घटना फैजाबाद की है। एक लड़की को पंचायत के निर्देश पर लगभग दो महीने दूसरे के घर जमानत के तौर पर रहना पडा। उसका कुसूर कुछ  भी नहीं था फिर भी वह लगातार बलात्कार की त्रासदी झेलती रही। दरअसल उसका भाई गांव की एक लड़की को भगा ले गया। इस बात पर पंचायत बैठी और फरमान सुना दिया गया कि जब तक भागे हुए प्रेमी-प्रेमिका घर लौट नहीं आते तब तक उक्त पे्रमी की बहन प्रेमिका के घर में जमानत के तौर पर रहेगी। इस घटना के सभी पहलुओं पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में महिलाओं की बदहाल स्थिति साफ नजर आती है। आज भी यहाॅ की महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल पाना दूर की कौड़ी हैं।

एक बड़ी जनसंख्या में महिला केवल हाड़ मांस के पुतले की तरह समझी जाती है जो चहारदीवारी के अंदर रहकर दिन भर खटराज निपटाये और रात में मर्द की शारीरिक भूख शांत करे यानि घर में उसकी उपयोगिता एक मशीन की तरह ही है। उसकी अपनी कोई इच्छाएं न हों, उसे कुछ भी चुनने, तय करने, निर्णय लेने और बोलने का भी अधिकार नहीं हैं। वह केवल घर के मर्द की सम्पत्ति है। ऐसी सम्पत्ति जिससे जुड़ी होती है घर की ‘इज्जत’। अगर महिला अपने मन से कुछ भी करना चाहे  तो घर की इज्जत पर आंच आती है। अब फैजाबाद की घटना को ही लीजिए उस लड़की को पता था कि उसे प्रेम करने की इजाजत नहीं है। फिर भी उसने लीक तोड़कर अपने प्रेम को परवान चढ़ाया लेकिन जीवन भर प्रेमी का साथ नहीं मिल पायेगा ये जान कर दोनो घर से भाग गये। दोनो घरों के सामंती मानसिकता के मर्दो के अहम को चोट लगी और पंचायत हुई पंचायत के फैसले में खामियाजा भुगता एक बेकसूर लड़की ने। घर की ‘इज्जत’ बचाने के लिए उसे दूसरे को सौंप दिया गया रौंदने के लिए।

सवाल ये उठता है कि एक लोकतांत्रिक देश में कब तक इस तरह के पंचायती फरमान चलते रहेंगे। घर की ‘इज्जत’ के नाम पर लड़कियों और महिलाओं की जान लेने की वैसे भी उत्तर प्रदेश में परम्परा रही है। इस मामले में पश्चिम उत्तर प्रदेश काफी आगे है। गैर जाति के युवक से प्रेम करने की सजा यहाॅ युवती को सरेआम कत्ल कर दी जाती है। कातिल कोई और नहीं लड़की के घर वाले ही होते है। लड़की ने कैसे अपने दिल की बात मान ली, ये उन्हें गवारा नहीं है। घर की ‘इज्जत’ पर दाग लगा देने वाली लड़की के साथ कई बार घर वाले ही सामूहिक बलात्कार करते है और फिर मौत के घाट उतार देते है। ये घटनाएं गांव के अंदर ही दफन हो जाती है। कुछ घटनाएं जरूर अखबारों की सुर्खिया बनती है लेकिन आज तक दोषियों को सजा मिलने का कोई मामला सामने नहीं आया।

पश्चिम उत्तर प्रदेश में ‘इज्जत’ के नाम पर महिलाओं को मौत देने के एक से डेढ़ दर्जन मामले हर वर्ष पुलिसिया डायरी में दर्ज होते हैं लेकिन वास्तविकता में इन घटनाओं की संख्या ज्यादा होती है। एक एनजीओ ने केवल मुजफ्फरनगर में ऐसी घटनाओं के आंकड़े इकठ्ठे किये तो वर्ष 2003 में 16, 2004 में 14, 2005 में 16, 2006 में 12, 2007 में 10 ओर 2008 में 14 घटनायें सामने आयी। हर वर्ष लगभग 18-20 लड़किया लापता हुूई। ये जीवित है या इज्जत की भेंट चढ़ गयी पता नहीं चला। औरत यानी मर्द की सम्पत्ति, वह जब चाहे इस सम्पत्ति का उपभोग करें, जैसे वह इसे रखे और मुसीबत आये तो आगे कर दे।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ

एक ‘मां’  और उसके मातृत्व की कीमत आप कितनी लगायेंगे, ये सवाल सुनने में अटपटा लगेगा लेकिन पिछले लगभग बीस दिनों से ये सवाल मेरे जेहन  मंे कौंध रहा है। इसका जवाब बताने के पहले मैं इस सवाल की कोख के बारे में आपको बताती हूँ  दरअसल पिछले दिनों हील फाउण्डेशन के द्वितीय राष्ट्रीय हेल्थ राइटर एण्ड कम्युनिकेटर कनवेंशन के दौरान मैं गोधरा के समीप स्थित दाहोद (गुजरात) की सांसद और स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा0 प्रभा ताबियाड से मिली। उनसे मिलकर और बात कर लग ही नही रहा था कि एक आदिवासी महिला के खाते  में इतनी सफलताएं दर्ज हैं और उन्हें गुमान तक नहीं। बात चली तो हम महिला होने के अनुभव बांटने लगे लेकिन उनके अनुभवों की पोटली जैसे-जैसे खुलती गयी मेरे शरीर के रोएं खड़े होते गये। अब तक मुझें यह भ्रम था कि हिन्दी पट्टी (उत्तर प्रदेश बिहार आदि) में ही स्त्री होने की सजा मिलती है लेकिन विकास की दौड़ में काफी आगे चल रहे गुजरात में भी स्त्री होने की सजा कम नहीं है। गोधरा से चालीस किलोमीटर दूर की एक घटना सुनकर मुझे कवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों  ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी……….’ में घुला दर्द बहुत कम लगा। डा0 प्रभा बता रही थी और मेरी आंखों के सामने पूरी तस्वीर गड्डमड्ड हो रही थी। मात्र सत्रह बसंत देखने वाली एक आदिवासी बाला दर्द से तड़प रही थी और उसके नीचे बिछी चादर गंदगी से मैली है या खून से भीगी, यह पता लगाना मुश्किल था। उस गर्भवती महिला को तुरन्त खून चढ़ाने की जरूरत थी। जब उसके पति से खून देने को कहा गया तो उसने इनकार कर दिया। उसे डर था कि खून देने से उसे कमजोरी आ जायेगी। उसने पूछा कि क्या खून चढ़ाने से उसके बच जाने की गारन्टी है, उसे चालीस किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल तो नहीं ले जाना पड़ेगा। डा0 प्रभा ने कहा कि मैं पूरी कोशिश करूॅगी कि तुम्हारी पत्नी की जान बच जाये। फिर वह कुछ जोड़ने घटाने लगा और झटके से उठकर यह कहता हुआ जाने लगा कि अस्पताल ले जाने में पन्द्रह सौ रूपये खर्च हो जायेंगे इतने में तो दूसरी शादी कर लूंगा। ये मरती है तो मरने दो। डाक्टर ने जब उसे रोका कि इसके पेट में तुम्हारा बच्चा पल रहा है क्या तुम्हें उसकी जरा भी फिक्र नही है। मर्द ने बड़े गुरूर से कहा मैने अपना काम कर दिया बाकी इसकी किस्मत। डा0 प्रभा ने कहीं से खून की व्यवस्था कर उस महिला की जान बचाई। उनके पास ऐसी घटनाओं के इतने पन्ने हैं कि उन्हें इस ब्लाॅग में समेट पाना मुश्किल हैं लेकिन इन अनुभवों में जो दर्द और  बेबसी है उसे केवल इस पंक्ति से समझा जा सकता है कि यहाॅ के अधिकतर मर्दो के लिए उनकी बीवी एक यूज एण्ड थ्रो पेन की तरह है, उसकी तब तक उपयोगिता है जब तक उसमें स्याही है। बीवी की पूछ तब तक ही होती है जब तक वह हंसते-मुस्कराते सबकी सेवा टहल करती रहती है ओर उसके बीमार होते या बच्चा जनते समय जान जोखिम में पड़ते ही उसका मर्द पति उसे ‘थ्रो’ करने से गुरेज नहीं करता है। फिर नयी ‘पेन’ के साथ नयी जिन्दगी की शुरूआत, जिसमें थ्रिल है और मर्द होने का गर्व भी ।

रेखा सिनहा

राष्ट्रीय सहारा लखनऊ

 

 
माना जाता है कि राम का जन्म प्राचीन भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय का अनुमान सही से नही लगाया जा सका है…..कई शताब्दियों तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही। परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि राम का जन्म प्राचीन भारत में हुआ था। उनके जन्म के समय का अनुमान सही से नही लगाया जा सका है , कई शताब्दियों तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रही। परन्तु विशेषज्ञों का मानना है कि राम ( भगवान विष्नु जी के अवतार माने जाते है )का जन्म तकरीबन आज से ९,००० वर्ष (७३२३ ईसा पूर्व) हुआ था। आज के युग मे राम का जन्म, रामनवमी के रुप में मनाया जाता है। राम चार भाईयो में से सबसे बड़े थे, इनके भाइयो के नाम लक्षमण( भगवान शेषनाग जी के अवतार माने जाते है ),भरत ( भगवान ब्रह्मा जी के अवतार माने जाते है ) और शत्रुघन( भगवान शिवजी के अवतार माने जाते है ) थे। राम बचपन से ही शान्त स्वाभाव के वीर पुरूष थे । उन्होने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था । इसी कारण उन्हे मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है ।और इसी लिये चैत्र शुकल पक्ष की नवमी को उनका जन्म दिन बड़े धूम धाम से मनाया जाता है । कहते हैं अयोध्या के कण कण में राम हैं रामचरित मानस में इसका उल्लेख भी कि जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी….। उनका राज्य न्यायप्रिय और खुशहाल माना जाता था, इसलिए भारत में जब भी सुराज की बात होती है, रामराज या रामराज्य का उद्धाहरण दिया जाता है । धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनो भाइयों के साथ गुरू वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की । किशोरवय में विश्वामित्र उन्हे वन में राक्षसों द्धारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए लेगये । राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ हो गए । राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा तथा मारिच को पलायन के लिए मजबूर किया । इस दौरान ही विश्वमित्र उन्हे मिथिला लेकर गये । वहॉं के विदेह राजा जनक ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक समारोह आयोजित किया था । शिव का एक धनुष था जिसपर प्रत्यंचा चढ़ा देने वाले शूर से सीता का विवाह किया जाना था । बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे । बहुत से राजाओं के प्रयत्न के बाद भी जब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर धनुष उठा तक नहीं तब विश्वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्यंचा चढ़ाने की कोशिश की । उनकी प्रत्यंचा चढाने की कोशिश में वह महान धुनुष ही घोर ध्वनि करते हुए टूट गया । महर्षि परशुराम ने जब वह घोर ध्वनि सुनि तो वहॉं आये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्यक्त करने लगे । लक्ष्मण उग्र स्वाभाव के थे । उनका विवाद परशुराम से हुआ । तब राम ने बीच-बचाव किया । इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्त लोगो ने आर्शीवाद दिया । अयोद्या में राम सीता सुखपूर्वक रहने लगे । लोग राम को बहुत चाहते थे । उनकी मृदुल, जनसेवायुक्त भावना और न्यायप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी । राजा दशरथ वानप्रस्थ की ओर अग्रसर हो रहे थे अत: उन्होने राज्यभार राम को सौंपनें का सोचा । जनता में भी सुखद लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजा उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्त करनेवाले हैं । उस समय राम के अन्य दो भाई भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे । मंथरा, जो रानी कैकेयी की दासी थी, ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्हारे साथ गलत कर रहें है । तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चाहते हैं ।राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीः कौशल्या,सुमित्रा और कैकेयी। राम कौशल्या के पु्त्र थे, सुमित्रा के दो पु्त्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पु्त्र भरत थे। कैकेयी चाहती थी उनके पु्त्र भरत राजा बनें, इसलिए उन्होने राम को, दशरथ द्वरा, १४ वर्ष का वनवास दिलाया। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता, और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे। वनवास के दौरान लंका के राजा रावण ने मां सीता का धोखे से हरण किया ।और अपनी सोने की लंका में उठा ले गया। आखिर कार कुछ समय बाद श्रीराम ने रावण का वध कर लंका के लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई।भगवान राम ने विभीषण को लंका का राजा बाना दिया. राम , सीता , लक्ष्मन और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या को प्रस्थान कर गए. ।राम समाज के आदर्श थे अयोध्या के लोगों के चरित्र में में वो समाहित थे ।
समाज में राम के आदर्श इस प्रकार प्रसारित होने चाहिये कि वे केवल ज्ञान विलास की वस्तु बनकर ही न रह जायें, बल्कि ये आदर्श, व्यक्ति के चरित्र में सम्माहित हों। जब तक मनुष्य में दैवीय गुण जाग्रत नहीं होंगे, उनमें मानवीयता का भाव नहीं आयेगा। हमारी संस्कृति में भगवान श्रीराम को जन-जन का नायक माना गया है। श्रीराम में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के गुण विराजमान हैं। मनुष्य रूप में उनके जैसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति विरले ही मिलते हैं। भगवान श्रीराम ने जन-सामान्य को स्वतंत्रता से अधिक मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने सदैव कत्तव्यों का निर्वाह करने का आदर्श प्रस्तुत किया। यह बात उनके चरित्र में इस तरह प्रकट होती है कि वे अपनी प्रजा की आकांक्षाओं को देखते हुए अपने पारिवारिक सुखों का त्याग करने से भी नहीं चूके।रामकथा भारतीय संस्कृति का प्राण है।प्रभु श्रीराम के चरित्र को जिसने अपनाया उसका उद्धार हो गया।
राम की जन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर बसा है। प्राचीन काल में इसे कौशल देश कहा जाता था। अयोध्या हिन्दुओं का प्राचीन और सात पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। अथर्ववेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है। कई शताब्दियों तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। अयोध्या मूल रूप से मंदिरों का शहर है। यहां आज भी हिन्दू, बौद्ध, इस्लाम और जैन धर्म से जुड़े अवशेष देखे जा सकते हैं। जैन मत के अनुसार यहां आदिनाथ सहित पांच र्तीथकरों का जन्म हुआ था या यूं कहें की श्री राम की नगरी अयोध्या श्रदालुओं के लिये रामनाम लेकर मोक्ष की एक राह बन चुकी है ।अयोध्या नरेश प्रभुराम का मर्यादित चरित्र पूरे संसार का एक प्रेरणा श्रोत है । इसी लिये अयोध्या की महिमा अपरम्पार है । कहते हैं उन्होंने धरती पर लोगों के कल्याँ करने के लिये ही जन्म लिया । आज भी राम जीव और जगत में परम प्रकाशक हैं …वे आदिकाल से लोगों के नायक थे …आज हैं और आगे भी रहेंगे….बस अगर मनुष्य उनके मर्यादित आचरण को अपना ले तो उसका उद्धार तो निश्चित ही है लोक जीवन के सांस्कृतिक संदर्भ में राम आज एक मिथक बन चुके हैं ….राम नवमी पर आप सभी को सुभकामना
संजय अरोरा
राष्ट्रीय सहारा,
लखनऊ

दुनिया के लिए तो दूर, भारत या पाकिस्तान के लिए भी उनकी कोई अहमियत नहीं रह गई थी. लाखों करोड़ों लोगों की ही तरह जब वो पैदा हुए थे उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कुछ ही वर्षों बाद वक़्त क्या करवट लेने वाला है.

और सचमुच समय का पहिया कुछ ऐसे अनपेक्षित अंदाज़ में घूमा कि जैसे इतिहास या वक़्त ही नहीं बल्कि पूरी ज़िंदगी ही काँप गई थी.

बहरहाल, शनिवार, 17 मार्च 2012 को दुनिया को अलविदा कहते समय इस व्यक्ति की ज़ुबान पर सारी वही कहानियाँ या घटनाएं थीं जो देश आज़ाद या विभाजन के समय थीं.

वक़्त उनके लिए जैसे थम गया था या मुड़कर फिर से उसी पड़ाव पर पहुँच गया था जब एक ही भारत हुआ करता था, यानी पाकिस्तान नहीं बना था.

मगर हक़ीक़त को कैसे झुठलाया जा सकता है. हालाँकि हक़ीक़त ये थी कि उनकी अंतिम घड़ियाँ नज़दीक आ पहुँची थीं लेकिन उनकी ज़ुबान पर यही पुकार थी कि उन्हें उसी घर की झलक दिखा दी जाए जहाँ उनका भरा पूरा ख़ानदान 1947 तक रहा करता था.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान की पैदाइश 1935 की थी. यानी 1947 में उनकी उम्र लगभग 12 साल थी जब इस अल्हड़ उम्र में उन्हें पहाड़ जैसे बोझ ने दबा लिया था.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान उर्फ़ नफ़ीस की कहानी भी लाखों करोड़ों हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों से अलग नहीं है जिन्होंने विभाजन होते देखा और ज़िंदगी भर ये दर्द उनके सीने से किसी गोह की तरह चिपटा रहा और मरते दम तक नहीं छूट सका.

क़रीब 77 वर्ष की ज़िंदगी जीने के बाद भी जब मौत नज़दीक आई तो जैसे वो टीस फिर से हरी हो गई और आख़िरी इच्छा रही कि काश, समय मुड़कर फिर से वहीं पहुँच जाए जैसाकि 1947 के उस ख़ास दिन से पहले हुआ करता था.

हालात चाहे सआदत हसन मंटो के टोबा टेक सिंह के हों, ए ट्रेन टू पाकिस्तान या पिंजर के, इस तरह की मुश्किल ज़िंदगियाँ जिसने जी हैं, दर्द, तकलीफ़ और खोने की टीस का अंदाज़ा और कोई नहीं लगा सकता.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान भी बग़ावत नगरी कहे जाने वाले मेरठ में अपने भरे पूरे परिवार के साथ रहते थे. परिवार में सबसे छोटे थे, तो ज़रा लाडले भी. परिवार के सभी सभी सदस्य ख़ासे पढ़े लिखे थे और अंग्रेज़ी सरकार के समय में ही नौकरी पेशा भी हो चुके थे.

ख़ासा बड़ा घर था इसलिए ठाठ बाट से रहने की आदत भी थी. मुश्ताक़ चूँकि किशोरावस्था में क़दम रख ही रहे थे, इसलिए दुनिया और ज़िंदगी की हक़ीक़तों से बेख़बर और ग़ाफ़िल भी थे. या यूँ कहिए कि वो उम्र नहीं थी ये सब सोचने की.

बहरहाल, अचानक बँटवारे का डंका बजा और जैसे सबकुछ बदल गया. मुश्ताक़ शहर में कहीं अपने दोस्तों के साथ अठखेलियाँ करने हुए निकले थे कि अचानक शहर में दंगे भड़क उठे और कर्फ़्यू लग गया. ऐसी अफ़रा-तफ़री मची कि जो जहाँ था, वहीं जान बचाने के लाले पड़ते दिखे.

हैवानियत का ऐसा खेल शुरू हुआ कि दोस्त दुश्मन में बदल गए, हालाँकि कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने दुश्मनी की चादर फेंककर दोस्ती का लिबास पहना तो इंसानियत ने राहत की साँस भी ली.

कुछ ऐसी ही चादरों ने मुश्ताक़ को इस दुनिया में अकेला होते हुए भी, अकेलापन महसूस नहीं होने दिया. ख़ैर ऐसे माहौल में अपने घर पहुँचने का तो सवाल ही नहीं था इसलिए एक रिश्तेदार बुज़ुर्ग औरत के घर में पनाह लेना बेहतर समझा.

ये वो घर था जहाँ वो कभी-कभार सुस्ताने और बुज़ुर्ग ख़ातून का लाड-प्यार पाने की लालसा में आ जाया करते थे. इसलिए वो भी जैसे उनका दूसरा घर ही बन गया था. उन्हें क्या मालूम था कि नियति ने उनके लिए वो कुछ लिख दिया था जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी की नहीं होगी.

ज़ाहिर सी बात है कि उस ज़माने में संपर्क के टेलीफ़ोन जैसे साधन तो थे नहीं, इसलिए बाज़ लोगों को तो ये भी पता नहीं चला कि वक़्त की उस बेरहम अंगड़ाई में कौन जीवित बचा या किसे दुनिया से ज़बरदस्ती रुख़सत कर दिया गया.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान के लिए उन बुज़ुर्ग़ रिश्तेदार के घर से निकलना जान जोखिम में डालना था, लेकिन कुछ हफ़्तों बाद जब हिम्मत करके निकले तो, जो हुआ उसे देखकर उनके होश उड़ गए.

मुश्ताक़ जब अपने घर से निकले थे उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था फिर कब और किस हालत में आना होगा. जब पहुँचे तो वो घर उनका नहीं बचा था. उस घर ने मुश्ताक़ से आँखें फेर ली थीं और पहचानने से इनकार कर दिया.

वो घर जहाँ मुश्ताक़ पैदा हुए, जहाँ उनके भरे पूरे ख़ानदान की आवाज़ें और ठहाके गूँजते थे, जिसने मुश्ताक़ को भी पैदा होते ही अपनी आग़ोश में जगह दी, लेकिन वक़्त ने फ़िज़ाँ में इतनी बेरहमी घोल दी थी, कि जो भी अपना था, पराया हो गया या पराया लगने लगा.

बहरहाल, उस घर में मुश्ताक़ को दाख़िल होने की इजाज़त नहीं मिली क्योंकि पूरा ख़ानदान रातों-रात खींची गई विभाजन रेखा के उस पार यानी पाकिस्तान चला गया था.

नियमों के अनुसार वो घर किसी और ख़ानदान को आबंटित कर दिया गया था और जैसा कि बाद में पता चला, मुश्ताक़ के ख़ानदान को पाकिस्तान के कराची में रिहायश मिल गई थी. लेकिन मुश्ताक़ के हिस्से में क्या आया?

ये बात और थी कि या तो मुश्ताक़ भी अपने पूरे ख़ानदान के साथ पाकिस्तान चले जाते या फिर उनका पूरा ख़ानदान यहीं रहता तो हालात कुछ और होते. ये बहस का मुद्दा नहीं है कि मुश्ताक़ का पूरा ख़ानदान पाकिस्तान जाकर अच्छा रहा या भारत में ही अच्छा रहता, मुद्दा ये है कि 12 साल का एक अपरिपक्व लड़का अगर पूरे ख़ानदान से बिछड़ जाए तो उसके दिमाग़ और दिल की कैफ़ियत समझने के लिए कुछ अलग समझदारी की ज़रूरत होगी.

अब मुश्ताक़ के सामने हिमालय से भी बड़ी चुनौती ये थी कि ज़िंदगी को कैसे जिया जाए, जिया भी जाए या नहीं. ये एक ऐसा फ़ैसला था जो किसी के लिए भी मुश्किल था. बल्कि सच कहा जाए तो ये चुनौती मुश्ताक़ के ही सामने नहीं बल्कि उन हज़ारों लोगों के सामने थी जिन्हें सदियों से बसी-बसाई ज़िंदगी को छोड़कर सीमा को लांघना पड़ा था.

12 साल के बच्चे को कौन सहारा देता, वो भी ऐसे माहौल में जहाँ ख़ुद का वजूद बनाए रखना हर किसी के लिए हर दिन की चुनौती थी. वजूद बनाए रखने की इस जद्दोजहद में मुश्ताक़ के सामने दो रास्ते थे, वैसे सच कहें तो एक ही रास्ता बचा था और वो ये कि शिक्षा को जारी रखना तो संभव ही नहीं था, इसलिए रोज़ी-रोटी चलाने के लिए जो भी काम मिला करना शुरू कर दिया.

शुरू में तो उन्हें भी यही उम्मीद थी कि एक दिन वो भी पाकिस्तान जाकर अपने ख़ानदान के साथ बस जाएंगे लेकिन वक़्त ने फिर करवट बदली और उनकी ये ख़्वाहिश पूरी ना हो सकी.

बताते थे कि वो जब भी पाकिस्तान जाते थे तो उनकी माँ तब तक दरवाज़े पर खड़ी होकर देखती रहती थीं जब तक वो उनकी आँखों से ओझल नहीं हो जाया करते थे.

और हर बार यही कसक दिल में रहती थी कि अब न जाने एक दूसरे को फिर देख सकेंगे या नहीं. जब तक माँ-बाप और भाई बहन रहे तो उन्होंने और उनके कुछ बच्चों ने ताल्लुक़ात रखे और आना जाना भी रहा, लेकिन ये सिलसिला ज़्यादा दिनों तक ना चल सका, ख़त भी आने बंद हो गए और फिर तो कभी-कभार टेलीफ़ोन से ही बात हो जाती थी, जो थोड़े समय बाद बंद हो गई.

1947 में जब मुश्ताक़ का सामना ज़िंदगी की कठोर हक़ीक़त से हुआ तो 12 साल की उम्र वैसे भी रूमानी ख़यालों में जीने की ही होती है और मुश्ताक़ हुसैन ख़ान भी उर्दू और फ़ारसी के शेर पढ़ने में दिलचस्पी रखते थे जिनमें कुछ फ़लसफ़ाना पुट भी होता था.

बाद में ये शेर उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए लेकिन इसी दानिशमंदाना अंदाज़ ने उन्हें एक सच्चा और ईमानदार इंसान बनाया जिसने कभी भी लालच को अपने दिल में नहीं घुसने दिया.

हमेशा दूसरों की मदद की और ज़िंदगी भर हमेशा इस बात की ही भरसक कोशिश करते रहे कि अनजाने में भी किसी का रत्ती भर भी नुक़सान ना हो जाए. तालीम के बहुत बड़े हिमायती थे मुश्ताक़ हुसैन ख़ान.

ख़ुद तो हालात की सितमज़रीफ़ी की वजह से नहीं पढ़ सके मगर इकलौती बेटी को समाज के तमाम तानों और उलाहनों के बावजूद उच्च शिक्षा दिलाई. लेकिन मरते दम तक किसी का अहसान लेने का क़याल ही उनकी रूह को हिला देता था इसलिए बेटी-दामाद के इंग्लैंड आकर बसने के न्यौते को भी क़बूल नहीं किया.

यूँ तो बात बहुत लंबी हो जाएगी लेकिन असल बात ये है कि जब मुश्ताक़ हुसैन ख़ान की मौत की घड़ियाँ नज़दीक आईं तो वो एक बार फिर से 1947 के दिनों में वापिस चले गए लगते थे.

वो सारी वही बातें याद कर रहे थे जो 77 साल पहले पीछे छूट गई थीं. उन्हें पाकिस्तान में बसे और दुनिया छोड़ चुके सारे रिश्तेदार उसी शिद्दत से याद आए और वो घर भी जहाँ उनके सिर्फ़ 12 साल गुज़रे थे लेकिन वो 12 साल बाक़ी 65 साल से अलग थे.

ज़माना बहुत आगे बढ़ चुका है, अब तीसरी पीढ़ी परवान चढ़ चुकी है, नई उम्मीदों और मूल्यों के साथ. पुरानी पीढ़ी अपने मूल्यों के साथ भी पुरानी पड़ गई लगती है जहाँ ईमानदारी, भलमनसाहत, दूसरों का भला चाहने और करने की आदत को बेवकूफ़ी क़रार दे दिया गया है.

लेकिन मुश्ताक़ हुसैन ख़ान ने ना सिर्फ़ इन मूल्यों को कभी छोड़ा बल्कि अपनी पत्नी और औलाद को भी इन्हें ना छोड़ने की विरासत करके गए हैं.ये और बात है कि भारत पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व 65 साल पुरानी इस टीस को कभी समझ पाएगा जो मुश्ताक़ हुसैन ख़ान जैसे लाखों-करोड़ों लोगों की रही है जिनमें से ज़्यादातर तो इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं और जो कुछ होंगे, वो भी ज़्यादा दिन इस दुनिया के सूरज की रौशनी नहीं देख सकेंगे.

लेकिन एक बड़ा सवाल सभी की आँखों में चमकता रहता है कि 1947 में जो कुछ हुआ क्या उससे इंसानियत का कुछ भला हुआ है. अगर वही एक मात्र समस्या का हल था तो इन 65 वर्षों में अनगिनत लोगों की जानें क्यों गई हैं और अब भी ये सिलसिला रुका नहीं है.

मुश्ताक़ हुसैन ख़ान जैसे बुज़ुर्गों की सूनी आँखों में आख़िरी हिचकी तक मौजूद रहे इन सवालों का जवाब किसी के पास हो तो मेहरबानी करके ज़रूर पेश कीजिएगा, बहुत मेहरबानी होगी.

महबूब ख़ान
लंदन से

rang he rang

होली के रंग ……..

 

होली का त्योहार या यूं कहें रंगों और उमंगो का त्योहार । फागुन की शुरूआत के साथ ही मन में उल्लास, हंसी- ठिठोली की बयार बहने लगती है। होली के रंगों का खुमार हर किसी पर छाया हुआ है, चंचल मन एक बार फिर से बचपन में लौट जाने को मचलने लगता है। होली के हुड़दंग की बचपन की यादें अमिट होती हैं। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है मन बचपन की यादों में डूबता जाता है और होली की यादों से मैं खुश हो लेता हूं। ज़माना कितना बदल गया है– रंगों के डर से लोग अब घरों से ही नहीं निकलते। दलीलें तमाम, मुझे कल दफ्तर में मीटिंग अटेंड करनी है, मैं होली को पसंद ही नहीं करती, मेरी स्किन सेंसिटिव है और न जाने क्या-क्या। ऐसे में मुझे याद आता है उत्तर प्रदेश का छोटा सा शहर अयोध्या। इसी शहर में मैं पैदा हुआ और मेरी शुरुआती परवरिश हुई। मुझे याद आता है कितना उत्साह होता था हमारे मन में, कितना इंतज़ार करते थे हम रंगों के इस त्यैहार का। मुझे याद आता है कैसे पूरा परिवार मिलकर सारी रात गुजिया बनाया करता था। इसके अलावा और भी कितने ही व्यंजन बनते थे। लेकिन ये सब अब अतीत की बातें हैं जिनकी सिर्फ कल्पना मात्र ही की जा सकती है। अब ये सब कहां होता है। कहां इक्ट्ठा होता है पूरा परिवार और कौन जागता है रात भर। मुझे ही देखिये ना। अब मैं दिल्ली आ गया हूं। मैने चाहा कि बचपन की परंपरा को जारी रखूं, लिहाज़ा बहुत हिम्मत जुटाकर अपनी पत्नी से कहा चले मिलकर रात भर गुजिया बनाते हैं– होली करीब है। इतना कहना था कि साहब मत पूछिये। फौरन जवाब मिला रात भर जगाकर गुजिया बनवा लो या फिर नौकरी ही करवा लो। लेकिन मेरे मुरझाए चेहरे को देखकर श्रीमती जी को जाने क्या सूझी, फौरन 500 का नोट मेरी हथेली पर रख दिया और कहा बाज़ार में तो सब कुछ रेडीमेड मिलता ही है, कल ले आना। मैने भी सोचा बात तो श्रीमती जी ठीक ही कह रही हैं। भइया दिल्ली में रह रहे हैं दो बच्चे हैं काम तो नौकरी ही चला रही है । सो घर की गुजिया तो भूलनी ही पडेगी।लेकिन मन है कि मानता नहीं। बचपन के दिन भी क्या दिन थे। याद आता है अयेध्या नगरी के बाबा और साधु जो तुकमलंगा, ईसबगोल की भूसी जो रंग में घोल कर होली खेलने निकली टोलियों के ऊपर डाल देते थे। मम्मी-पापा पहले से सावधान कर देते थे बेटा बदन पर कड़वा तेल मल लो नहीं तो रंग नहीं छूटेगा। मुझे याद आता है मैं दो-दो पैंट पहनकर होली खेलने निकलता था ताकि कपड़े फटें भी तो मैं किसी तरह अपनी इज़ज़्त बचा ले जाऊं। मुझे याद आती है वो होली कैसे जानवरों के लिये बनी चरही में पानी भरकर रंग घोल दिया जाता था। शायद ही कोई ऐसा होता जिसे उसमें डुबोया न जाता हो। और अगर पड़ोस की भाभी आ जाएं तो फिर क्या, होली का रंग और सुर्ख हो जाता था। जैसे- जैसे दिन बढ़ता कपडा फाड़ होली की शुरूआत होती जाती थी। शाम ढलते ही पिताजी के साथ मैं नये कपड़े पहन उनके दवाखाने (पिताजी डॉक्टर थे ) जाता था जहां परिचतों का होली मिलन होता था। और देर शाम पिताजी हम सबको अयोध्या के राजा साहब के यहां होली मिलाने ले जाते थे। समय धीरे-धीरे बीतता गया और मैं बालक से युवा हो गया। अब होली खेलने का अंदाज़ भी थोड़ा बदल गया था। याद करके हंसी आती है जब मैंने होली के मौके पर ही पहली बार सोमरस पी ली थी सोमरस तो समझ ही गये होंगे । पर इसकी एक ख़ास वजह भी थी। उन दिनों दो-तीन लोग मुझे बहुत परेशान करते थे। मुझे कुछ ‘हितैषियों’ ने सलाह दे डाली कि अगर थोड़ा पी कर परेशान करने वालों को चंद गालियां बक दोगे तो कोई बुरा भी न मानेगा और तम्हारा काम भी बन जाएगा। बस फिर क्या था, मुझे बात रास आ गई। सोमरस के दो घूंट हलक के नीचे क्या गए गालियां एकाएक ही बाहर आने लगीं। लेकिन बाद में न जाने किस ‘दोस्त’ ने बात घर तक पहुंचा दी और फिर क्या हुआ, लिखने की ज़रूरत नहीं समझता। समझ गये होंगे( वैसे में अब सोमरस का सेवन अब नहीं करता) लेकिन अब समय बदल गया। अब मैं खुद पिता हूं। होली के आते ही मन करता है मेरे बच्चे भी कुछ उसी तरह होली खेलें जैसे मेरे बचपन में होती थी। लेकिन जो बच्चे कबूतरखाने समान अपार्टमेंट संस्कृति में जन्में और पले हैं उन्हें भला उन्मुक्त मन की क्या समझ। उन्हें चाहिये इंपोर्टेड पिचकारी क्योंकि पड़ोस के बच्चों के पास वैसी ही है। स्टेट्स सिंबल का भी मामला जो ठहरा ,मिठाई भी चाहिये जनाब, पर घर की बनी नहीं। वो ले जाते हैं शहर की नामचीन दुकान पर और पैक होकर घर आ जाते हैं चंद डिब्बे। बस लीजिये हो गई होली। बहरहाल, इस आधुनिकता के बीच एक छोटी सी परंपरा जारी रखने में मुझे ज़रूर सफलता मिली है। मेरी पत्नी रात सोते समय ही हम सबके चेहरों पर हल्के रंग से कुछ कलाकारी कर देती है। और इस तरह घर से ही शुरू हो जाती है सुबह उठकर रंग खेलने की परंपरा। परंपराएं तो होती ही हैं निभाने के लिये। सो निभाए जा रहा हूं। उम्मीद है समाज में ऐसी परंपराएं निभाई जाती रहेंगी और हमारे त्यौहार हमेशा ही जीवित रहेंगे।लखनऊ की होली किस तरह होगी नहीं मालूम ……महंगाई की मार इस बार कितनी मीठास देगी…पता नही…….पर टेंसन नहीं करें. होली के रंगों का खुमार हर किसी पर छाया हुआ है, अब किंगफिशर से गर्ल पूनम पांडे ने भी यह तय किया है कि वो अपने फैन्स के साथ ट्विटर पर होली खेलेंगी…  होली के रंग में कैसे रंगी हैं पूनम पांडे … पूनम ने अपने फैन्स को होली के इस मौके पर होली का गिफ्ट देते हुए अपनी कुछ और  nude तस्वीरे ट्विटर पर शेयर की हैं … javan bujurago  पूनम पांडे ने अपने फैन्स को होली के इस इसके बाद पूनम लिखती हैं कि जब डर्टी प्ले ऑफ पूनम पांडे आता है। तब तक थोड़ा सा और काइंतजार और आपके लिये ये होली की  nude तस्वीरे….. ट्विटर मिशन पर और जोश के साथ ही होली के रंग में कैसे रंगी हैं पूनम पांडे .. इसके बाद भी पूनम के हौसले पस्त नहीं हुए वो अपने ट्विटर मिशन पर और जोश के साथ ही….. अपने … javan bujurago  होली के जोश में होली का गिफ्ट है। पर जरा संभल के 

 ……. आप सबको होली की ढेर सारी शुभकामनाए

संजय अरोरा
राष्ट्रीय सहारा,
लखनऊ

 

 

 बुढ़ापे में अकेलापन सज़ा या अभिशाप …? आज ये एक चिंता का विषय बनता जा रहा है …..अकेलापन और अकेला होना एक समान बात नहीं है नहीं है. बहुत से लोग अनेक बार परिस्थितियों के कारण या इच्छा से अकेले हो जाते हैं. अगर यह व्यक्ति के नियंत्रण में है तोव्यक्तियों के रूप में उनके विकास में, मानव जन्म के समय ही अलगाव की प्रक्रिया हो जाती है जो वयस्कता की ओर बढ़ रही स्वतंत्रता के साथ जारी रहती है. वैसे तो, अकेला महसूस करना एक स्वस्थ भावना है और वास्तव में एक अवधि का एकांतवास करना लाभदायक भी हो सकता है अकेला होना एक सकारात्मक, सुखद और भावनात्मक रूप से तरोताज़ा करने वाला अनुभव हो सकता है. अकेला होने और अन्य लोगों से परे रहने की अवस्था एकांत है और अक्सर इसका अर्थ अपनी इच्छा से अकेले होना है. . अकेलापन अनुभव करने के लिए अकेले होने की आवश्यकता नहीं है इसे भीड़ भरे स्थानों में भी अनुभव किया जा सकता है. इसे पहचान, समझ, या दया का अभाव के रूप में वर्णित किया जा सकता है. अकेलेपन को अन्य व्यक्तियों से अलगाव की भावना के रूप में वर्णित किया जा सकता है, भले ही कोई शारीरिक रूप से दूसरों से अलग हो या नहीं. इसे प्यार या साहचर्य की तड़प के रूप में वर्णित किया जा सकता है जो अधूरी है लेकिन जो अप्राप्य है या किसी के जीवन में प्यार की कमी से पैदा हो और इसलिए अस्वीकृति, निराशा और आत्म सम्मान की कमी जैसी भावनाओं को जन्म दे. पर हम बात कर रहें बुजुर्गों की आधुनिकता की दौड़ में तेजी से बदलते जीवन मूल्यो का बुजुर्गों पर बेहद असर पड़ा है जो अपने थे वो अपनों के लिये आज बोझ बन गये हैं। …दम तोड़ती मानवीय संवेदनाओं की पीड़ा उन्हैं एक ना एक दिन पहुंचा ही देती है वृद्धाआश्रम के दरवाजे तक… । वृद्धाआश्रम जाते वक्त भले माता पिता की आंखे भर आती हैं और मन कहता है लगता है मैने बेटे की परवरिश में कोई कमी कर दी … या कहीं मैने पुत्र पर आश्रित रहने का सपना देखा लिया था । ….जिस पेड़ को इतने जतन से लगाया आज वही पेड़ बड़ा हो चुका है पर उसकी छांव शायद मेरे नसीब में नहीं । दर्द तो अपने जिगर के टुकड़े से बिछुड़ने का तो होता है पर कर भी क्या सकते है। पर फिर भी हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद दे रवाना हो जाते हैं उस आश्रम की तरफ जहां उनके जैसे ना जाने कितने बुजुर्ग अपने अपने टूटे हुये सपनो को लेकर जी रहे हैं । पर यहाँ अकेलेपन का अनुभव त्याग, अस्वीकृति, निराशा, असुरक्षा, चिंता, नैराश्य, अर्थहीनता और आक्रोश की भावनाओं में फलीभूत हो सकता है.अगर ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें तो वे दुर्बल बना सकती हैं और प्रभावित व्यक्ति को स्वस्थ रिश्ते और जीवन शैली विकसित करने से रोकती हैं.अगर व्यक्ति को विश्वास हो जाए कि वह प्यार के अयोग्य है .सामाजिक संपर्क से कतराने, आत्मसम्मान में कमी, सामाजिक वियोग में उसकी पीड़ा को जनम देतेहैं. अकेलेपन कई कारणों से अनुभव कर सकते हैं और जीवन की कई घटनाएं इसके साथ जुड़ी हैं. बचपन और किशोरावस्था के दौरान मैत्री संबंधों का अभाव या किसी व्यक्ति के आसपास सार्थक लोगों की शारीरिक अनुपस्थिति अकेलेपन, अवसाद ….. तलाक या अलगाव या किसी भी महत्वपूर्ण दीर्घकालिक रिश्ते के खत्म होने के परिणामस्वरूप यह बहुत ही आम है हालांकि आम तौर पर अस्थायी होता है. मै एसे कई लोंगो को जनता हूँ जीवन में किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को खोने के से अकेला महसूस करते है……. पर आज बुजुर्ग के हालत सबसे खराब है ….गुमनाम भीड़ में बजुर्ग अलग महसूस करता है …..परिवार में गुमनाम पुराना गुलदस्ता बन कर रहा गया है अकेलापन एक गंभीर, जानलेवा स्थिति है. बजुर्ग में अकेलापन मदात्यय में भूमिका निभा सकता है. बच्चों के, सामाजिक संपर्क की कमी का सीधा संबंध असामाजिक व्यवहार से है नेटवर्क वाले मरीजों को बेहतर चिकित्सीय देखभाल प्रदान करते हैं.अकेलापन संज्ञान और इच्छा शक्ति को क्षीण करता है, प्रतिरक्षा कोशिकाओं में डीएनए प्रतिलेखन बदल देता है और समयातीत होने पर उच्च रक्तदाब का कारण बनता है अकेलापन …. सामाजिक अपर्याप्तता की भावनाओं का आह्वान कर सकता है. अकेला व्यक्ति मान सकता है कि उसमें ही कुछ गड़बड़ है और कि कोई उसकी स्थिति को नहीं समझता. इस तरह का व्यक्ति आत्मविश्वास खो देता है और सामाजिक अस्वीकृति के डर से बदलने की कोशिश या नई चीज़ें आज़माने का प्रयास करने का अनिच्छुक होगा.जब माता पिता अपने बच्चों की खातिर सिर्फ उनके आनंदों के कई बलिदान किया है, यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी उनके बुढ़ापे में अपने माता पिता के बाद देखो, जब वे हमें सबसे ज्यादा जरूरत नहीं है हमारे शास्त्रों का कहना है, हमारे माता पिता परमेश्वर के अवतार हैं. क्या हम हमारे जीवन में हमारे माता पिता के बाद देख कर कुछ भी खोने? बिल्कुल नहीं. इसके अलावा यह अपने बूढ़े माता पिता के बाद देख कर बहुत satisfication और खुशी देता है . इस कारण के लिए आप उन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए जब वे तुम्हें सबसे ज्यादा जरूरत है. अपने माता पिता के बगल में खड़े क्योंकि वे आप के साथ एक सपना देखा था, वे तुम्हारे लिए इतना किया. सबसे महत्वपूर्ण क्या आप आज कर रहे हैं केवल अपने माता पिता के लिए दुनिया में और किसी को नहीं है . अपने माता पिता को देखो चेहरा और एक बार लगता है कि आप उनके लिए क्या कर सकते हैं और क्या आप उन्हें खुश करने के रूप में वे आप हँसते था. दृश्य एक बार सोचो जब वे नीचे घुटना टेककर करने के लिए आप सवारी दे और तुम हँसते घोड़े बन गया . आधुनिकता की दौड़ में तेजी से बदलते जीवन मूल्यो का बुजुर्गों पर बेहद असर पड़ा है जो अपने थे वो अपनों के लिये आज बोझ बन गये हैं। …दम तोड़ती मानवीय संवेदनाओं की पीड़ा उन्हैं एक ना एक दिन पहुंचा ही देती है वृद्धाआश्रम के दरवाजे तक… । वृद्धाआश्रम जाते वक्त भले माता पिता की आंखे भर आती हैं और मन कहता है लगता है मैने बेटे की परवरिश में कोई कमी कर दी … या कहीं मैने पुत्र पर आश्रित रहने का सपना देखा लिया था । ….जिस पेड़ को इतने जतन से लगाया आज वही पेड़ बड़ा हो चुका है पर उसकी छांव शायद मेरे नसीब में नहीं । दर्द तो अपने जिगर के टुकड़े से बिछुड़ने का तो होता है पर कर भी क्या सकते है। पर फिर भी हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद दे रवाना हो जाते हैं उसआश्रम की तरफ जहां उनके जैसे ना जाने कितने बुजुर्ग अपने अपने टूटे हुये सपनो को लेकर जी रहे हैं । कुछ तोउम्मीद रखते हैं कि शायद एक दिन बेटा मुझे यहां से ले जायेगा पर कुछ ने इसी ओल्डएज होम को ही अब अपना घर मान लिया है ।बेटे बहु के दिये दर्द के आंसू भी अब सिर्फ आंखों में आकर रूक जाते हैं क्योकि शायद उनको भी लगता है इनके छलकने का कोई असर नहीं होगा पर पुत्र मोह का मकड़जाल इन्हैं यादों के अतीत से बाहर नहीं आने देता । क्या इतना ही दर्द उन बेटे बहुओं को भी होता होगा ?… आधुनिकता के बदलते दौर में शायद आज माता पिता का प्यार उनका स्नेह उनके अपने जने बच्चे ही जिस वक्त पैरों तले कुचलते हैं तो कितनी पीड़ा होती होगी इन बुजुर्गों को । फिर भी बुजुर्ग इसे ईश्वर की नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं । कहते हैं इंसान जब बुजुर्ग हो जाता है तो एक बार फिर बच्चे की तरह हो जाता है और फिर देखभाल की जिम्मेदारी होती है उनके बच्चों की। पर शादी होते ही पत्नी अपनी लाइफ स्टाइल चेंज करना चाहती है जिसमें ये बुजुर्ग उन्हैं मखमल की चादर पर टाट का पैबंद लगने लगते हैं । जीवन की ढ़लती शाम में ना जाने कितने बुजुर्ग कमजोर और थकते शरीर को लेकर कितनी बिमारियों ,डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं । पर फिर अकेले पन के भंवर जाल में जकड़े ये बुजुर्ग माता पिता की आंखे भले ही पल पल इंतजार में पथरा जाती हों पर , आंखे भी पथरा जाती हैं पर फिर भी एक आस तो रहती ही है । पर एक दिन इन्हीं अधूरे सपनों को लिये वो जीवन को अलविदा कह देते हैं … भारत में भी अब पश्चिमी समाज की तरह बुजुर्ग पीढ़ी में अकेलेपन की भावना तेजी से बढ़ रही है।जिंदगी की अंतिम दहलीज पर खड़ा व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों को अगली पीढ़ी के साथ बाँटना चाहता है, लेकिन उसकी दिक्कत यह होती है कि युवा पीढ़ी के पास उसकी बात सुनने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं होता। बुजुर्ग पीढ़ी का सबसे बड़ा रोग असुरक्षा और अकेलेपन की भावना है वृद्धावस्था में हृदय संबंधी रोग, रक्तचाप, मधुमेह, जोड़ों के दर्द जैसी आम समस्याएँ तो होती हैं, लेकिन इससे बड़ी समस्या होती है भावनात्मक असुरक्षा की। भावनात्मक असुरक्षा के कारण ही उनमें तनाव, चिड़चिड़ाहट, उदासी, बेचैनी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती .जीवन की आपाधापी तथा परिवारों के घटते आकार एवं बिखराव ने समाज में ना जाने कितने बुजुर्गो को वृद्धाआश्रम पहुंचा दिया । है। जिंदगी की अंतिम दहलीज पर खड़ा व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों को अगली पीढ़ी के साथ बाँटना चाहता है, लेकिन उसकी दिक्कत यह होती है कि युवा पीढ़ी के पास उसकी बात सुनने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं होता। जीवन में हर कर्ज इंसान उतार सकता है पर माता पिता का कर्ज कोई भी नहीं उतार सकता । मैं तो सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि आप सोचें की कहीं आप उन्हें ये सजा तो नहीं दे रहे रहें है…. संजय अरोरा, राष्ट्रीय सहारा

कहते हैं कि सपनों की भी अपनी अलग ही दुनिया होती है. हकीकत में जिन चीज़ों को हम नहीं पा सकते सपनों में उन सबको सहजता से हासिल कर लेना नामुमकिन नहीं. यह बात भी कितनी सच है कि अगर सब कुछ असल ज़िंदगी में मिल ही जाता तो सपने भला आते ही क्यों!

मैंने भी कई तरह के सपने देखे हैं. मेरे सपने कभी मुझे लंदन- अमेरिका की सैर करा लाए तो कभी हसीनाओं के संग अठखेलियां करने के लिए समंदर किनारे भी छोड़ दिया. ये मरे सपने ही हैं जिनमें मुझे अपनी नौकरी में इतना बड़ा प्रोमोशन मिला कि मैं अपने बॉस का बॉस बन गया. सपनों की रंगीन दुनिया के सहारे ही मैं कभी लंबी सी कार में बैठकर फाइव स्टार होटल में डिनर करने गया तो कभी ठीक इसके उलट रेलवे स्टेशन के बाहर चरसियों के बीच रात गुज़ारी.

मैं दूसरों के सपनों के बारे में तो नहीं जानता पर अपने सपनों के बारे में ज़रूर कह सकता हूं कि मुझे कुछ इसी तरह के अजब-गजब सपने आते रहते हैं. शायद इसीलिए कभी व्याकुल हो जाता हूं कि कहीं मुझमें कोई ऐब तो नहीं जो इस तरह के सपने दिखाई देते हैं.

कभी- कभी सोचता हूं तो लगता है कि शायद मैं बहुत संवेदनशील हूं और जो कुछ भी गहराई से महसूस करता हूं, देखता हूं या फिर जो बातें मेरे दिल-दिमाग़ को छू जाती हैं वो सब किसी न किसी रूप में, कभी न कभी मेरे सपनों का हिस्सा बन जाती हैं.

हमारे देश में राजनीति और क्रिकेट का बहुत महत्व है. पता नहीं क्यों क्रिकेट कभी बहुत अपील नहीं किया परन्तु राजनीति और नेता मुझे अकसर झकझोरते रहते हैं.

राजनीति के प्रभाव और फैलाव का ही असर है कि कुछ दिन पहले मेरे सपने में एक नेताजी आए. उनके पास कोई सत्ता या राजनीतिक पद तो नहीं था पर राजनीति के गलियारों में उनका कद बहुत ऊंचा था. वो मंत्री तो नहीं थे पर लोगों को मंत्री बनवाने का रुतबा रखते थे.

नेताजी से मेरी मुलाकात दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई. हम दोनों को चेन्नई जाना था– मुझे दफ्तर के काम से और उन्हें भी किसी चुनावी सभा में भाग लेने के लिए. इत्तफाक की बात कि नेताजी के साथ कई टीम-टाम नहीं था और हम दोनों एयरपोर्ट पर अगल-बगल बैठकर फ्लाइट का इंतज़ार कर रहे थे. कुछ ही पलों में न जाने कैसे और क्यों हम एक दूसरे से खुल गए. बातों- बातों में नेताजी ने मेरे बारे में काफी पूछताछ कर डाली, मसलन मेरी नौकरी, तन्ख़्वाह, मेरी आकांक्षाएं, मेरा परिवार आदि. देश, समाज और राजनीति पर भी हमारी काफी बातचीत हुई. जान-पहचान और अपनापन कुछ इतना बढ़ गया कि हमने तय किया कि हम लोग चेन्नई में भी मौका निकालकर मुलाकात करेंगे.

मैं चेन्नई के एक होटल में ठहरा और वह एक सरकारी भवन में. दूसरे दिन सुबह ही नेताजी ने मुझे बुलावा लिया और कुछ ही देर में एक गाड़ी होटल के नीचे आ खड़ी हुई. सफेद रंग की रपारप टाटा सफारी, सीटों पर सफेद कवर और चारों ओर काले शीशे. कार में एक ड्राइवर, एक सिक्योरिटी गार्ड और एक अर्दली. मेरा मन गदगद हो गया. इतनी शान से सड़क पर निकलूंगा यह तो मेरी कल्पना से भी परे था.

थोड़ी ही देर में मैं नेताजी के पास था. सोचा था वो सरकारी भवन में रुके हैं, सरकारी किस्म का ही होगा. पर यहां के ठाट-बाट तो मेरे होटल से कहीं अधिक थे. नेताजी एक बड़े से कमरे में कोई बैठक ले रहे थे सो मुझे एक दूसरे कमरे में आराम करने के लिए कहा गया. यह कमरा भी कम नहीं था. शानदार बेड और उसपर सफेद चादर-तकिया-तौलिया, बगल में पढ़ने की मेज़-कुर्सी और दूसरी तरफ बढ़िया सा सोफा सेट. फर्श पर साफ-सुथरा कालीन. सरकारी चमक-दमक मुझे भा गई.

करीब एक घंटे के बाद नेताजी आए और हमारी बातों का सिलसिला शुरू हुआ. इस बार बातें राजनीति, शासन, समाज और आम आदमी से जुड़ी हुई थीं. थोड़ी ही देर में नेताजी ने कहा कि राजनीति में आओगे! एकाएक ऐसी बात सुनकर मैं सकपका गया और वह मेरी घबराहट भांप गए. बोले घबराओं नहीं मेरा हाथ तुम्हारे ऊपर रहेगा और तुमको हर जगह वीआईपी ट्रीटमेंट मिलेगा. मन तो ललचाया पर राजनीति मेरी पिछली सात पुश्तों में किसी ने नहीं की थी. उल्टे सभी लोग नेताओं का मज़ाक ही बनाते रहते हैं. तरह-तरह के सवाल मेरे मन में उठने लगे. नेताजी ने कहा घबराओँ मत और हां कर दो, ज़िंदगी संवर जाएगी और आने वाली पुश्तें भी निश्चिंत हो जाएंगी.

मैंने कहा हां तो कर दूं पर कामकाज कैसे करूंगा, मुझे तो इस विधा का दूर-दूर तक ज्ञान नहीं है. नेताजी ने कहा कि राजनिति ही तो वह विधा है जिसके लिए किसी विशेष ज्ञान, शिक्षा या योग्यता का होना ज़रूरी नहीं है. पढ़ाई की डिग्री है ही, एक सफल करियर का सपोर्ट भी है. बस तुम्हें मंत्री बनाने के लिए इतना काफी है.

वाह, सपनों में एक नेता ने मुझे मंत्री बनने का सपना दिखा दिया. अब तो मैं सचमुच सपने बुनने लगा. फिर भी मन में शंकाएं थीं. लग रहा था कि राह आसान नहीं है और अगर कहीं नैया डूबी तो राजनीति तो जाएगी ही करियर से भी हाथ धो बैठूंगा.

इसके बाद तो नेताजी ने एक लेक्चर ही पिला दिया. बोले डॉक्टर, इंजीनियर और बड़े-बड़े मैनेजरों को तुमने नेता बनते देखा होगा पर क्या कभी किसी नेता को वापस डॉक्टर, इंजीनियर या मैनजर बनते सुना है. उन्होंने कहा कि राजनिति नौकरी की तरह सुरक्षित तो नहीं है पर इसमें पैसे और शोहरत की कमी भी नहीं है. मीटिंग, कामकाज और चुनाव के कारण देशाटन करने का भरपूर मौका मिलता है. हवाई जहाज़ का खर्च, रहना-खाना, गाड़ी-बंगला तो देख ही रहे हो, ठसके में कोई कमी लग रही हो तो बताओ? और यह सब मेरे पास तब है जब मैं मंत्री तक नहीं हूं.

नेताजी ने कहा कि चुनावी सभा में लोगों का दिल जीतने के बजाय उनका ब्रेन वॉश करना ही तुम्हारा मकसद होगा. इसके लिए सच का झूठ और झूठ का सच भी कहना पड़े तो घबराना मत, ये सब तो बातें हैं—आज कह दीं, कल भूल गए. सफलता के लिए सिर्फ अपनी पार्टी और अपने काम का ही गुणगान करते रहो. साथ ही दूसरी पार्टी की बुराई और उसके नेता पर उंगली उठाने से मत चूकना, बस जीत पक्की समझो.

उन्होंने कहा कि आम आदमी बहुत मासूम होता है और उसकी भावनाएं कोमल. जहां जाओ वहां के लोगों के बारे में पहले से ही फीडबैक ले लो और मिलने पर उन्हीं की भाषा बोलो, उनकी समस्याओं के बारे में बातें करो और उनको आगे बढ़ने का सपना दिखाओ. बस जीत पक्की समझो.

रैलियों में भाग लेने से लेकर मंत्री बनने तक तुम छोटे-बड़े इतने इलाकों में घूम चुके होगे और इतने लोगों से उनकी इतनी समस्याएं सुन चुके होगे कि मंत्री बनने पर कुछ भी याद नहीं रहेगा. और मंत्री बनने के बाद इतने बड़-बड़े काम होते हैं कि गली-मोहल्लों की बातें पूरी करने का वक्त किसके पास है. मोटे-मोटे काम कर दो और उन्हें जताने में पीछे मत रहो. बस सफलता पक्की समझो.

हो सकता है कुछ लोग तुम्हें बेशर्म कहें या मौकापरस्त पर कामयाबी की कुछ तो कीमत चुकानी पड़ती है मेरे यार. उन्होंने कहा कि आखिर नौकरी में भी तो तुम कभी झूठ बोलते हो, अपने काम की तारीफ और दूसरे के काम की बुराई करते हो. इतना ही नहीं तरक्की पाने के लिए बॉस की चाटुकारिता भी करते हो. दिन-रात इसी में गुज़र जाते हैं कि नौकरी बनी रहे, बॉस खुश रहे, प्रोमोशन मिलता रहे और इन्क्रीमेंट अच्छा हो जाए.

नेता भी यह सब करते हैं. पर इसका फायदा बड़े लेवल पर होता है. रहने को बड़ा बंगला मिलता है, हवाई जहाज़ से देश-विदेश जाते हो, नौकर-चाकर, सेक्रेटरी और आगे-पीछे घूमते लोग. किसी का काम करना नहीं है, करने का आदेश दे देना है. काम हो गया तो वाह-वाही आपकी और अगर और नहीं हुआ तो विरोधियों की चाल. ऊपर से तुम्हारा हर काम समाजसेवा कहलाएगा और देशभक्त कहलाने का सम्मान जो मिलेगा वह अलग.

सत्ता बड़ी चीज़ है भैया, बस हर नेता को थोड़ा चमड़ी मोटी करनी ही पड़ती है. थोड़ी होशियारी से चलो और ज़रूरत से ज़्यादा लालच अगर न रखो तो लंबी पारी पक्की समझो.

नेताजी की बातें मुंगेरीलाल के सपनों से कम नहीं थीं और मैं इन्हें समझ भी रहा था. पर फिर भी मैने तय कर लिया कि अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़ दूंगा और राजनीति के समंदर में कूद जाऊंगा. अगर मोती पाना है तो तालाब में नहीं, सागर में गोता तो लगाना ही होगा.

इतनी देर में घड़ी का अलार्म घनघना उठा. मेरी नींद खुल गई और सपना टूट गया. पलंग पर मैं अकेला पड़ा था और मेरे चारों तरफ थीं कोरी दीवारें. रात के अंधेरे में जिस नेता से मैं सपने में मिला था, दिन के उजाले में अब अपने सपनों के नेता को तलाशने की कोशिश कर रहा था.

इंसान का वजूद उसका अस्तित्व उसके अपने अहं पर आधारित है, उसका अपना अंदर का अहं ही उसे आगे ब़- ढ़ने के लिये प्रेरित करता है। इंसान के स्वाभिमान, सम्मान, अस्मिता, उसका समाज में स्थान, लोगों के उत्थान के
प्रति सकरात्मक सोच ही उसके अहंभाव का आधार होता है। पर पिछले दो दशकों से इंसान बहुत तेजी से विकास के पथ पर बढ़ रहा है। वहीं उसका अहंभाव भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिये कुंठित प्रेरणा का सहारा ले रहा है पर शायद उसे नहीं मालूम की ये कुंठित अहं उसे ऐसे अंधकारमय गढ्ढे में ढकेल रहा है जहां सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है। ये कुंठित अहं आज उसे जिस
आंन्नद, पद, कुर्सी से चिपका कर जिस खोखले पुरूषार्थ का एहसास करा कर
दूसरों का अहित करावा रहा है। यही कुंठित….. मैं……का अहं जब किसी
अपने को संकटमय रास्ते या स्थिति में ला देता है तो इंसान को अपने इस भूल
का एहसास होता है। पैसे तो हर इंसान कमाता है, कुछ लोग ऐसे होते हैं
जिनका जीवन का उदेश्य ही किसी भी तरीके से पैसे को कमाना होता है उसके
लिये यो जीवन में कोई भी गल्त रास्ता भी अपनाने में नहीं चूकते। कुछ ऐसे
होते हैं जिनका उदेश्य सिर्फ अपने लिये एवं अपने परिवार के लिये पैसा कमाना होता है। पर कुछ ऐसे भी विरले समाज का जरूरी अंग होते हैं जिनका अहंभाव देश के उत्थान, उसमें अधिक से अधिक योगदान, उसमें अपनी सकारात्मक ऊर्जा के समावेश के लिये ही प्रेरित करता रहता है। ऐसे लोगों का परिवार 45 या 10 लोगों का समूह ही परिवार नहीं होता बल्कि पूरे देश से जुड़े लोग ही उसके अपने होते हैं। देश को, तिरंगे हमेशा ऊपर देखने का ज़ज्बा हमेशा बना रहता है। उनके पैसे कमाने का उद्देय लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना, उन्हें सच के मार्ग पर ले जाना, उनके हर  सुख दुख में श।मिल होना ही उनका उदेश्य होता है। लाखों वार के जलने वाले चूल्हे इन्हीं की प्रेरणा का स्त्रोत होते हैं। कभी कभी मुझे ऐसा लगता है किसी अदृश्य भक्ति से भरपूर ऐसे लोगों को ईश्वर ने ही भेजा है कि जाओ जाकर समाज को ऐसा दो की लोग जन्म जन्मांतर तक तुम्हारे कृत्य को याद रखें। श्री सहारा श्री ,टाटा, बिड़ला, अंबानी बंधु, बजाज जैसे सैकड़ों लोग ऐसे
हैं जिनके पैसे कमाने और उनके अहंभाव के पीछे लाखों परिवार के उत्थान का
मकसद भी जुड़ा होता है। इसीलिये ये लोग भी ऐसे परिवारों में पूज्य हो जाते हैं। क्योंकि इन जैसे लोगों ने बिना किसी कुंठित अहंभाव के अपने साथ लाखों परिवार की रोजी रोटी के लिये सोचा, जिससे एक ऐसे अस्तित्व की नींव रखी जिसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास, सकारात्मक सोच ही उसका आधार होता है। उनकी सकारात्मक सोच की गतिशीलता ही उनकी कार्य की ऊर्जा को बढ़ाने में भी सहायक होती है।मैंने कईयों को देखा है जो येनकेन प्रकरेण अपने किसी भी तरह के फायदे के लिये दूसरों का नुकसान करने में पीछे नहीं रहते। जबकि सृष्टि का विधान है जो जैसा बोयेगा वैसा ही काटेगा। गुरूजी हिसाब तो    चुकता करना होगा। दूसरों का बुरा सोचना ही इस बात का संकेत है की कुंठित अहंभाव का फोबिया इस इंसान में घुस चुका है। आज भले ही ये भाव आपको संतुष्टि कर रहा हो पर आने वाले कल में आप भयंकर कष्ट के लिये तैयार रहें। क्योंकि समय का चक्र आप पर निगाह रखे है जो कुंठा से प्रेरित अहंभाव से निर्मित व्यक्तित्व पर खास निगाह रखे हुये है। इंसान को हमेशा सकारात्मक सोच रखनी चाहिये अन्यथा पश्चाताप के आंसू भी शायद इंसान का साथ छोड़ देते हैं। आज भी खुद खड़े रहने के लिये कैसे लोग दूसरे को ढकेलने में पीछे नहीं रहते। मैं खुद भी यही कोशिश करता हूं का हर उस कार्य का विरोध करूं जो आत्मा पर बोझ लगे, मुझे सफलता कितनी मिलती है ये आने वाला समय ही बतायेगा। भौतिकता बाहरी आवरण है अहं की इच्छा कर्म को प्रेरित कर इसे आज नहीं तो कल उपलब्ध करा ही देता है। पर कुंठा भरा अहंभाव उसकी अंतिम इच्छा का भी जनाजा तक निकलने के वक्त के पहले तैयार हो जाता है। कुंठा से प्रबल च्छाओं से उत्पन्न विवाद का अंत निश्चित है क्योंकि आप कुंठा में जकड़े अहं में दूसरों का अतिक्रमण कर रहे हैं। मेरा मानना है कि आपके विकास में स्व अहंभाव का होना बहुत ज़रूरी है यही कुछ कर गुज़रने की इच्छा, समाज में आपके व्यक्तित्व का आईना होता है। इसलिये हमेशा मेरा मानना रहा है कि जीवन की किसी परिवर्तन शील स्थिति को सकारात्मकता के साथ लें उसे उसके उत्कर्ष पर पहुचायें। सकारात्मक अहंभाव से अपनी ऊर्जा भी बढ़ायें। इससे शारीरिक मनसिक ऊर्जा का विकास करें। आप के ना रहने पर भी ये आप के नाम का अमिट छाप का सूचक बन हमेशा रहेगा। वरन कुंठित अहंभाव आपको चमक दिखाते दिखाते ऐसे स्लोगनो का मसीहा बना जायेगा जहां लोग जाने के बाद भी यही कहेंगे अच्छा हुआ साला मर गया बहुत लोगों का परेशान करता था वगैरह ……वगैरह……।

संजय अरोरा
राष्ट्रीय सहारा,
लखनऊ


कहते हैं मुनष्य योनि श्रेष्ठ होती है और बड़े भाग्य से इसमें जन्म मिलता है. ऐसा हो भी क्यों न–  आख़िर 84 करोड़ योनियों को पार करके हम मनुष्य रूप में धरती पर अवतरित होते हैं.

विकास कुदरत का नियम है. हर बच्चा शैशवकाल से निकल कर शनै: शनै: बड़ा होता है और विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए जीवन को अपनी तरह से बेहतर बनाने के प्रयास में जुट जाता है. एक पंक्ति  में कहा जाए तो यही जीवन का क्रम है.

कुछ ऐसा ही क्रम उस शहर का भी होता है जिसमें हमारा जन्म एक बालक के रूप में होता है, जिस शहर में हम चलना सीखते हैं, खेलते- कूदते हैं, पढ़ते-लिखते हैं और अपने जीवन को एक निश्चित दिशा देते हैं ताकि हम एक कामयाब मनुष्य बन सकें और अपने आसपास के लोगों में यश के भागीदार बन सकें.

मनुष्य और शहर का नाता अधिक समझाने की ज़रूरत नहीं है. जिस तरह एक मानव का विकास  होता है ठीक उसी तरह एक शहर का भी विकास होता है. हर शहर अपनी बाल्यावस्था से होते हुए, विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए अपना एक मुकाम बनाता है. वैसे तो हर शहर विकास की दौड़ दौड़ता है पर इनमें से कुछ इस दौड़ में इतना आगे निकल जाते हैं कि पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं. कुछ शहर तो इतने भाग्यशाली होते हैं कि उनके देश की पहचान भी उन्हीं से बन जाती है.

मनुष्य के विकास और शहर के विकास में थोड़ा फर्क़ भी होता. जहां मनुष्य का विकास काफी सीमा तक स्वत: होता है, शहर का विकास मानव बुद्धि और मानव शक्ति के बिना असंभव है.

मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ. पिता की आजीविका उन्हें दिल्ली शहर तो ले ही आई साथ में मुझे भी शैशवकाल से ही इसी शहर में ला पटका. शायद नियति की यही इच्छा थी. मैने कब दिल्ली शहर में होश संभाला और चलना सीखा कह नहीं सकता. इसके बाद तो मैं, और अब मेरा हो चुका दिल्ली शहर, दोनों ही विकास के क्रम में आगे बढ़ने लगे.

धीरे- धीरे मैं तो दिल्ली की भीड़ में कहीं खो गया लेकिन दिल्ली नहीं हारी और विकास को अपना हमसफर चुन जीवनपथ पर बढ़ती रही, बढ़ती रही. दिल्ली भाग्यशाली है कि भारत की सत्ता को अपने हाथ में ले चुके फिरंगी भी इसके विकास की बात निरंतर सोचते रहे. दिल्ली ही वह खुशकिस्मत शहर है जो इतिहास के हर दौर में विकास पथ पर अग्रसर रहा. शुरुआती दिनों से आज तक न जाने कितने लोगों ने दिल्ली पर शासन किया, इसके विकास को अपने कार्यक्षेत्र की एक उपलब्धि समझा और इस पर फक्र किया.

दिल्ली के विकास में भले ही मेरी भूमिका नगण्य हो फिर भी मैं कम किस्मत वाला नहीं हूं क्योंकि मैंने दिल्ली को विकास पथ पर चलते देखा है. यह बात दीगर है कि यह सब यूं ही नहीं आया और बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना भी पड़ा.

मुझे याद है दिल्ली अपने गोल-चक्करों के लिए जानी जाती थी लेकिन विकास के लिए इनकी कुर्बानी देनी पड़ी और ये रफू-चक्कर हो गए. दिल्ली जानी जाती थी अपनी चौड़ी और लंबी सड़कों के लिए. ये आज भी हैं पर अब ये सड़कें कम, भूल-भुलैया ज़्यादा हैं. दिल्ली जानी जाती थी अपने शानदार बंगलों के लिए पर अब आधुनिकिकरण का ज़माना है और इनकी जगह गगन-चुंबी इमारतें खड़ी हो गई हैं. कोई ताज्जुब नहीं आने वाले समय में दिल्लीवासी सूर्योदय और सूर्यास्त सिर्फ फिल्मों में देखा करेंगे.

दिल्ली जानी जाती थी अपने बाज़ारों के लिए. कनाट प्लेस लाटसाहबों का बाज़ार कहलाता था पर आधुनिकीकरण के युग में अब अपनी पहचान गंवा बैठा है. कुछ यही हाल यहां के प्रसिद्ध थोक बाज़ारों का भी है. वो मशहूर थे और आज भी हैं, मगर अफसोस, विकास अभी यहां से कोसों दूर है. अपने पिता की उंगली थामकर चांदनी चौक और उसकी गलियों को मैंने जिस हाल में देखा था, लगभग उसी हाल में मेरे बेटे ने मेरी उंगली थाम कर चांदनी चौक को देखा. अगर यही आलम रहा तो कोई ताज्जुब नहीं मेरा बेटा भी अपने पुत्र को ठीक वैसा ही चांदनी चौक दिखाएगा. ऐसा हुआ है यहां का विकास कि पुश्तें बीत गईं पर बदहाली वैसी की वैसी है.

दिल्ली के इन बाज़ारों में, यहां की गलियों में व्यापार तो करोड़ों का होता है पर इनकी बेहतरी के लिए क्या हुआ है यह तो सरकारी अमला ही जानता होगा. बहरहाल सच तो यह है कि इन इलाकों में आधुनिकीकीरण या विकास दिखाई तो ज़रा भी नहीं देता, फाइलों और नेताओं के भाषणों में इनका ज़िक्र अलबत्ता हुआ होगा.

खेलकूद में भी दिल्ली कभी पीछे नहीं रही. यह गौरव की बात है कि दिल्ली में एक नहीं कई-कई स्टेडियम बने हैं जहां अनेकों अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताएं और खेल आयोजन हुए हैं. सन 1982 के एशियाड खेल और अक्टूबर 2010 में संपन्न हुए कॉमनवेल्थ गेम्स किसे याद नहीं. दिल्ली के विकास का बहुत बड़ा श्रेय इन खेल आयोजनों को जाता है. यह बात दीगर है कि इन खेलों के आयोजक भी कम खिलाड़ी नहीं थे. इन्होंने दिल्ली का विकास और श्रृंगार कम, अपना और अपनों का भरपूर विकास ज़रूर किया.

पहले की दिल्ली की तुलना में आज की दिल्ली बहुत दूर आ गई है. आज यहां बड़ी-बड़ी इमारते हैं, बड़े- बड़े फ्लाईओवर हैं, बड़े-बड़े शापिंग माल हैं, चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं, सड़क के नीचे और सड़क के ऊपर दौड़ने वाली मेट्रो ट्रेन है, ढेर सारी कारें हैं, ढेर सारे दफ्तर, छोटे-बड़े उद्योग हैं, और सबको लुभाने वाली चमक-दमक भी है. पहले यह सब कुछ इतने बड़े पैमाने पर न था. एक चीज़ और जो पहले इतने बड़े पैमाने पर नहीं थी वह है अपराध. दिल्ली आगे ज़रूर बढ़ी लेकिन इसके साथ ही आधुनिक होते इस शहर में अपराध भी बढ़े. रंजिश, ईर्ष्या, संवेदनहीनता, छीना-झपटी, छुरेबाजी, चोरी-डकैती, वृद्धों का अपमान, औरतों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, बच्चों की असुरक्षा, तुनकमिजाज़ी, गुस्सा, बेसब्री, बेईमानी, झूठ-फरेब और न जाने क्या-क्या बढ़ा है दिल्ली में. आधुनिकीकरण की दौड़ में इंसानियत, प्रेम और सह्रदयता जैसी छोटी-छोटी बातें न जानें कहां छूट गई हैं.

मेरी दिल्ली विकास पथ पर है. इसके साथ-साथ मेरा भी विकास हुआ है और मैंने नए ज़माने की बहुत सी आधुनिक सुविधाओं के साथ जीना सीखा है. कभी- कभी मुझे गर्व होता है कि जिस शहर में मेरा तीन-चौथाई जीवन गुज़रा है वह दुनिया के किसी दूसरे बड़े शहर से कम नहीं. पर फिर भी अफसोस होता है कि इतना विकास और आधुनिकीकरण दिल्ली को वह मुकाम नहीं दिला पाया है जो न्यूयॉर्क ने अमेरिका को दिलाया, जो लंदन ने इंग्लैंड को दिलाया, जो टोक्यो ने जापान को दिलाया, जो शांघाई ने चीन को दिलाया, जो हांगकांग ने थाईलैंड को दिलाया, जो दुबई ने यूएई को दिलाया.

ऐसे में बहुत दुख और कोफ्त होता है. गुस्सा अपने नेताओं और सरकारी बाबुओं पर आता है जो बड़े- बड़े ओहदे पाने के लिए बड़ी- बड़ी बातें करते हैं, बड़े- बड़े वादे करते हैं, ढेर सारी उपलब्धियां गिनाते हैं, कभी न पूरी होने वाली योजनाएं बनाते हैं और मासूम जनता को हसीन सपने दिखाते हैं. सही मायनों में दिल्ली के अपराधी यही लोग हैं, नहीं तो आज सचमुच मेरी दिल्ली मेरी शान होती.

मेरे परिवार के लोग मुझसे काफी नाराज़ हैं. वजह है कि न तो मैं किसी को सिनेमा ले जा रहा हूं और न ही शॉपिंग के लिए बाज़ार.

पर इसमें नया क्या है. यह तो हर घर में होता है. नाराज़गी और समझौता तो ज़िंदगी के दो पहिए हैं जिन पर सवार होकर हम सफर करते हैं.

पर हमारे सफर में अड़चन यह है कि मैं घर में सबसे ज़्यादा बाहर घूमने और बाज़ार में खाने-पीने का शौक रखता हूं. अब मैं ही परिवार के लोगों को इसके लिए मना कर रहा हूं. यूं कहिए कि मैने अपने शौक को पिंजरे में कैद कर दिया है और इसके साथ ही परिवार के दूसरे लोगों की हसरतें और उम्मीदें भी इसी पिंजरे में कैद हो गई हैं.

घर में जब-जब बाहर जाने की बात उठती है तो हर बार मेरे मुंह से एक ही बात निकलती है कि अगर गए और बम फट गया तो?

पिछले कुछ सालों से देश के किसी न किसी शहर से बम फटने की ख़बरें लगातार आ रही हैं. बम मुंबई में फटता है, सहम जाते हैं दिल्लीवाले.

इसी महीने की शुरुआत में दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर ज़ोरदार बम फटा. इस धमाके से कोई अछूता नहीं रहा. इसकी चपेट में आए कई लोग अपनी जान गंवा बैठे और ढेरों अस्पताल में इलाज करवा रहे हैं. जो लोग दूर घरों में थे उनकी आत्मा मर गई और दिल घायल हो गए.

मैं भी शायद ऐसे ही चंद लोगों में हूं. बार-बार की आतंकी वारदातों ने मेरा दिल छलनी कर दिया है और मेरे उत्साह की हत्या. आज मेरा परिवार कहीं जाना चाहता है तो मैं उन्हें डरा देता हूं और उनके उत्साह के दमन का हर प्रयास करता हूं.

मेरे अंदर यह परिवर्तन पिछले कुछ सालों में ही आया है. इससे पहले मैं खुद को खुशनसीब समझता था कि मेरा जन्म आज़ाद भारत में हुआ है. मैं गर्व महसूस करता था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, इसका संविधान दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है और यहां नागरिकों को सम्मान का जीवन व्यतीत करने की हर तरह के अधिकार प्राप्त हैं.

लगातार हो रहे धमाकों ने मेरे विचारों की धज्जिया उड़ा कर रख दी हैं. आज मुझे दुख है कि मैं अपने ही देश में डर-डर कर जीने को मजबूर हूं.

मुझे इस बात का इल्म है कि मेरे देश में एक सक्षम सरकार है जिसके पास ताकत और पैसा दोनों हैं. देश में ज़बरदस्त कानून व्यवस्था है, प्रशासक हैं और वह सब कुछ है जो किसी भी देश के नागरिक के जीवन को सुखी और निडर बनाने के लिए काफी है. पर अफसोस सिर्फ इस बात का है कि इन सबका इस्तेमाल न तो ठीक तरह से हुआ और न ही हो रहा है. अगर ऐसा हो रहा होता तो निश्चित ही मेरा परिवार मुझसे नाराज़ न होता और हमारा जीवन का उत्साह पिंजरे में कैद न होता.

इसी व्यथित मन से मैने घर में कह दिया कि अगर कभी विदेश जाने का मौका लगा तो पासपोर्ट फाड़कर फेक दूंगा और कभी वापस नहीं आउंगा. सब सकते में आ गए क्योंकि मैं ही था जो कभी कहता था कि पड़ोसी की फूलों की सेज़ से अपने घर का टाट का बिछौनी बेहतर है. लेकिन क्या करूं अब घर का टाट ही जवाब दे रहा है और इसमें से सड़न-गलन की बू आने लगी है.

बार-बार सोचता हूं कि आखिर दूसरे देशों में ऐसा क्या है कि वहां लोग खुशियों भरी ज़िंदगी बिता रहे हैं, सबके चेहरों पर मुस्कुराहट बिखरी है और हर तरफ खुशहाली दिखलाई दे रही है. उन देशों में भी वही सरकार है, कानून है, प्रशासक और पुलिस हैं. सोचा तो लगा कि शायद उनके पास इन सबके साथ-साथ ईमानदारी और चरित्र भी है.

लगता है हमारे देश में ये दोनों ही कहीं गुम हो गए हैं. सोचता हूं बार-बार होने वाले धमाके कहीं हमारी बेईमानी और चरित्रहीनता का नतीजा तो नहीं हैं?

भारत में चल रही राजनीति की दिशा और दशा ने मुझे सबसे अधिक कष्ट दिया है.

मानता हूं हर समाज में असमाजिक तत्व होते हैं. कानून तोड़े जाते हैं, अपराध होते हैं और धमाके भी होते हैं. पर उनसे निपटने की तैयारी भी होती है और सबक देने के लिए सज़ा. हमारे देश में ही यह सब है पर इन सबके ऊपर है राजनीति.

धमकों के बाद टीवी खोलिए किसी भी न्यूज़ चैनल पर शासक दल के नेता सरकार की सतर्कता का बखान करते दिख जाएंगे, पुलिस और जांच अधिकारी उपलब्धियां गिना रहे होंगे और विपक्ष के नेता इन सबमें खामियां निकाल रहे होंगे. सच मानिये इस बीच एक धमाका और हो जाएगा.

नेताओं की राजनीति और सत्ता लोभ ने मुझ जैसे आम आदमी की ज़िंदगी को दूभर बन दिया है. मेरे जैसे न जाने कितने ही लोग हैं जो अपने ही देश और समाज में एक- दूसरे से डरते हैं, हर अजनबी से बचते हैं और किसी जानने वाले पर भी अविश्वास की भावना रखते हैं.

ऐसे समाज और देश में आज मेरा दिल रो रहा है. मेरी आतुर निगाहें उसको तलाश रही हैं जो मेरे आंसू पोंछ सके, मेरे अंदर बैठे डर को भगा सके, अपनों के प्रति मेरा विश्वास जगा सके और मेरे परिवार की मेरे लिए नाराज़गी दूर कर सके.