नहीं फाइव इडियट्स थे, पिछले पांच साल में बहुत कुछ बदला लेकिन, कमबख्त तख्त पर बैठने वाले वैसे के वैसे ही रहे.

बात यहां मेरे घर के एक तख्त के बारे में हो रही है, इस तख्त पर कई राज्यों के महानुभानों ने बैठकर चटिया जमाई और रात गुजारी.

इस लकड़ी के तख्त पर किसकी नजरें नहीं इनायत हुईं. उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, राजधानी दिल्ली. अरे न जाने इस पर बैठकर सभी ने कितनी डीगें मारी थी.

कितनी कही अनकही बातें हुईं. मेरे हिसाब तो ये साधारण तख्त ना होकर मानों सिंहासन था.

क्योंकि ये तख्त ही था जोकि मेरे कमरे पर मुझे आराम देता था साथ ही मेरे यहां आने वाले तमाम लोगों को उनकी मन की बात और मन की भड़ास निकालने का भी जरिया था यह…

और हो भी क्यों ना इसी तख्त पर बैठकर मैं और मेरे साथी अपना दुख सुख साझा करते हैं.

इसी पर बैठकर ईरान- तूरान अधिक हुआ, हम भी उसका हिस्सा बन बैठकर सुनते और मजा लेते रहे.

समय बदला और तख्त का वक्त भी, आज ये तख्त मुझे काटने दौड़ता है. मैं सोचता हूं कि इस पर जो बैठा, उसने ज्ञान ही बघारा. सब मतलब के साथी निकले. अपना काम निकालकर ये गये फिर वापस नहीं लौटे.

एक छोटे से कमरे में किसी तरह पांच साल से एक नहीं दो तख्त लेकर रात गुजार रहा हूं. इस दूसरे तख्त पर ही सबकी निगाहें थी.

तख्त की कहानी भी दिलचस्प है.

तीन लोगों ने मिलकर तीन तख्त खरीदे. एक तो अपना लेकर चले गये. एक था मेरा. लेकिन, तीसरा तख्त दारोगाजी का था जो मेरे जी का जंजाल बन गया. इसी तख्त को पहले कइयों ने कहा, मेरे हाथ बेच दो. लेकिन किसी की अमानत को मैं कैसे बेचूं.

…लेकिन समय के साथ इस तख्त-ओ ताज ‘सिंहासन’ से अब मैं ऊब गया हूं.

महंगाई ने जब सबकी कमर तोड़ी तो मेरे भी हालात कैसे ठीक रहते आखिर मैं भी तो अपना देश छोड़कर दो जून की रोटी कमाने ही तो यहां आया था.

अब इस तख्त पर बैठकी कम होने लगीं है.. ऐसा नहीं है कि ये तख्त मेरा साथ नहीं दे रहा है.. वो तो आज भी मेरे साथ है और यकीन मानिए मेरे लिए वो किसी तख्त-ओ ताज से कम नहीं है.

तख्त-ओ ताज के लिए तो कई सल्तनतें बदल गईं लेकिन मेरा ये तख्त किसी की सल्तनत बदलने का माद्दा तो नहीं रखता है लेकिन मेरे लिए अब ये ज्यादा अहम है कि तख्त भले ही ना बदले सल्तनत बदले…हमारी किस्मत बदले..

…और यहां चटिया जमाने वाले लोगों के भी दिन फिरें..

अब तो अपना हाल बहादुर शाह जफर सी हो गई है कि तख्त है ताज है लेकिन सल्तनत नहीं है और सल्तनत नहीं है  तो चटिया जमाने वाले भी नहीं हैं.

संघ प्रमुख मोहन भागवत का मौजूदा आरक्षण की नीति पर बयान आते ही राजनीतिक गलियारों में मानो भूचाल सा आ गया है.

केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी को अगर दरकिनार कर दिया जाय तो हर पार्टी आरक्षित वर्ग को अपना हितैषी साबित करने में लगा हुआ है. और ऐसा हो भी क्यों न, आखिर बिहार विधान सभा चुनाव जो सिर पर हैं.

बीजेपी इस मुद्दे पर लाख सफाई देकर भी अपने-आप को पाक-साफ साबित नहीं कर पा रही है क्योंकि उसे संघ की जीरॉक्स माना जाता है. हालांकि राजनीतिक नफा-नुकसान के हिसाब से भी अगर देखा जाए तो बीजेपी किसी भी तरह से भागवत के बयान का समर्थन नहीं कर सकती क्योंकि बीजेपी एक राजनीतिक पार्टी है उसे राजनीति के दांव-पेंच आते हैं.

वहीं अगर संघ की बात की जाए तो इससे लगता है कि संघ में राजनीतिक सूझबूझ की कमी है इसीलिए उसने ऐसे समय यह बयान दिया है जब उसे बिलकुल भी नहीं देना चाहिए.

हालांकि भागवत ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया जिससे कोई बखेड़ा खडा किया जाय लेकिन देश की भोली-भाली जनता को यह कौन साबित कर पाएगा कि किसका बयान जनता के हित में है और कौन उन्हें लॉलीपाप दे रहा है. तभी तो समय-समय पर जनता को जंगलराज का सामना करना पड़ता है.

गौरतलब है कि संघ के मुखपत्र- ‘ऑर्गेनाइजर’ और ‘पाञ्चजन्य’ में प्रकाशित मोहन भागवत ने एक हालिया इंटरव्यू में कहा था कि मौजूदा आरक्षण प्रणाली की समीक्षा होनी चाहिए. उन्होंने कहा था कि इसके लिए एक समिति होनी चाहिए जो मौजूदा आरक्षण प्रणाली की समीक्षा करे कि किसे आरक्षण जरूरी है और किसे नहीं.

1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण की सीमा 22.5 फीसद से 49.5 फीसद हो गयी. क्योंकि इसमें 27 फीसदी पिछड़ों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था शामिल हो गयी.

मौजूदा आरक्षण प्रणाली से आज पढ़े-लिखे वह युवक वंचित हो रहे हैं जिन्होंने न तो कभी दलितों, पिछड़ों पर जुल्म ढाए और न ही जुल्म ढाते हुए देखा है. ऐसे में देश के उन योग्य होनहारों का क्या दोष है जोकि पढ़ाई में अव्वल नंबर लाकर भी दर-दर की ठोकरे खाने पर मजबूर हैं. खास बात तो ये है कि आरक्षित कोटे में भी आरक्षण का लाभ केवल विशेष वर्ग को ही मिल रहा है उसमें भी अति पिछड़े वंचित रह जाते हैं.

संविधान निर्माण के समय अगर आरक्षण की बात की जाय तो बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने भी आरक्षण को स्थायी नहीं बनाया था. इसे सिर्फ 10 वर्षों के लिए लागू किया गया था.

आज 65 वर्षों के बाद भी जब उसकी सीमा खत्म हो जाती है अगले 10 साल के लिए बढ़ा दिया जाता है. इस व्यवस्था को बदलने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता. क्योंकि कुछ राजनेता ऐसे हैं जो जनता के पैसे को तो जानवर की तरह चारा समझकर निगल जाते हैं और आरक्षण का ढोल पीटकर अपने-आप को जनता का रहनुमा साबित करने में लग जाते हैं.

हालांकि ऐसे लोगों की भी कोई गलती नहीं है क्योंकि छोटी सोच वाला सीमित दायरे तक सोच पाता है और जिसकी सोच जितनी बड़ी होती है उसका दायरा भी उतना ही विस्तृत होता है. कोई व्यक्ति सिर्फ एक विशेष समुदाय की ही बात करता है और दूसरा देश के सभी 125 करोड़ लोगों की चिंता रखता है.

आरक्षण कोटे में आने की मानों होड़ सी लग गयी है. राजस्थान के गुर्जर, उत्तर प्रदेश के जाट और गुजरात के पटेल इसके प्रमुख उदाहरण है. हालांकि देखा जाए तो इन तीनों वर्गो को आरक्षण की विशेष जरूरत नहीं है.

गुजरात के हार्दिक पटेल ने मौजूदा समय में पटेलों के लिए आरक्षण की मांग करके राज्य में एक बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया. उनके इस आन्दोलन की गूंज अमेरिका तक पहुंची जहां आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी यात्रा पर गए हैं.

जबकि पटेल समुदाय अपने राज्य में तो आर्थिक रूप से मजबूत है ही उसने अपनी सफलता के झंडे विदेशों में भी गाड़े हैं.

आज चाहे किसान हो या नौकरीपेशा हर कोई अपने बेटे को एक अच्छी  job में देखना चाहता है. रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है.

शहरों में job सीमित हैं ऐसे में अगर आरक्षित कोटे की ही बात की जाय तो सभी को तो  job मिल नहीं सकता. ऐसे में बचे हुए बेरोजगार कहां जाएं. उस बचे हुए तबके के भविष्य के बारे में कोई चिंता नहीं कर रहा.

आज की तारीख में अगर देखा जाए तो देश को आरक्षण से ज्यादा जरूरत है  job क्रियेशन की और दूसरी जरूरत है स्किल की. बेरोजगारों को कोई नौकरी देने की बजाय उनको स्वतः रोजगार के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया जाय.

देश में पहले रोजगार के अवसर पैदा किये जायं फिर उस रोजगार के मुताबिक विद्यार्थियों की स्किल पर ध्यान दिया जाय. अगर ऐसा नहीं होता है तो चुनावों के समय में कुछ राजनेताओं के लिए आरक्षण ‘अन्धे के हाथ बटेर’ साबित होता रहेगा.

हालांकि इसी स्किल इंडिया और मेकिंग इंडिया की बात आज मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं और इसके लिए वह विदेशों में प्रयासरत हैं.

दामाद आखिर दामाद होता है. चाहे राजा का हो या प्रजा का. उनकी हर आरजू-मिन्नत पूरी की जाती है. उनकी अनचाही मुराद भी पूरी की जाती है और यही वजह की दामाद मनबढ़े-मनचढ़े हो जाते हैं.

एक दामाद की चर्चा हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा करते हैं. बल्कि यह कहे कि वह देश के सबसे नामचीन दामाद हैं. बदनाम भी हैं. एक नहीं कई मामलों में. पर वह इकलौते नहीं हैं. इन दिनों कई दामादों की चर्चा हो रही है. अलग बात है कि इनपर मोदी जी ने गौर नहीं किया. शायद उनकी नजर में गौर करने लायक ये नहीं हैं. या कहें कि ये विरोधियों के चहेते कम मनबढ़े हैं. हालांकि ये सब भी सास के चहेते ही हैं पर ससुर नाराज हैं. नाराजगी तो इस हद तक बढ़ गयी है कि एक के ससुर ने तो यहां तक कह दिया ‘ससुरा पगला गया है’.

अब बात साफ है. बात बिहार के तीन ‘ससुरों’ की है. ये हैं लालू, मांझी और पासवान. लालू जी के दामाद चुनावी मैदान में अपने ससुर के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं. पर बात दामाद की है. कहें तो क्या कहें, हालही में शादी की है. सोचा था बेटी की गांठ जोड़ कर गठबंधन कर लेंगे. लेकिन दांव उल्टा पड़ गया. बेटी की गांठ तो जुड़ गयी लेकिन महागठबंधन में दरार आ गई.

लालू जी की रणनीति फेल हो गई. बेटी का घर आबाद रहे तो उन्होंने अपने दामाद तेज प्रताप सिंह को होशियार कहना पड़ा. उन्होंने अपनी बेटी राजलक्ष्मी और दामाद तेज प्रताप सिंह को कह दिया है कि हमारा पक्ष नहीं लेना. उन्होंने अपनी बेटी को समझाया कि अपने परिवार का ख्याल रखना.

अब बात पासवान जी की करते हैं. ससुर की तरह दामाद को भी बिदकने की आदत है. सीट बंटवारे को लेकर पासवान बार-बार नाराज होते रहे. बार-बार उन्हें मनाया जाता रहा.

कहते हैं दामाद की चाल लोमड़ी की तरह होती है. मौका मिलते ही उनके दामाद ने ससुर (पासवान) की चाल समझ ली और उन्हीं पर चल दी. टिकट नहीं दिया गया है. तो ससुर से खफा हो गए. उनका खफा होना लाजमी भी. बेटे से ज्यादा दामाद प्यारा होता है. लेकिन यहां तो व्याकरण और गणित दोनों ही अलग है और सर्व विदित भी है.

अब बात तीसरे दामाद की. यानी जीतन राम मांझी की तरह उनके दामाद भी पल में तोला पल में माशा हैं. बात मनवाने के लिए रुठने-मनाने के खेल को अपने ससुर से ही सीखा है. अब ये अपने सुसुर के पैंतरे को उन पर ही लागू कर रहे हैं. मांझी ने उन्हें अंगूठा दिखाया तो पलटकर उन्होंने ससुर जी को ही आंखें दिखें दिखा दीं. अब वे उनके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए बोधगया से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे.

अपने दामाद की हरकत से क्षुब्ध मांझी को कहना पड़ रहा है ‘कोई पगला जाता है तो क्या किया जाये’. वैसे तो कहते हैं कि पारिवारिक रिश्ते राजनीतिक पेंचबंदियों से ऊपर होते हैं लेकिन वाह री राजनीति तू सत्ता के लिए जो न कराए सो कम है.